दुनिया भर में जब कोई आतंकी घटना होती है , तो रेत में सिर घुसेड़े शतुरमुर्ग एक सुर में बोलते हैं कि आतंकवाद का मज़हब नहीं होता। आतंकवाद का मज़हब सिर्फ और सिर्फ इस्लाम है और दुनिया को बेवकूफ बनाने वाले मुसलमान किसी को ये नहीं बताते कि इसके बीज कुरान जब डिक्टेट की जानी शुरू की थी उस समय कुरान में बोये गए थे और जिसने कुरान नहीं पढ़ी या आयतों के बताये जाने का इतिहास और सिलसिला नहीं जाना वो हर शख्स अपनी अज्ञानता या मुसलमानों के अतिवादी रवैय्ये से डर कर बोलता है कि " आतंकवाद का कोई मज़हब नहीं होता ".
पोस्ट को संक्षिप्त रखने के लिए पूरा इतिहास नहीं लिख रहा हूँ, लेकिन एक बात दिमाग में बिठा लीजिये कि आज किसी पढ़े लिखे या जाहिल मुसलमान से यदि मोहमद के माका से मदीना जाने की बात करेंगे तो वो आपको बहुत ही दर्दनाक कहानियाँ सुनाएगा कि मक्का के कुरेशों ने मोहम्मद और इस्लाम अपनाने वालों को बहुत प्रदित किया और उन्हें मक्का से निकल दिया। ये सब झूटी कहानियाँ है। जबकि हकीकत यह है कि वर्ष 610 से लेकर 623 (मदीना जाने का वर्ष) तक मोहम्मद और इसके अनुयायियों ने मक्का में रहने वाले बहुदेव पूजक कुरेशों , यहूदियों, ईसाईयों , हनफ़ियों , पारसियों की ज़िन्दगी हराम कर दी थी। और जब मक्का में 13 साल में 100-125 से ज्यादा अनुयायी नहीं बना पाया तो मदीना के लोगों को प्रेरित करने के लिए खुद मदीना गया था। ( कोई ज्यादा बहस करे तो उसे "इब्न इस्हाक़" -तत्कालीन इतिहासकार की "सीरत रसूल " को पढ़ कर अपना मत निर्धारित करने के लिए कहिये।
कुरान में 164 जगह काफिरों और मुशरिकों (मूर्तिपूजकों ) के खिलाफ आदेश दिया है। शुरूआती दिनों में इस्लाम के नए नए अनुयायी अपने कुरैश सम्बन्धियों से लड़ना नहीं चाहते थे तो एक आयत 2:190 ( तुम लड़ो अल्लाह की राह में जो तुमसे लड़ने लगें _________) पढ़कर आपको लगेगा कि इसमें गलत क्या है , लेकिन , यदि मक्का के कुरेश असहिष्णु होते तो उस समय मक्का के के काबा में 360 अलग अलग देवताओं और धर्मों को मैंने वालों की मूर्तिया न होतीं और उसी मक्का में कुरैश , यहूदी , ईसाई और हनीफ धर्म को माने वाले मिलजुल क्र न रह रहे होते।
मक्का के लोग धार्मिक असहिष्णु नहीं थे यह बात अगली आयत से साफ़ हो जाती है --- सूरा 2 आयत 191 और उनको क़त्ल कर करो जहाँ उनको पाओ और उनको निकाल कर बाहर करो जहाँ से उन्होंने तुमको निकलने पर मजबूर किया है , #और_शरारत_क़त्ल_से_भी_ज्यादा_ सख्त_है। यहाँ मोहमद ने एक बार नहीं बताया कि कुरेशों और उनके धर्म की बेइज़्ज़ती कौन करता था ??? और इन हरकतों के कारण 617-619 तक के सामाजिक बहिष्कार के इलावा कुरेशों ने मोहम्मद के साथ कौन सी मार काट या प्रताड़ना दी थी ??? फिर 619 से 623 तक अगर कुरैशों ने न चाहा होता तो ये मक्का में कैसे रहा ?? उपरोक्त आयत में गौर करें कि मोहम्मद और खुदा की निगाह में शरारत क़त्ल से भी बढ़ कर है।
