शनिवार, 29 जुलाई 2017

दरगाहों को पूजेंगे पर धरती को नहीं

#हर_विचार_से_शब्द_बनते_हैं_शब्दों_से_प्रवृति_बनती_है_प्रवृति_से_कृत्य_बनते_हैं। 

पिछले हफ्ते  (27/07/17) टीवी पर मद्रास हाई कोर्ट के वन्देमातरम गाए जाने को अनिवार्य बनाने पर बहस देख रहा था। उसमे सभी मुसलमान वक्ताओं में एक हाजी अली दरगाह के सलाहकार भी थे। इन सलाहकार महोदय समेत सभी मुसलामानों का बस एक ही तर्क था कि हम उस खुदा के इलावा जिसने धरती और आसमान बनाये है किसी और को न तो नमन करेंगे और न ही वन्देमातरम गायेंगे। 
A से अहमदाबाद में बड़ी बड़ी 12 हैं तो B से बैंगलोर में 42 हैं। इसी तरह से अंग्रेजी के अल्फाबेट से शहरों के नाम लिखते जाइये और Z तक से शुरू होने वाले शहरों में मौजूद नामचीन दरगाहों की गिनती कीजिये।  इण्डियन सुन्नी नाम की संस्था ने  एक वेब साइट औलिआ ए हिन्द बनायीं है जिसमें भारत वर्ष के 257 शहरों में मौजूद दरगाहों के विषय में संक्षेप में बताया हुआ है।और यहाँ होने वाले चमत्कारों का भी वर्णन किया है। इनमे उत्तर भारत में  श्रीनगर की दरगाह हज़रतबल भी है तो दक्षिण भारत में तिरुवनंतपुरम की हज़रत कडुवाईल थंगल शरीफ भी है। इनमे पश्चिम भारत में मुंबई की हाजी अली भी है तो पूर्व में गौहाटी की हज़रत ज़ाहिर औलिया ख्वाजागन दरगाह भी है।औसतन अगर हर शहर में छोटी बड़ी पांच दरगाहें ले ली जाएँ तो भारत में 2500 से ज्यादा दरगाहें मौजूद हैं। 
http://aulia-e-hind.com/Cities.htm
दरगाहें दुनिया भर में मिलती हैं बस फर्क सिर्फ पुकारे जाने वाले नाम का होता है जैसे अफ्रीका में इन्हे करामात के नाम से जानते हैं और चीन में इन्हे गोंगबै के नाम से जाना जाता है।
इन दरगाहों की मैनेजमेंट कमेटी में ज़ाहिर सी बात है मूसालमान ही होते हैं। अब दरगाहें हैं तो सिर्फ हिन्दू (चूतिये) तो वहां जाते नहीं हैं। मान लेते हैं 50% दर्शनार्थी वहां माथा टेकने वाले मुसलमान होते हैं। जैसे मुंबई की हाजी अली दरगाह के आँकड़े बताते हैं कि यहाँ रोज़ लगभग दस हज़ार लोग आते हैं और अजमेर शरीफ में डेढ़ लाख लोग रोज़ आते हैं। हर दरगाह के अलग अलग आंकड़े हैं। इन दस हज़ार या डेढ़ लाख में से हिन्दू तो साधारण सी बात है सर झुका कर वंदना ही करते होंगे। लेकिन मुसलमान सर झुका कर मत्था रगड़ कर क्या करते हैं ???
ऐसा मैंने पढ़ा है कि मुसलमान लोग वहां ज़ियारत यानि की पूजा करने जाते हैं। अबे तुम्हारे नुमाइंदे और तो और हाजी अली दरगाह के सलाहकार तो कह रहे थे कि वो अल्लाह तआला के इलावा किसी और को पूजेंगे नहीं तो फिर ये दरगाहों पर मुसलमान क्या करते हैं ???
इस्लाम में मूर्ती पूजा शिर्क है तो कब्रों की पूजा क्या है ??? मंदिरों में फूल माला और प्रसाद चढ़ाया जाता है तो दरगाहों पर भी तो फूल माला और चादर चढ़ाई जाती है। मंदिरों में भजन कीर्तन होते हैं तो इस्लाम में जब संगीत हराम है फिर हर रोज़ वहां कव्वालियों की नुमाइश कैसे हलाल हो गयी ??? मनीरों में परिक्रमा की जाती है तो दरगाहों में तो परिक्रमा की जाती है। क्या ये सब कृत्य पूजा की श्रेणी में नहीं आते ???
बहुत से मुसलमान अभी कहेंगे कि हम दरगाहों को नहीं मानते। अच्छी बात है मत मानो पर जितने मुसलमान दरगाहों पर जाते हैं क्या वो सभी सूफी सम्प्रदाय के मानने वाले होते हैं ??? नहीं, क्योंकि जिन 2500 दरगाहों का ज़िक्र ऊपर किया है वो सब अलग अलग शाखाओं के मुसलामानों की हैं।  उनमे सूफी भी हैं शिया भी हैं सुन्नी भी हैं बरेलवी भी हैं। तो क्या इनको पूजने वाले तुमसे कमतर मुसलमान हैं ??? आसिफ अली ज़रदारी , शाहरुख़ खान , कैटरीना कैफ ,ज़हीर खान इमरान हाशमी ये सब अजमेर शरीफ में फूलों और चादर का टोकरा अपने सर पर उठा कर ले कर गए थे , क्या किया था उसका ??? हिंदी भाषा में कहें तो सब पूजा करके आये थे। तब कहाँ गया था एक और एक अल्लाह तआला जिसने पूरी कायनात को बनाया ??? फिर जब वो अल्लाह के साथ दरगाहों को पूज सकते हैं हाजी अली दरगाह के सलाहकार महोदय वंदेमातरम गाने में आपके पेट में मरोड़ क्यों उठाने लगी ???? महोदय , जब #पिया_हाजी_अली_गाया_और_फिलमाया_जा_रहा_था तब भारत भर के मुसलमान कहाँ थे कि एक अल्लाह की शान के इलावा दूसरे की शान में आप संगीत गा बजा कर गैर इस्लामिक काम कर रहे हैं। 
छोड़ो दरगाह की बातों को। 
अगर तुम्हारा सर्वशक्तिमान निराकार  अल्लाह सर्वव्यापी है तो फिर अरब जा हज का ढोंग क्यों ?? #संगे_अस्वद को चूमने चाटने छूने और उसकी परिक्रमा करने मक्का तक जाने की ज़ेहमत क्यों ?? 

