मंगलवार, 16 मई 2017

ये मामले भी मज़हबी हैं


समझ नहीं आ रहा कि हिन्दुओं के कंधो पर बैठी इस न्याय की प्रतिदिन मोटाती देवी का तराज़ू हिन्दुओं के लिए छोटा और डण्डा हिन्दुओं के लिए बड़ा क्यों होता जा रहा है ????
सुप्रीम कोर्ट जी , माना न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी बंधी होती है , पर आप तो अपनी अक्ल पर से तो पर्दा उठा लो ।
क्या कहा था 11 मई को तलाक के मुद्दे पर इन अक्ल के ठेकेदारों ने ???? कि #अगर_यह_इनके_मज़हब_का_मामला_है_तो_कोर्ट_इसमें_दखलंदाज़ी_नहीं_करेगी। अगर कोर्ट इनके धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का मन बना चुकी है तो हिन्दुओं,सिखों ईसाईयों, बौद्धों और अन्य धर्म वालों को तैयार रहना चाहिए (पोस्ट छोटी रखने के उद्देश्य से ,उदाहरण के लिए चुनिन्दा आयतें लिख रहा हूँ, बाकि आप लोग कमेंट बॉक्स में आयतें लिख कर पाठकों का ज्ञान वर्धन कर सकते ) ----
1) #मरने_के_लिए -----सूरा 9 आयत 5 ,सूरा 8 आयत 12 ,सूरा 33 आयत 61
2) #ये_हमेशा_जिहाद_के_लिए_तैयार_है --सूरा 9 आयत 111, सूरा 66 आयत 9
 3 #जजिया_देने_के_लिए ----सूरा 9 आयत 29
4) #औरतों_केअपहरण_और _बलात्कार_के_लिए --- सूरा 4 आयत 24
#दास_दासी_प्रथा_के लिए ---सूरा 8 आयत 25
6) #काफिर_इनके_लिए _जान_दे_दें_पर_ये_आपको_कभी_दोस्त_नहीं_मानेंगे ---सूरा 4 आयत 89 /सूरा 5 आयत 51
7) #ये_लड़ते_ही_रहेंगे -----सूरा 9 आयत 123 , सूरा 32 आयत 22
8)#अगर_इनका_बाप_या_भाई_कुफ्र_करदे_तो_उससे_भी दोस्ती_नहीं -------सूरा 9 आयत 123
ऐसा नहीं है कुरान या खुदा ने काफिरों को सिर्फ लूटने या मारने के लिए ही लिखा है। काफिर जान बचा सकते हैं बशर्ते वो इस्लाम कबूल कर लें।
फिर अगर वे लोग (अपने कुफ्र से) बाज़ आ जाएँ (#और_इस्लाम_कबूल_कर_लें) तो अल्लाह तआला बक्श देंगे और मेहबानी फर्मा देंगे। सूरा 2 आयत 192
तो हे सुप्रीम कोर्ट के महानुभावो आज तीन तलाक इनका मज़हबी मामला है, और कल अगर इसी आधार पर कि ये आयते हमारी कुरान में लिखी हैं, उद्घृत करके यह कह दिया कि मार काट बलात्कार वसूली भी इनके मज़हबी मामले हैं तो क्या कहोगे ????? देख रहे हो न दुनिया जहान में सुन्नी शिया वहाबी सलफ़ी अहमदिया सीरिया, इराक तुर्की अफगानिस्तान, पकिस्तान नाइजीरिया में जब मुसलमान एक दूसरे को मारते हुए ही नज़र आ रहे है तो ये लोग काफिरों का क्या करेंगे ?????
प्रिय सुप्रीम कोर्ट के मठाधीशों वैसे तो इतने दिनों में आप कई भाषाओँ में कुरान पढ़ सकते थे , फिर भी अगर नहीं पढ़ी है तो निम्न लिंक को ज़रूर पढ़िए जिनमे उपरोक्त आयतों को हदीस का समर्थन प्राप्त है। यानि कि ये मामले भी पूर्णतः मज़हबी हैं।
https://www.thereligionofpeace.com/pages/quran/slavery.aspx
शनि शिगनापुर, दही हांड़ी, जल्लिकट्टू हो सकता है आपको धार्मिक नज़र न आते हों, इनका शास्त्रों में ज़िक्र न मिलता हो ,पर रामजन्मभूमि और गऊ माता का ज़िक्र तो धार्मिक पुस्तकों में है।
अजीब प्रजातन्त्र है जहाँ बहुसंख्यकों द्वारा चुनी हुई सरकारें तो बहुसंख्यक हितों को ताक पर रख नीतियां बना रही हैं वहीँ सुप्रीम कोर्ट जिसे संविधान प्रद्दत समानता के मौलिक अधिकार की रक्षा करनी चाहिए वो भी आँखों पर पट्टी बंधे बैठी है।
वैसे ये हाथ में डंडा/ तलवार क्या सिर्फ हिन्दुओं के लिए ही है ?????
जिस दिन मुसलामानों की तरह हिन्दुओं ने बात बात पर मारकाट मचानी शुरू की उस दिन आप माननीय नहीं ढक्कन सिंह हो कर रह जाओगे। मजबूर मत करिये कि वो दिन आ जाये जब हिन्दुओ ने जो लिहाज़ में मुंह बंद कर रखा है , वो खुल जाए और वो भी कह दें कि हम नहीं मानते इस पक्षपात करने वाले संविधान को , यह संविधान हमारे धर्म शास्त्रों से बढ़कर नहीं है।