फिर आयत आती हैं 2:192 , फिर अगर वे लोग बाज आ जाएँ ( और इस्लाम कबूल कर ले) तो अल्लाह बक्श देंगे , 2:193 और उनके साथ इस हद तक लड़ो कि शिर्क न रहे और उनका दीं अल्लाह का हो जाये। इस तरह शुरुआत में इस्लाम नए अनुयायियों को जो अपने रिश्तेदारों सेज सम्बन्धी कुरेशों से लड़ना नहीं चाहते थे ,अल्लाह ने 164 आयते कह कर जिहाद के लिए उकसाया है।
खुदा ने वायदा किया था जो इस्लाम कबूल लेगा उसे बेहतरीन ज़िन्दगी देगा , मगर मक्का से आये हुए लोगों को मदीना के यहूदी पाल रहे थे। खुदा की बात सच करने के लिए और ज़िन्दगी चलने के लिए इन बेरोज़गारों को पैसे की ज़रुरत थी। तो मोहम्मद ने फरवरी 623 में कुरेशों के खिलाफ पहले ग़ज़वे का ऐलान किया और हार गया। अगले दो महीनो में दो बार और प्रयास किया जिनमे सफल रहा। आठ महीने शांत बैठने के बाद जनवरी 624 में मोहम्मद ने अपने 8 गुर्गो को अब्दुल्लाह इब्न जहश के नेतृत्व में एक मक्का के व्यापारिक काफिले को #नखला के पास लूटने के लिए भेजा। उमरा का महीना था। एक मुसलमान ने सिर मूँवा कर ऐसा प्रदर्शित किया जैसे तीर्थ यात्री है। इन्होने काफिले के चार सदस्यों में से 1 को मार दिया , दो को पकड़ लिया और एक भाग गया। लूट में खूब माल मिला। लेकिन नये मुसलमान इस मारकाट और लूटपाट के खिलाफ थे तो एक और आयत 8:69 उनको सुना दी गयी --- सो जो कुछ तुमने लिया उसको हलाल पाक (समझकर) खाओ और अल्लाह से डरते रहो , बेशक अल्लाह तआला बड़े बख्शने वाले बड़ी रेहमत वाले हैं। इसके साथ ही 8: 41 ---और जान लो कि जो चीज़ (काफिरों ) से गनीमत के तौर पर तुम्हे हासिल हो तो (उसका हुक्म यह है कि ) कुल माल का पाँचवाँ हिस्सा अल्लाह और उसके रसूल का है ______________
फिर जो मज़ा खुदा की हिदायत और अनुमति से लूटपाट , मारकाट करके जीने में आने लगा उसका सिलसिला आज तक न थमा।
मगर अफ़सोस इस्लाम के इस चरित्र को दुनियाभर के काफिरों को या तो आज तक यह समझ में ही नहीं आया या वो भी कुरैश ही बने रहना चाहते हैं जो समय रहते चेते नहीं और एक ही रात में मोहम्मद के आदेश #असलिम_तसलाम ( अगर सुरक्षित रहना चाहते हो तो इस्लाम कबूल कर लो) पर मुसलमान हो गए।
( जिन्हे उपरोक्त पोस्ट पर संशय हो वे, इस्लाम को छोड़े हुए मुसलमानो Ali Sina , और M .A Khan को अवश्य पढ़ें)
हाँ कौन बेवकूफ कह रहा था इस्लाम शांति का मज़हब है ??? अबे ऐसा कहने वालो अपने आप तो मरोगे अपने बच्चों को भी मरवाओगे और अपनी औरतों को माले गनीमत में बँटवाओगे।