दर असल भारत के मुसलामानों को चाहिए तुर्की के अता तुर्क जैसा शासक जिसने 1925 में सभी #मदरसों_और_दरगाहों को जमींदोज़ कर दिया था। या इनको चाहिए चीन जैसी लठमार सरकार जिसने 1958 से 1966 के बीच सभी दरगाहों और मस्जिदों के नमो निशान मिटा दिए थे। छोड़ो तुर्की और चीन की बात जब सऊदी अरब सरकार ने मक्का और मदीना में मोहम्मद और उनके परिवार से जुडी सभी मस्जिदें और कब्रगाहें मिट्टी में मिला दी उनका नामो निशाँ तक नहीं छोड़ा 
कर्बला को उन्होंने 1802 में ही नेस्तनाबूद कर दिया था।
https://en.wikipedia.org/wiki/Wahhabi_sack_of_Karbala  तो क्या है तुममें दम कि  भारत की ज़मीन पर गैरकानूनी रूप से  गारे मिट्टी की एक मस्जिद भी तुड़वा दो ??? नहीं , क्योंकि भारत और पकिस्तान में तो कोई मस्जिद में पाद देता है तो इस्लाम खतरे में पड़ जाता है फिर मुसलामानों में हिम्मत कहाँ कि मुंह से उस धरती माँ की प्रशंसा के दो लफ्ज़ बोल दें जिसकी छाती पर पैदा हुए अनाज को खा कर जिसकी मिट्टी में खेल कर पालते बढ़ते हो।   