बुधवार, 8 मार्च 2017

और अखिलेश का रथ रुक गया।

और अखिलेश का रथ रुक गया। 
कल चुनाव संपन्न हो गए, और आज से जमीन पर किये गए सर्वेक्षणों और अनन्य वैज्ञानिक विधियों से उनकी व्याख्या की जाएगी। सबके अपने अपने आंकलन होंगे। सांखियिकी के आधार पर विभिन्न दलों की सीटें भी बताई जाएँगी। कौन जीतेगा कौन हारेगा यह  बताया जायेगा। अनेकों विधियों में मुझे प्रकृति के इशारे पढने और समझने में कुछ ज्यादा ही रूचि है।  लोग इसे अंधविश्वास  सकते हैं, लेकिन 11 मार्च के बाद यह तय हो जायेगा कि वाकई प्रकृति  करती है या नहीं। 
1988 में पाओलो कोएल्हो ने पुर्तगाली भाषा में एक नॉवल लिखा था "अलकेमिस्ट" । कालान्तर में इसे दुनिया की 69 भाषाओँ अनुवादित किया गया।  इस पर फिल्मे भी बनीं। इस पुस्तक की विषयवस्तु थी , कि यदि आप किसी चीज़ को शिद्दत से चाहें तो पूरी प्रकृति आपको उससे मिलवाने के लिए आतुर हो उठती है।और इसी पटकथा से एक सन्देश और निकलता है कि जब आप कोई काम करते है तो प्रकृति आपको इशारों में उसके अंजाम के बारे में सचेत करती रहती है।
मुझे पूरा यकीन है कि ज़िन्दगी की व्यस्तताओं के चलते अखिलेश यादव जी ने यह नॉवल नहीं पढ़ा होगा। पढ़ा भी होगा तो उसे अंधविश्वास से ज्यादा कुछ नहीं माना होगा।  सबको मालूम था कि चुनाव कुछ ही महीनों में होने वाले हैं सब राजनीतिक दलों ने अपनी अपनी कवायद शुरू कर दी। अखिलेश यादव ने यह कवायद चार साल पहले ही स्टीव जार्दिङ्ग्स , हारवर्ड के प्रख्यात प्रोफेसर को अपनी और अपनी सरकार के छवि निर्माता के रूप में अनुबंधित किया था। स्टीव जार्डिनगस ने 2011 का स्पेन के मारियानो राजोय की  बागडोर संभाल कर उन्हें प्रधानमंत्री बनाया लेकिन वो ये क्रिश 2015 में नहीं दोहरा पाए। 2016 में अमरीकी चुनाव में राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन और  उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार अल गोर की चुनावी बागडोर संभाली, और इन तीनों में से कोई चुनाव नहीं जीता है। इसी कड़ी में स्टीव परदे के  पीछे से अखिलेश की चुनावी बागडोर संभाल  रहे हैं और नतीजे दो दिन  सामने होंगे। 
सबसे अहम् इशारा प्रकृति ने 3 नवम्बर को किया।  अखिलेश ने विश्वप्रसिद्ध कर निर्माता मर्सिडीज़ बेंज से अपनी चुनावी रथ यात्रा के लिए करोड़ों रुपये खर्च करके बस बनवाई। मुलायम सिंह जी ने उसे झंडी दिखा कर रवाना किया। रथ आधे घंटे और डेढ़ किलोमीटर चले के बाद ख़राब हो गया।  बहुत ठीक करने की कोशिश की गयी लेकिन रथ ठीक नहीं हुआ यहाँ तक की बड़े बड़े इंजीनियर उसे ठीक नहीं कर पाए। यहाँ तक की क्रेन भी उसे अपनी जगह से हिला नहीं सकी। यह पहला इशारा था प्रकृति का अखिलेश यादव के लिए। 
रथ का रुकना अपनी जगह था ,लेकिन न जाने क्या सोच कर अखिलेश ने राहुल गाँधी को अपना हमसफ़र बना लिया. जनवरी 2013 में कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने। उसके बाद से भारत में जिन भी चुनावों में उन्होंने कांग्रेस की बागडोर अपने हाथों में संभाली, उसमे कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई। यह प्रकृति का दूसरा इशारा था , जिसे अखिलेश ने समझने से इनकार कर दिया। 
चुनावी दौर चल रहा था, अखिलेश मैदान मैं पूरी तरह से उतरे हुए थे अब प्रकृति उन्हें इशारा करती भी और वो समझते भी तो भी कोई लाभ नहीं था। इसी दौरान प्रकृति ने फिर इशारा किया और अल्लाहाबाद में जिस मंच से राहुल और अखिलेश ने भाषण देना था वो मंच टूट गया।  अखिलेश और राहुल बस उस सभा को रद्द ही कर सकते थे और उन्होंने किया। यह तीसरा इशारा था प्रकृति का। 
इन सबसे ऊपर अखिलेश अपने भाषणों  बार बार मोदी जी को गंगा मैय्या की सौगंध खाने के लिए कह रहे थी, कि गंगा मैय्या की कसम खा कर यह कहें की वाराणसी में 24 घंटे बिजली आती है। और प्रकृति का इससे बड़ा इशारा क्या हो सकता था कि अखिलेश जब खुद बाबा विश्वनाथ के दर्शन करने पहुंचे तो बिजली चली गयी। 

ये अखिलेश को प्रकृति के इशारे थे या अंधविश्वास यह तो 11 मार्च को ही पता चलेगा।   

सोमवार, 6 मार्च 2017

जब अपना ही सोना खोटा हो तो ..............

बर्थडे तो सबको मालूम होता है ,लेकिन फाउन्डेशन डे किसी इसलिए मालूम नहीं है क्योंकि उस पर कभी सोचा ही नहीं और फाउंडेशन क्यों डाली गयी इस पर भी कभी दिमाग नहीं लगाया जाता ------------------------------------ ज्यादा दिमाग पर जोर मत डालिये। आप लोगों को गुड़गोबर नज़र आ रही ,कन्हैया कुमार नज़र आ रहा है , आप लोगों को उमर खालिद नज़र आ रहा है, आप लोगों को हार्दिक पटेल नज़र आ रहा है , रोहित वेमुला याद होगा , अख़लाक़ की मौत के बाद असहिष्णुता की जो सुनामी चलायी गयी थी वो भी याद होगी और अगर मैं इस तरह पीछे चलता जाऊँ तो 2002 का गोधरा और 1990 का कश्मीरी पंडितों के पलायन की तारीख याद होगी। 1988 में कुंडकोलम न्युक्लीअर प्लान्ट बनाना शुरू हुआ 24 साल तक बनता रहा , लेकिन जब उसके शुरू होने के दिन आये तो विरोध करने के लिए एक उदय कुमार जी जाग गए। होने लगा धरना प्रदर्शन। ऐसे ही 60 के दशक से एक बाँध बन रहा था , जिसके बनने से गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के चालीस लाख से ज्यादा लोगों को पीने,और सिंचाई के लिए पानी मिलना है , इन राज्यों को बिजली मिलनी है। लेकिन मेधा पाटकर नाम के प्राणी को बाढ़ और सूखे की मार झेलने वाले लाखों लोगों से ज्यादा चिंता उन सैंकड़ों लोगों की थी जिनकी ज़मीन पर #सरदार_सरोवर_बाँध बन रहा था। इनका साथ दिया अरुंधति रॉय ,आमिर खान जैसे लोगों ने। आपको याद हैं न ये वही लोग हैं जिन्होंने अफ़ज़ल गुरु और याकूब मेमन की फांसी की सजा माफ़ करने के लिए राष्ट्रपति को पत्र लिखा था। यूँ ही याददाश्त को पीछे लेकर जाएँ तो मैं आपको वर्ष 1812 तक ले जा सकता हूँ जब सी आई ए ने #Adoniram_judson नाम के एक धर्मगुरु को प्रायोजित करके हिंदुओं का धर्म परिवर्तित करने के लिए भारत में भेजा था।
ये सब मैंने बर्थडे याद दिलाये हैं। क्या आपको मालूम है कि 1988 से लेकर 2011 तक, 24 साल कुंडकोलम बनता रहा और कोई विरोध नहीं हुआ ??? जैसे ही उस न्युक्लीअर प्लांट की शुरुआत होनी थी , मुम्बई स्थित अमरीकी वाणिज्यदूतावास से एक मेल (Wikileaks cable 06MUMBAI1803_a) सी आई ए को गई और शुरू हो गया विरोध।
1975 में अमरीकी सीनेट ने सी आई ए तथा गिरिजाघरों के सम्बन्धो को जानने के लिए सीनेटर फ्रैंक चर्च की अध्यक्षता में एक समिति गठित की जिसका भारत के परिपेक्ष्य में एक अंश कहता है ---- सी आई ए धार्मिक लोगों को तनख्वाह,बोनस और खर्चे देती रही है। उनके द्वारा चलाये गए प्रोजेक्ट्स की फंडिंग करती रही है। अधिकतर व्यक्तियों को गुप्त गतिविधियां चलाने के लिए पैसा दिया जाता था। 60 के दशक में सैकड़ों लोग गुप्त गतिविधियाँ चलाते थे मूलतः वामपंथ से प्रतिस्पर्धा करने के लिए . . . . . . . . . . . . . . हाल में अमरीका के लिए सबसे घातक एक पादरी के सी आई ए से सम्बन्ध हैं जो कि विद्यार्थियों और धार्मिक मामलों में विचारों की विभिन्नता के लिए जासूसी करता है। 70 के दशक में अमरीका सरकार इस पादरी को एक लाख रूपये सालाना तनख्वाह के इलावा अक्सर उपहार दिया करती थी।
इस पादरी के रूप में जासूस का नाम तो नहीं मालूम , पर भारत में सामाजिक और धार्मिक मामलों के जानकारों के लिए #जॉन_दयाल ,#कांचा_इल्लैया और #सुनील_सरदार के नाम से अनजान नहीं होंगे। ये तीनों भारतीय हैं ,लेकिन दुनिया का ऐसा कोई मंच नहीं है जहाँ से ये भारत और हिन्दुओं को बदनाम करने का मौका छोड़ते हों। अगर सिर्फ बदनाम करने की बात होती तो शायद इन्हें नज़रअंदाज़ किया जा सकता था, लेकिन भारत में रह कर धर्मान्तरण करवाना और जेनयू जैसे शिक्षण संस्थानों में सेमिनारों में हिंदुओं और हिंदुओं के आराध्यों के अपशब्द कहना इनका पेशा है। बस इनका प्रतिरोध नहीं होना चाहिए। गलत या सही किसी अल्पसंख्यक के साथ कोई घटना हो जाये उसके लिए हिंदुओं को ज़िम्मेदार ठहराना इनका मूलकर्तव्य है। किसी भी मुद्दे पर मीडिया के साथ मिल कर इतना हो हल्ला मचाते हैं कि सरकार मजबूरी में हिंदुओं पर कार्यवाही करने के लिए बाध्य हो जाये। ये चाहें तो कितना भी धर्म परिवर्तन करवा लें बस हिन्दू संगठन #घर_वापसी न करवाएं।
 सी आई ए का एक मुखौटा है " समर इंस्टिट्यूट ऑफ़ लिंग्विस्टिक्स " जिसे USAID से पैसा मिलता है। महाराष्ट्र के इसकी एक शाखा " इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ क्रॉस कल्चरल कम्युनिकेशन" के नाम से है। 70 के दशक में #एलएसडी एक मनोविकृतकारी ड्रग का परीक्षण भारत में इसी संस्थान ने किया था। चूँकि ये लोग भारतियों की धार्मिक भावनाओं को नहीं हिला पा रहे थे तो #ओशो_आश्रम ,#इस्कॉन, और #आनंदमार्ग में घुसपैठ करके उनके अनुयायियों पर इस ड्रग का इस्तेमाल करके उन्हें आपस में लड़वा कर उन्हें बदनाम करवाने में सीआईए का ही हाथ था।
60 के दशक में थे एक अतिउत्साही ईसाई मत के प्रवर्तक #लेस्टर_डोनिगर जिन्हें अमरीकी सरकार से धर्मान्तरण के लिए भरपूर पैसा मिलता था। इनकी हैं एक बिटिया जिसका नाम है #वेंडी_डोनिगर। याद आया आपको यह नाम ??? जिन्होंने , "द हिन्दू : एन आल्टरनेटिव हिस्ट्री"लिखी थी । यह वही किताब है जिसने देवी देवताओं की जानवरों से तुलना करके हिंदुओं का मज़ाक उड़ाया था। यह बात दीगर है की इस पुस्तक को दीनानाथ बत्रा जी ने अदालत के द्वारा प्रतिबंधित करवा दिया था। लेकिन अफ़सोस बहुत से हिंदुओं ने इस प्रतिबन्ध का विरोध किया , अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रश्न चिन्ह लगाया था । लेकिन तथ्य जो बहुतों को नहीं मालूम वो यह है कि इसी #वेंडी_डोनिगर को अमरीकी सरकार ने विद्यार्थी के छद्म रूप में 1963-64 में $6000 का वज़ीफ़ा दे कर भारत की जासूसी करने के लिए भेज था।
कौन हैं वो लोग जो अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोज़ स्यापा डालते है ???
ज़रा सा दिमाग पर ज़ोर डालिये, एम एफ हुसैन ने हिंदुओं के साथ वही किया था जो चार्ली हेब्दो ने मुसलामानों के साथ किया था। हुसैन देश छोड़ कर भाग गया जब हिन्दू संगठनों ने अदालत का सहारा लिया। चार्ली हेब्दो ने देश नहीं छोड़ा। हुसैन स्वाभाविक मौत मर गया , चार्ली हेब्दो को मुसलमानों ने मार डाला इसके बाद हुसैन की मौत पर भारत के बुद्धिजीवी बोलते हैं --- RIP Maqbool Fida hussain , victim of Lunatic & apathy of some Indians .Alvida Hussain Saab.
और चार्ली हेब्दो पर यही हिन्दू बुद्धिजीवी बोलते हैं ---Condemn the murders in Paris. But verbal violence begot violence there .
इस तरह की बातें करने की मानसिकता यूँ ही पैदा नहीं हो जाती। ---1935 में आर के नारायण द्वारा लिखित " Swami and Friends " में नारायण लिखते हैं कि स्कूल के बच्चों में ईसाईयत के भाव भरने के लिए अध्यापक बच्चों को कहते है ____" ओ दयनीय बेवकूफों ! क्या हमारे जीसस तुम्हारे कृष्ण की तरह नाचती हुई लड़कियों के साथ इधर उधर आवारा गर्दी करते थे ???? क्या हमारे जीसस तुम्हारे दुरात्मा कृष्ण की तरह मख्खन चुराते घूमते थे ??? क्या हमारे जीसस तुम्हारे कृष्ण की तरह अपने आस पास वालों पर काला जादू करते थे ????
ये बात 1935 की है। 1967 में अमरीका से पैसा और सम्मान मिलने के बाद रोमिला थापर सरीखों ने भारतीय इतिहास के साथ कैसा बलात्कार किया यह जानने के लिए अरुण शौरी द्वारा लिखित “Eminent Historians: Their Technology, Their Life, Their Fraud” , पढ़िए। आपको समझ आ जायेगा कि वर्तमान इतिहासकारों ने भारत की गरिमा को मिटटी में मिलाने के लिए विदेशियों के पैसे के दम पर तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा लिखित इतिहास को ही झुठला दिया है, जिन्होंने इस्लाम के दमनकारी चक्र को बहुत गौरान्वित हो कर वर्णित किया था।