#हर_विचार_से_शब्द_बनते_हैं_शब्दों_से_प्रवृति_बनती_है_प्रवृति_से_कृत्य_बनते_हैं।-----समझ में आया इस ऋषि वाक्य का मतलब ????? चूँकि तुम्हारे विचारों में तमाम जीव जंतुओं को पलने वाली प्रकृति वन्दनीय नहीं है इसलिए पूरी दुनिया में इसे उजाड़ते घूम रहे हो। चूँकि तुम्हारे विचारों में स्त्री वंदनीय नहीं है इस लिए दुनिया भर में बलात्कार करते घुमते हो।   चूँकि तुम्हारे विचार में ही धरती माँ वन्दनीय नहीं है इसीलिए भारत समेत पूरी दुनिया में बम फोड़ते घूम रहे हो। 
चूँकि तुम भ्रमित हो इसलिए उन दरगाहों और मज़ारों को तो पूजते हो जो अल्लाह टाला से इतर हैं मगर उस धरती को पूजने से इंकार करते हो जिसने इन्हे सदियों से अपनी छाती पर सुला रखा है। 
बहुत छोटी मानसिकता का है तुम्हारा खुदा जो अपने इलावा किसी की प्रशंसा सुनने का कलेजा नहीं रखता।
इस्लाम के अनुयायियों , बात सिर्फ भावनाओं की है। कैसा लगेगा आपकी माँ या बहन को अगर आपका भाई बीवी की तरह इस्तेमाल करने लगे। करते ही है , क्योंकि बात सिर्फ विचारों और भावनाओं की है।

शनिवार, 22 जुलाई 2017

भाड़ में गयी हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएँ और वैज्ञानिक शोध।


गज़ब बेवकूफों का देश है भारत। लिंचिंग के ऊपर संसद में बहस कर रहे हैं लेकिन यह कहने का दम किसी में नहीं है कि अगर बहुसंख्यकों की धार्मिक  भावनाओं को आहत करोगे तो नतीजा कुछ ऐसा ही निकलेगा। 
भाड़ में गयीं बहुसंख्यकों की धार्मिक भावनाएं। किसी के पीट पीट कर मारे जाने पर ही इंसानियत शर्मसार होती है क्या ???? फेसबुक और संसद में लिंचिंग की अलग अलग गिनती सामने आ रही है। कोई दस कह रहा है , कोई तेईस कह रहा है।  इन 23 मौतों से संसद हिली जा रही है, क्यों  ???? आप भारत के अलग अलग हिस्सों में रहते होंगे। अखबार भी पढ़ते होंगे। आपके क्षेत्र के अखबार में रोज़ दो या तीन घटनाएं बलात्कार के बाद हत्या की छपती हैं। यदि सिर्फ बलात्कार की बात करें तो यही दो-तीन आपके क्षेत्र की मिल कर भारत में 2015 में 34600 हो गयीं थीं।  लेकिन संसद विधानसभा का हिलना तो छोड़िये हम भी पढ़ कर अगली खबर पढ़ने लगते हैं , क्यों ???? संसद  छह महीनों में 23 हत्याओं से इसलिए हिलती है क्योंकि मरने वाला मुसलमान होता है। और बलात्कार फिर उसके बाद हत्या झेलने वाली बच्ची , लड़की , महिला या वृद्धा इनकी न तो अस्मिता  की कोई इज़्ज़त है और न जान की कोई कीमत , तो फिर संसद  में कोई क्यों मुद्दा उठाने लगा इन दसियों नहीं सैकड़ों नहीं हज़ारों बलात्कारों का , और उन मासूमों का जिनकी हत्या हो गयी। 
2006 का निठारी काण्ड याद है , 15 नरमुंड मिले पुंडीर और कोली के पास। अगर 20 वर्षीय पिंकी सरकार को इन लोगों ने न मारा होता तो इनका वीभत्स खेल यूँ ही चलता रहता। क्यों ????? पहले 14 बच्चे जब इनके शिकार हुए तो कानून व्यवस्था क्या कर रही थी ???दिल्ली की ज्योति पर रोने वाले लोग थे , रोहतक में बलात्कार फिर हत्या के ऊपर रोने वाले थे, शिमला में बलात्कार फिर हत्या उस बच्ची के लिए रोने वाले हैं। लेकिन जैसे निठारी के 14  बच्चों और अनगिनत बलात्कार और हत्यायें जो लोगों के संज्ञान में नहीं आतीं उनके ऊपर कोई रोने वाला नहीं है कोई अवार्ड वापसी वाला नहीं है उसी तरह से #हलाल करके मारी गयी गायों के ऊपर भी कुछ ही रोने वाले हैं। 