आज के बच्चों की मानसिकता कैसे गुरमेहर या कन्हैय्या जैसी हो जाती है , उसे समझने के लिए कक्षा 1 से कक्षा 10 तक की किसी भी बोर्ड की पुस्तकें उठा कर देख लीजिये आपको समझ आ जायेगा की क्यों आज शान्ति की अपील करने वाली गुरमेहर चलती गाड़ी में दारु की बोतल के उत्तेजक डांस कर सकती है।
1917 में रूस में पैदा हुए वामपंथ ने 1928 में ही भारत की जड़ें खोदनी शुरू कर दीं थीं। 1962 में जब चीन ने भारत पर अतिक्रमण किया तो भारतीय वामपंथी चीन के साथ खड़े थे।मैं उसी चीन की बात कर रहा हूँ जो भाषाओँ के आधार पर भारत को 28 टुकड़ों में तोडना चाहता है। भारतीय इतिहास को बदरूप करने वाले और NCERT का पाठ्यक्रम तय करने वाले सारे तथाकथित बुद्धिजीवी वामपंथी है। ISI का ज़िक्र करके पोस्ट बड़ी करने से कोई फायदा नहीं।
 आपको क्या लगता है कि रॉकफेलर स्कालरशिप , मैगासेसे अवार्ड , फोर्ड फाउंडेशन, ग्रीनपीस आर्गेनाईजेशन बहुत चिंतित हैं भारत के प्रति जो हजारों करोड़ प्रतिवर्ष भारत को दे रहीं थीं ??? या KGB (रूस की ख़ुफ़िया एजेंसी) बेवकूफ थी जो 1970 से कांग्रेस को पैसा दे रही थी ??? या ज़ाकिर नाइक का पीस फाउंडेशन कैसे 3000 करोड़ की हो गयी ??? कैसे 1990 के बाद अपने को दलित कहने वालों को हिंदुओं से अलग करने की बाढ़ आ गयी ??? कैसे जब कोई व्यक्ति आपसी रंजिश में मारा जाता है तब भी मीडिया चिल्ला चिल्ला कर बताता है कि मरने वाला दलित था ???
वैसे तो पिछले सालों में इन ईसाईयों और कसाईयों ने भारतीय समाज का ताना बाना छिन्न -भिन्न कर दिया है , फिर भी ईश्वर को या मोदी जी को धन्यवाद कीजिये कि 13000 NGO की विदेशी फंडिंग पर बैन लगा दिया। फिर सब पूछते हैं कि मोदी ने हिंदुओं के लिए क्या किया ????
हिलता हुआ पेड़ और झड़ते हुए पत्ते सबको नज़र आ रहा हैं लेकिन उनकी नींव में मठ्ठा कौन डाल रहा है, कोई जानना नहीं चाहता है। ज़रा जानने की कोशिश कीजिये कि इस पूरे प्रकरण की फाउन्डेशन कौन डाल रहा है। फिर मुंह से यही निकलता है कि जब अपना ही सोना खोटा हो तो सुनार को दोष कैसे दें।

शनिवार, 26 नवंबर 2016

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षतिः।

अशरफ (सैय्यद मीर),अजलफ (शेख, पठान ), अरजाल (जुलाहा , हज्जाम), अजलाम और पसमांदा (भंगी, मेहतर ,चमार)  ---- मुस्लिम समाज में ये वर्ण बने अपनी पैदाइश , धर्मान्तरण और अपनी दिनचर्या के आधार पर। अपने हक़ों के लिए पसमांदा, अरजाल अजलाफ और अजलाम सभी लड़ रहे हैं लेकिन अपने धर्म और धर्मशास्त्रों की धज्जियाँ उड़ा कर या उन्हें जला कर नहीं। अपने धर्म और धर्म शास्त्रों का अपमान कैसे करना है , यह कोई सीखे तो उन हिंदुओं से जो विदेशी चंदे पर पल रहे है। धर्म का अपमान करना एक मानसिकता हो सकती है लेकिन धर्म का अपमान सहने वाले हिंदुओं को क्या कहा जाये जो मूकदर्शक बने हुए हैं। महर्षि मनु ने उनके लिए भी मेरे संज्ञान में दो कथन कहे हैं ----- 
यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च ।हन्यते  प्रक्षेमानानां  हतास्तत्र सभासदः ।। अध्याय 8 श्लोक 14
अर्थात जिस सभा में अधर्म से धर्म, असत्य से सत्य, सब सभासदों के देखते हुए मारा जाता है, उस सभा में सब मृतक के समान हैं।

आज महर्षि मनु और मनुस्मृति पर स्त्रीविरोधी और दलित विरोधी होने का आक्षेप लगाने वालों ने न तो कभी मनुस्मृति पढ़ी और न ही अम्बेडकर को पढ़ा जिन्होंने मनु का घोर विरोध किया था। 
गौर करें अम्बेडकर ने भी चतुर्वर्ण के विषय में "Annihilation Of Castes "  --- में लिखा है कि chaturvarn is based on worth. और दूसरे उन्होंने भी मनुस्मृति के श्लोकों का अपने हिसाब से व्याख्या  जैसे --- यह कैसे हो सकता है कि ब्राह्मण ही पढ़ेगा और पढ़ायेगा , क्षत्रिय ही शस्त्र धारण करेगा और वैश्य ही व्यापर करेगा।  यदि उन्होंने इसे मनुस्मृति के अंग्रेज़ी अनुवाद न पढ़ कर संस्कृत के श्लोकों की व्याख्या इस प्रआर की होती कि जो पढ़ेगा और पढ़ायेगा वो ब्राह्मण है , जो शस्त्र धारण करेगा और प्रजा की रक्षा करेगा वो क्षत्रिय है और जो व्यापार करेगा वो वैश्य है तो शायद उन्हें मनु से इतनी नफरत न होती और आज समाज में इतनी वैमनस्यता भी नहीं फैलती। अम्बेडकर ने प्रक्षेपित श्लोकों का तो संज्ञान लिया कि जो शूद्र वेद पढ़ेगा या सुनेगा उसकी जिह्वा काट दी जाएगी और कान में पिघला  हुआ सीसा डाला जायेगा लेकिन उन्होंने एक बार भी मनु द्वारा रचित निम्न श्लोकों का संज्ञा बिलकुल नहीं लिया कि एक ही व्यक्ति दो विरोधाभासी बातें कैसे लिख सकता है ????
( पोस्ट को छोटा रखने के उद्देश्य से सिर्फ श्लोकों की संख्या के साथ  श्लोकों  का भावार्थ ही लिख रहा हूँ )
अध्याय 4 श्लोक 35 -----कम अंगों वालों या अपंगों, या विद्याविहीन ,आयु में बड़े   और रूप और धन से रहित और अपने से निम्न वर्ण वर्ण वालों पर कभी आक्षेप /व्यंग्य न करें। 
अध्याय 4 श्लोक 51 --- पुत्र और शिष्य से भिन्न अन्य किसी व्यक्ति पर दण्ड न उठायें और क्रोधित हो कर भी न मारें , न वध करें। पुत्र और शिष्य को भी केवल शिक्षा देने के लिए ताड़ना करें। 
अध्याय 4 श्लोक 24 ----सिखाये हुए सुन्दर लक्षणों से युक्त सुन्दर रंगरूप से शीघ्रगामी पशुओं से चाबुक की मार से बहुत पीड़ा न देता हुआ सवारी करे। 
अध्याय 3 श्लोक 44 --- चूल्हा चक्की झाड़ू ओखली पानी का घड़ा , गृहस्थों के लिए ये पांच हिंसा के स्थान हैं, इनका प्रयोग करते समय गृहस्थ जाने अनजाने हिंसा जनित पापों में बंध जाता है। 
 --- और भी बहुत से श्लोक हैं जो किसी भी प्रकार की हिंसा और प्रताड़ना को पाप की श्रेणी में रखते हैं, तो मनुस्मृति का अंध विरोध करने वाले कभी दिमाग लगाकर यह क्यों नहीं सोच पाते कि जो व्यक्ति जानवर को कोड़ा तक मारने को हिंसा की श्रेणी में रखता है वो किसी की जुबान काटने या कान में सीसा डालने जैसी हिंसा की विरोधीभासी बातें कैसे लिख सकता है ????
मनु की वर्णव्यवस्था में ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शुद्र कैसे बनते थे ?????

अध्याय 2 , श्लोक 12 -13 ---मनु के अनुसार जो पाने बच्चों को ब्राह्मण बनाना चाहे वो उनका उपनयन पांचवें वर्ष तक क्षत्रिय छठे वर्ष और वैश्य का आठवें वर्ष में करवा दें। यदि इन वर्षों में उपनयन न करवा पाएं उनमे ब्राह्मणों का उपनयन सोलहवें वर्ष ,क्षत्रिय वर्ण के इच्छुक बाईस वर्ष और वैश्य वर्ण के इच्छुक चौबीस वर्ष तक करवा लें। जिनका उपनयन इस आयु सीमा में नहीं हो पाता था वे शूद्रों की श्रेणी में आ जाते थे। यह उपनयन भी बच्चो के aptitude पर निर्भर करता था। 
ऐसा भी नहीं था कि यदि कोई एक वर्ण में चला गया तो उसका वही वर्ण रहता था---
अघ्याय 2 श्लोक 62 -- जो मनुष्य नित्य प्रातः और सांय सन्ध्योपासना नहीं करता उसको शुद्र के समान समझकर द्विजकुल से से अलग करके शूद्रकुल में रख देना चाहिए। 
जो शरीर से बलिष्ठ होता था परन्तु जिसकी पढ़ने लिखने में रूचि नहीं होती थी और जो पढ़लिख नहीं पाता था वो शुद्र बन कर दूसरों की सेवा करके अपना जीवनयापन करता था। जब सेवा करता था तो कोई संशय नहीं कि अन्यवरणो के संपर्क में भी आता ही होगा ,तो यह कहना अनुचित है कि शूद्रों को अछूत समझ जाता था। शूद्रों को क्या सम्मान दिया जाता था उसके लिए एक दो श्लोक लिख रहा हूँ। 
अध्याय 3 श्लोक 80 -- विद्वान् अतिथियों द्वारा भोजन क्र लेने पर और अपने सेवकों आदि के खा लेने पर शेष बचे हुए भोजन को पति पत्नी खायें। 
अध्याय --3 श्लोक, 66 67 एवं  81 -- दिव्यगुण सम्पन्न विद्वानों ,विद्या के प्रत्यक्षकर्ता ऋषियों को , माता पिता आदि पालक व्यक्तियों को , गृहस्थ द्वारा भरण पोषण की अपेक्षा रखने वाले असहाय, अनाथ कुष्ठ रोगी, सेवक आदि को भजन दान द्वारा सत्कृत करके उसके बाद इनसे शेष बचे भोजन को खाने वाला हो अर्थात उस शेष भोजन को खाया करे। 
बात जहाँ से शुरू हुई थी वहीँ पर ख़त्म करता हूँ फ़ेसबुकिया कागज़ी शेरोन के लिए मनु महाराज ने एक बात और कही थी  ----
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षतिः। 
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोवधीत। ---अध्याय 8 श्लोक 15 
भावार्थ ----- जो पुरुष धर्म का नाश करता है , उसी का नाश धर्म कर देता है। और जो धर्म की रक्षा करता है उसकी धर्म भी रक्षा करता है। मारा हुआ धर्म हमको कभी न मार डाले, इसलिए धर्म का हनन या त्याग कभी नहीं करना चाहिए।
पूर्वज पढ़े नहीं और खुद कुछ पढ़ना नहीं चाहते और दोष देते हैं #मनु को कि उन्होंने शूद्र बना दिया। जो प्रमाणपत्र लेकर खुद को शूद्र कहते हैं उन्हें सुझाव है कि पढ़ें लिखें अपनी मानसिकता सुधारें और अपना वर्ण बदलें ( जिसकी आज के समय में कोई अहमियत नहीं बची है। ) बाकि मूक दर्शकों से निवेदन है कि यदि ज़मीन पर कच नहीं कर सकते तो आभासी दुनिया में ही इस पोस्ट को शेयर करके भ्रांतियों को दूर करें एवं अपने जीवित होने का प्रमाण दें।
जिसके दिल में भी 6 दिसंबर 2016  को जयपुर में मनुस्मृति जलने के अरमान हैं, वो पूरा दम लगा कर कोशिश कर ले ,----------

सोमवार, 21 नवंबर 2016

मनुस्मृति का विरोध क्यों ?????

मनुस्मृति को स्त्रीविरोधी बतानेवाले कूढ़मगजों ने पता नहीं कौन सी मनुस्मृति पढ़ी है , पढ़ी भी है या नहीं। या अंग्रेजों द्वारा बिना समझे अनुवादित मनुस्मृति में चिन्ता को को चिता पढ़ कर आज तक छाती कूट रहे हैं। बाजार से मात्र अनुवादित मनुस्मृति खरीद कर पढ़ने वालों की जानकारी में ज़रा सा इज़ाफ़ा कर दूँ कि आज जो बाज़ार में मनुस्मृति उपलब्ध है उसमे 2685 श्लोक हैं, और शोध के उपरान्त पाया गया है कि मूल मनुस्मृति में 1214 ही श्लोक हैं बाकि के 1471 श्लोकों में से अधिकांश  इसमें वर्ष 1000 AD  के बाद स्वार्थवश मिलाये गए हैं।
अगर मनु स्त्रीविरोधी होते तो वे निम्न श्लोक प्रश्नकर्ताओं को न #कहते ------
1) पितृभिभ्रार्तृभिश्चैताः पतिभिर्देवरैस्तथा ।
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः - अध्याय 3 श्लोक 55 
अर्थात --- पिता, भ्राता ,पति और देवर को योग्य है कि अपनी कन्या, बहन स्त्री और भौजाई आदि स्त्रियों की सदा पूजा करें अर्थात यथायोग्य मधुर भाषण ,भोजन, वस्त्र आभूषण आदि से प्रसन्न रखें। जिनको कल्याण की इच्छा हो वे स्त्रियों को कभी क्लेश न दें. 

2) यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैस्तास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः -----अध्याय 3 श्लोक 56 
 अर्थात जिस कुल में नारियों की पूजा अर्थात सत्कार होता है उस कुल में देवता ( दिव्यगुण --दिव्यभोग और उत्तम संतान ) होते हैं। और जिस कुल में स्त्रियों की पूजा/सत्कार नहीं होता वहां जानो उनकी सब क्रिया निष्फल है।   
3) शोचयन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् ।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ।। अध्याय 3 श्लोक 57 
जिस कुल में स्त्रियाँ अपने अपने पुरुषों के वेश्यागमन, अत्याचार व व्यभिचार आदि दोषों से शोकातुर रहती हैं वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है। और जिस कुल में स्त्रीजन पुरुषों के उत्तम आचरणों से प्रसन्न रहतीं हैं वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता है। 
4) जामयो यानि गेहानि शपन्स्यप्रतिपूजिताः।
तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः ।। अध्याय 3 श्लोक 58 
जिन कुलों और घरों में सत्कार को प्राप्त करके स्त्रीलोग जिन गृहस्थों को श्राप देती हैं वे कुल तथा गृहस्थ जैसे विष देकर बहुतों को एक बार नाश कर देवें वैसे चारों और से नष्ट भ्रष्ट हो जाते हैं। 
5) तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः।
भूतिकामैर्नरैनित्यं सत्कारेषूत्सवेषु च।। अध्याय 3 श्लोक 59 
इस कारण ऐश्वर्य की इच्छा करने वाले पुरुषों को योग्य है कि इन स्त्रियों को सत्कार के अवसरों और उत्सवों में भूषण,वस्त्र ,खानपान आदि से सदा सत्कारयुक्त प्रसन्न रखें। 
6 ) सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च ।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ।। अध्याय 3 श्लोक 60 
हे गृहस्थों ! जिस कुल में भार्या से प्रसन्न पति तथा पति से भार्या सदा प्रसन्न रहती है उसी कुल में निश्चित कल्याण और दोनों परस्पर अप्रसन्न रहें तो उस कुल में नित्य कलह वास करती है। 

वैसे प्रेमियों के साथ मिलकर पतियों और बच्चों को मारने वाली या सेक्स के लिए कपड़ों की तरह पुरुषों को बदलने वाली स्त्रियों के लिए भी महर्षि मनु ने दो चार श्लोक #कहे हैं यदि उन श्लोकों की वजह से यदि मनुस्मृति स्त्रीविरोधी है तो इसे जलाने वाले अपने में और सड़क के जानवरों में कोई फर्क न समझें।
( आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित #विशुद्ध_मनुस्मृति के आधार पर ) 

शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

हिंदुत्व पर प्रश्नचिन्ह

इनसब निराशाओं के बीच हम यही सोच कर दिल बहला लेते हैं #जीना_यहाँ_मरना_यहाँ_इसके_सिवा_जाना_कहाँ  ---
#Ban_Use_Of_Hindutva ------Times Of India,  Issue dt-- Oct 21,2016. ((हिंदुत्व का प्रयोग बंद हो ----PIL filed by तीस्ता सीतलवाड़,शम्सुल इस्लाम ,और दिलीप सी मंडल )
#SC_agrees_to_hear_plea_seeking_ban_on_Gau_Rakshaks-------Times of India ,Issue dt. Oct--22, 2016 (गौरक्षकों पर प्रतिबन्ध लगे --PIL filed by तहसीन पूनावाला )
बहुत विस्तार में नहीं जायेंगे , लेकिन 7000 वर्ष पुरानी  सिंधु घाटी की सभ्यता के सिंध प्रान्त ( वर्तमान का कराची, हैदराबाद,सुक्कुर ,लरकाना )में वर्ष 695 AD में कासिम के आक्रमण तक हिन्दू और बौद्ध रहा करते थे। यहाँ के राजा दाहिर की उसके #अरबी सेनापति के विश्वासघात के कारण मोहम्मद कासिम के हाथों  हार हुई और वहां के लोगों ने या तो सर कटवा कर अपनी जान दे दी या कुछ और कटवा कर अपनी जान बचा ली। तमाम कत्लेआम के बावज़ूद आज के पाकिस्तान  के 95% हिन्दू जो आज पूरी जनसँख्या का 5 % से कम हैं सिंध राज्य में रहते हैं। 1924 में धर्म (मुस्लिम) के आधार पर इसे बम्बई प्रेसीडेंसी से अलग करने की मांग उठी और 1 अप्रैल 1936 में इसे बम्बई से अलग कर दिया गया। यह था धर्म के नाम पर देश का पहला टुकड़ा । 

इस्लाम जो अरब से फैलता हुआ बंगाल तक पहुँच गया था , पहली बार कब खतरे में पड़ा इसका कोई आधिकारिक दस्तावेज़ नहीं है , लेकिन 1901 /1906 में मुस्लिम लीग को राजनैतिक दल बनाने के साथ यह भी घोषणा हो गयी की इस्लाम खतरे में है। 1930 में सिंध के धर्म के आधार पर अलग होते हुए अभियान की सफलता देखते हुए ,मोहम्मद इक़बाल ने " टू नेशन थ्योरी " को जन्म दे दिया। फिर आगे की कहानी बताने की ज़रुरत नहीं है कि खतरे में पड़े इस्लाम को बचाने के लिए धर्म के आधार पर #पकिस्तान पैदा कर दिया गया। 
जिनका हर छींक पर इस्लाम खतरे में पड़ जाता है, उनमे से बहुत से पकिस्तान चले गए, लेकिन कुछ चूतियों की वजह से ढेर सारे छिछड़े भारत में रहगये जो आज यह कह कर बदबू फैला रहे हैं कि, #हिन्दू_और_हिंदुत्व शब्द को चुनावों में प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। 
#तहसीन_पूनावाला के हिसाब से Section 12 of the Gujarat Animal Prevention Act, 1954, Section 13 of maharashtra Animal Prevention Act,1976, and section 15 of Karnataka Prevention of Cow slaughter and cattle preservation Act 1964,जो कि उन व्यक्तियों के बचाव का प्रावधान करते हैं जो अच्छी निष्ठां से इन कानूनों अमल लाने में मदद करते हैं , गैर कानूनी हैं। जब अन्य कानूनों की तरह सरकारें इन कानूनों का पालन करवाने में असफल हो गयीं तो तहसीन पूनावाला ने संविधान के इन प्रावधानों को ही चुनौती दे दी और #गौरक्षकों को प्रतिबंधित करने की मांग कर दी। 
ट्रिप्पल तलाक के विषय में जिसे 20 से ज्यादा मुस्लिम देश प्रतिबंधित कर चुके है, मैं कुछ नहीं कहूँगा क्योंकि मैं चाहता ही नहीं इनकी स्थिति में कोई सुधार हो। ये ऐसे ही जाहिल रहें तभी इनकी कायदे से दुर्गति होगी। 
लेकिन #हिंदुत्व शब्द का विरोध करने वालों से मैं पूछना चाहता हूँ , कि जब #जय_भीम_जय_मीम के नारे लगते हैं तब ये क्यों वहीँ घुस जाते हैं जहाँ से निकले थे ??? जब पूरे देश से एक ही कौम के लड़के लड़कियाँ ISIS ज्वाइन करने के जुर्म में पकडे जाते हैं तब इनके लोकतान्त्रिक अधिकार कहाँ चले जाते हैं। जब कश्मीर में पकिस्तान जिंदाबाद के नारे और सैन्य बालों पर हमले एक ही कौम के लोग करते हैं तब ये उनके खिलाफ जनहित याचिका क्यों नहीं डालते।  जब मुलायम सिंह और लालू यादव खुल्लम खुल्ला #मुस्लिम_यादव समीकरण पर चुनाव लड़ते हैं , तब ये लोग सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं जाते ??? जब मनमोहन सिंह देश के 80% हिंदुओं के मुंह पर यह बोलते हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ मुसलामानों का है तब क्यों इनके मुंह में दही जम जाता है ??? जब बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी अपने वित्तीय बजटों में प्रतिवर्ष विशेषरूप से मुसलाम्मानों के लिए सौगातों की झड़ी लगा देते हैं तब इन लोगों की आवाज़ क्यों नहीं निकलती ???? जब तेलंगाना में ईद के मौके पर वहां का मुख्यमंत्री मुसलामानों के लिए झोली खोल देता है तब यह लोग कुछ क्यों नहीं बोलते ??? विदेशों से इस्लाम और ईसाइयत के प्रचार के लिए भरपूर पैसा आता है , वक्फ बोर्ड और चर्च अपनी कमाई का एक रुपया भी देश के राजस्व में नहीं देते , लेकिन मंदिरों का चढ़ावा जब सरकारें वसूल लेती हैं और उसका 80% इनके ऊपर खर्च कर देतीं हैं तब ये लोग हिंदुत्व का विरोध क्यों नहीं करते ????  
कश्मीर से लेकर केरल तक सरकारें अल्पसंख्यक तुष्टिकरण में लगी हुई हैं। कश्मीर में हिन्दू रह नहीं सकते और केरल में  लोकसेवा आयोग केरल द्वारा सरकारी नौकरियों में 12% आरक्षण मुस्लिमों को है। भारत भर में मदरसा शिक्षकों को , मेरे ख्याल से मदरसों में कुरान और इस्लामी शिक्षा के अतिरिक्त कुछ नहीं पढ़ाया जाता उनको भी तमाम राज्य सरकारें वेतन देती हैं , किसके टैक्स से ??? भारत भर में संविधान प्रद्दत न्यायव्यवस्था को अंगूठा दिखाते हुए समानांतर शरीयत अदालतें स्थापित कर दी गयीं है , तब इन्हें कोई संविधान के विरुद्ध क्यों नहीं बताता ????
दुनिया भर में कोई ऐसा देश नहीं है जो हज के लिए बहुसंख्यकों से वसूले गए टैक्स को इन्हें सब्सिडी के रूप में देता हो , तब ये किसी अदालत का दरवाज़ा क्यों नहीं खटखटाते कि सरकार का यह कदम गैरसंवैधानिक और कुरान के खिलाफ है ??? 
जब भारत भर के राजनैतिक दल इफ्तार पार्टियों का आयोजन करते हैं और टोपी पहन कर उन पार्टियों में शामिल होते हैं तब कोई सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा नहीं खटखटाता कि इस्लाम का राजनीतिकरण किया जा रहा है। 
अगर 80% लोगों की भावनाओं को ध्यान में रख कर कोई कदम उठाने की बात होती है तो तथाकथित बुद्धिजीवियों के पिछावड़े में मिर्चें लगने लगती हैं और सुप्रीम कोर्ट भी ऐसी जनहित कही जाने वाली याचिकाओं का संज्ञान लेता है। यह वही सुप्रीम कोर्ट है , जो दही हांड़ी , होली और दिवाली कैसे मनाई जाये इस पर तो दिशा निर्देश दे देता है लेकिन मुहर्रम और ईद कैसे मनाई जाये इसे धार्मिक मामला करार दे कर किनारा कर लेता है और यह वही सुप्रीम कोर्ट है जो यूनिफार्म सिविल कोड के मामले में इस धर्म संबंधी मामला बता कर गेंद को सरकार के पाले में डाल कर तमाशा देखता है और यह वही सुप्रीम कोर्ट है , जिसे न तो कृष्ण जी की छत में लटकी हुई हुई हांड़ी तोड़ते हुए की तस्वीर कभी नज़र नहीं आयी और जिसे कश्मीर से कन्याकुमारी तक ये टोपी पहनते हुए नेता कभी नज़र आये, जो धर्म के नाम पर बनते हुए देश में रह गए छिछडों की याचिकाओं पर अपना समय बर्बाद कर सकता है , लेकिन कदम कदम पर होते बहुसंख्यकों के दमन के षड्यंत्र का संज्ञान नहीं ले सकता।  

आने वाले दिनों में #सुप्रीम कोर्ट हिन्दुत्व शब्द पर बहस सुनेगा और गौरक्षकों पर प्रतिबन्ध लगाएगा और JNU में होने वाली देश विरोधी गतिविधियों और बंगाल में होते हुए दंगों पर आँखें मूंदे रहेगा। 
इनसब निराशाओं के बीच हम यही सोच कर दिल बहला लेते हैं #जीना_यहाँ_मरना_यहाँ_इसके_सिवा_जाना_कहाँ 

हिंदुत्व पर प्रश्नचिन्ह

इनसब निराशाओं के बीच हम यही सोच कर दिल बहला लेते हैं #जीना_यहाँ_मरना_यहाँ_इसके_सिवा_जाना_कहाँ  ---
#Ban_Use_Of_Hindutva ------Times Of India,  Issue dt-- Oct 21,2016. ((हिंदुत्व का प्रयोग बंद हो ----PIL filed by तीस्ता सीतलवाड़,शम्सुल इस्लाम ,और दिलीप सी मंडल )
#SC_agrees_to_hear_plea_seeking_ban_on_Gau_Rakshaks-------Times of India ,Issue dt. Oct--22, 2016 (गौरक्षकों पर प्रतिबन्ध लगे --PIL filed by तहसीन पूनावाला )
बहुत विस्तार में नहीं जायेंगे , लेकिन 7000 वर्ष पुरानी  सिंधु घाटी की सभ्यता के सिंध प्रान्त ( वर्तमान का कराची, हैदराबाद,सुक्कुर ,लरकाना )में वर्ष 695 AD में कासिम के आक्रमण तक हिन्दू और बौद्ध रहा करते थे। यहाँ के राजा दाहिर की उसके #अरबी सेनापति के विश्वासघात के कारण मोहम्मद कासिम के हाथों  हार हुई और वहां के लोगों ने या तो सर कटवा कर अपनी जान दे दी या कुछ और कटवा कर अपनी जान बचा ली। तमाम कत्लेआम के बावज़ूद आज के पाकिस्तान  के 95% हिन्दू जो आज पूरी जनसँख्या का 5 % से कम हैं सिंध राज्य में रहते हैं। 1924 में धर्म (मुस्लिम) के आधार पर इसे बम्बई प्रेसीडेंसी से अलग करने की मांग उठी और 1 अप्रैल 1936 में इसे बम्बई से अलग कर दिया गया। यह था धर्म के नाम पर देश का पहला टुकड़ा । 

इस्लाम जो अरब से फैलता हुआ बंगाल तक पहुँच गया था , पहली बार कब खतरे में पड़ा इसका कोई आधिकारिक दस्तावेज़ नहीं है , लेकिन 1901 /1906 में मुस्लिम लीग को राजनैतिक दल बनाने के साथ यह भी घोषणा हो गयी की इस्लाम खतरे में है। 1930 में सिंध के धर्म के आधार पर अलग होते हुए अभियान की सफलता देखते हुए ,मोहम्मद इक़बाल ने " टू नेशन थ्योरी " को जन्म दे दिया। फिर आगे की कहानी बताने की ज़रुरत नहीं है कि खतरे में पड़े इस्लाम को बचाने के लिए धर्म के आधार पर #पकिस्तान पैदा कर दिया गया। 
जिनका हर छींक पर इस्लाम खतरे में पड़ जाता है, उनमे से बहुत से पकिस्तान चले गए, लेकिन कुछ चूतियों की वजह से ढेर सारे छिछड़े भारत में रहगये जो आज यह कह कर बदबू फैला रहे हैं कि, #हिन्दू_और_हिंदुत्व शब्द को चुनावों में प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। 
#तहसीन_पूनावाला के हिसाब से Section 12 of the Gujarat Animal Prevention Act, 1954, Section 13 of maharashtra Animal Prevention Act,1976, and section 15 of Karnataka Prevention of Cow slaughter and cattle preservation Act 1964,जो कि उन व्यक्तियों के बचाव का प्रावधान करते हैं जो अच्छी निष्ठां से इन कानूनों अमल लाने में मदद करते हैं , गैर कानूनी हैं। जब अन्य कानूनों की तरह सरकारें इन कानूनों का पालन करवाने में असफल हो गयीं तो तहसीन पूनावाला ने संविधान के इन प्रावधानों को ही चुनौती दे दी और #गौरक्षकों को प्रतिबंधित करने की मांग कर दी। 
ट्रिप्पल तलाक के विषय में जिसे 20 से ज्यादा मुस्लिम देश प्रतिबंधित कर चुके है, मैं कुछ नहीं कहूँगा क्योंकि मैं चाहता ही नहीं इनकी स्थिति में कोई सुधार हो। ये ऐसे ही जाहिल रहें तभी इनकी कायदे से दुर्गति होगी। 
लेकिन #हिंदुत्व शब्द का विरोध करने वालों से मैं पूछना चाहता हूँ , कि जब #जय_भीम_जय_मीम के नारे लगते हैं तब ये क्यों वहीँ घुस जाते हैं जहाँ से निकले थे ??? जब पूरे देश से एक ही कौम के लड़के लड़कियाँ ISIS ज्वाइन करने के जुर्म में पकडे जाते हैं तब इनके लोकतान्त्रिक अधिकार कहाँ चले जाते हैं। जब कश्मीर में पकिस्तान जिंदाबाद के नारे और सैन्य बालों पर हमले एक ही कौम के लोग करते हैं तब ये उनके खिलाफ जनहित याचिका क्यों नहीं डालते।  जब मुलायम सिंह और लालू यादव खुल्लम खुल्ला #मुस्लिम_यादव समीकरण पर चुनाव लड़ते हैं , तब ये लोग सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं जाते ??? जब मनमोहन सिंह देश के 80% हिंदुओं के मुंह पर यह बोलते हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ मुसलामानों का है तब क्यों इनके मुंह में दही जम जाता है ??? जब बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी अपने वित्तीय बजटों में प्रतिवर्ष विशेषरूप से मुसलाम्मानों के लिए सौगातों की झड़ी लगा देते हैं तब इन लोगों की आवाज़ क्यों नहीं निकलती ???? जब तेलंगाना में ईद के मौके पर वहां का मुख्यमंत्री मुसलामानों के लिए झोली खोल देता है तब यह लोग कुछ क्यों नहीं बोलते ??? विदेशों से इस्लाम और ईसाइयत के प्रचार के लिए भरपूर पैसा आता है , वक्फ बोर्ड और चर्च अपनी कमाई का एक रुपया भी देश के राजस्व में नहीं देते , लेकिन मंदिरों का चढ़ावा जब सरकारें वसूल लेती हैं और उसका 80% इनके ऊपर खर्च कर देतीं हैं तब ये लोग हिंदुत्व का विरोध क्यों नहीं करते ????  
कश्मीर से लेकर केरल तक सरकारें अल्पसंख्यक तुष्टिकरण में लगी हुई हैं। कश्मीर में हिन्दू रह नहीं सकते और केरल में  लोकसेवा आयोग केरल द्वारा सरकारी नौकरियों में 12% आरक्षण मुस्लिमों को है। भारत भर में मदरसा शिक्षकों को , मेरे ख्याल से मदरसों में कुरान और इस्लामी शिक्षा के अतिरिक्त कुछ नहीं पढ़ाया जाता उनको भी तमाम राज्य सरकारें वेतन देती हैं , किसके टैक्स से ??? भारत भर में संविधान प्रद्दत न्यायव्यवस्था को अंगूठा दिखाते हुए समानांतर शरीयत अदालतें स्थापित कर दी गयीं है , तब इन्हें कोई संविधान के विरुद्ध क्यों नहीं बताता ????
दुनिया भर में कोई ऐसा देश नहीं है जो हज के लिए बहुसंख्यकों से वसूले गए टैक्स को इन्हें सब्सिडी के रूप में देता हो , तब ये किसी अदालत का दरवाज़ा क्यों नहीं खटखटाते कि सरकार का यह कदम गैरसंवैधानिक और कुरान के खिलाफ है ??? 
जब भारत भर के राजनैतिक दल इफ्तार पार्टियों का आयोजन करते हैं और टोपी पहन कर उन पार्टियों में शामिल होते हैं तब कोई सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा नहीं खटखटाता कि इस्लाम का राजनीतिकरण किया जा रहा है। 
अगर 80% लोगों की भावनाओं को ध्यान में रख कर कोई कदम उठाने की बात होती है तो तथाकथित बुद्धिजीवियों के पिछावड़े में मिर्चें लगने लगती हैं और सुप्रीम कोर्ट भी ऐसी जनहित कही जाने वाली याचिकाओं का संज्ञान लेता है। यह वही सुप्रीम कोर्ट है , जो दही हांड़ी , होली और दिवाली कैसे मनाई जाये इस पर तो दिशा निर्देश दे देता है लेकिन मुहर्रम और ईद कैसे मनाई जाये इसे धार्मिक मामला करार दे कर किनारा कर लेता है और यह वही सुप्रीम कोर्ट है जो यूनिफार्म सिविल कोड के मामले में इस धर्म संबंधी मामला बता कर गेंद को सरकार के पाले में डाल कर तमाशा देखता है और यह वही सुप्रीम कोर्ट है , जिसे न तो कृष्ण जी की छत में लटकी हुई हुई हांड़ी तोड़ते हुए की तस्वीर कभी नज़र नहीं आयी और जिसे कश्मीर से कन्याकुमारी तक ये टोपी पहनते हुए नेता कभी नज़र आये, जो धर्म के नाम पर बनते हुए देश में रह गए छिछडों की याचिकाओं पर अपना समय बर्बाद कर सकता है , लेकिन कदम कदम पर होते बहुसंख्यकों के दमन के षड्यंत्र का संज्ञान नहीं ले सकता।  

आने वाले दिनों में #सुप्रीम कोर्ट हिन्दुत्व शब्द पर बहस सुनेगा और गौरक्षकों पर प्रतिबन्ध लगाएगा और JNU में होने वाली देश विरोधी गतिविधियों और बंगाल में होते हुए दंगों पर आँखें मूंदे रहेगा। 
इनसब निराशाओं के बीच हम यही सोच कर दिल बहला लेते हैं #जीना_यहाँ_मरना_यहाँ_इसके_सिवा_जाना_कहाँ