भारतीय सुप्रीम कोर्ट में इतना दम तो है नहीं कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 48 का या अपने ही 2006 के आदेश का पालन करवा ले हाँ, होली, दिवाली दही हांड़ी कैसे मनाई जाये या गौरक्षकों को न बचाया जाये इसके लिए आदेश पारित करने में एक दिन का समय नहीं लगाती वहीँ मुसलमानो की धार्मिक भावनाएं आहत न हों उसके लिए तीन तलाक जैसे मुद्दों को धार्मिक रंग चढ़ा कर फैंसला सुरक्षित कर देती है। 
खैर भाड़ में गयीं हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं। गाय काटो और खाओ संसद में तुम्हारे इस हक़ लिए चिल्लाने वाले बहुत मौजूद हैं।  अजी गाय की बात छोड़ो मुसलामानों को खुश करने के लिए तो संसद में तथाकथित हिन्दू नेताओं को व्हिस्की में विष्णु और रम में राम नज़र आ सकते हैं लेकिन रमज़ान में रम और पैगम्बर में पैग नज़र नहीं आ सकता। 
भाड़ में गयीं हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं। लेकिन इन्ही धार्मिक भावनाओं को यदि वैज्ञानिक जामा  पहना दिया जाता तो आज तक जो 881 नोबल प्राइज बंटे हैं उनमे से एक उस ऋषि को मिलता जिसने गाय को पूजनीय बनाया। वैसे क्या आपको मालूम है कि अब तक 881 में सेपूरी दुनिया में सिर्फ 12 नोबल पुरूस्कार मुसलमानों को मिले हैं उसमे से भी 3 को ही विज्ञान के लिए मिले है। गाय, विज्ञान के लिए नोबल पुरूस्कार और मुसलमानो को मैंने क्यों जोड़ा ???? इसलिए क्योंकि विज्ञान के इनके शोधार्थी आज भी सूरज को ही पृथवी का चक्कर काटते हुए बताते है और  औरत को इन्सान न मान कर सिर्फ स्तनधारी प्राणी की श्रेणी में ही रखते है और गाय काटने का काम भी यही करते हैं तो फिर इनसे गाय की वैज्ञानिक उपयोगिता की बात करना निरी मूर्खता है क्योंकि इनकी कुरआन में तो खून, रेंगने वाले जानवर , बिना खुर वाले जानवर और सूअर के इलावा सब कुछ खाना जायज़ बताया गया है। 
गाय के उत्पादों के विदेशी वैज्ञानिकों द्वारा बताये गए औषधीय गुणों  के ऊपर एक लेख 4 जून के पहले ही लिख चूका हूँ जिसमे गठिया मधुमेह मोटापा  और कैंसर जैसी बिमारियों के इलाज की दवाइयाँ गाय के दूध और गौमूत्र से बनायीं जा रही हैं , जिसका लिंक नीचे दे रहा हूँ। 


लेकिन हाल ही में #स्क्रिप्स_इंस्टिट्यूट_और_ए_एंड_एम_विश्वविद्यालय_टेक्सास में किये गए एक शोध के अनुसार गाय से एच आई वी (एड्स) की दवाई बनायीं जा सकती है। (पूरी जानकारी के लिए निम्न लिंक क्लिक करें )


दो दिनों से एक पोस्ट चल रही है जिसमे बीफ 1 , बीफ 2 और बीफ 3 तरह की किस्में बता कर यह साबित किया गया है कि बीफ -3 गाय का मांस होता है और भारत में इसका उत्पादन और उपभोग नगण्य है। चलिए मान ली आपकी बात , पर इतना ध्यान रखियेगा कि बीफ 3 को वील भी कहते हैं। नीचे लिंक दे रहा हूँ जिसमें अमरीका के कृषि विभाग ने भारत के पशुओं के सन्दर्भ में डाटा दिया है , आँखें खोल कर देख लेना क्या सिर्फ भैंस काटे जा रही है भारत में ???? क्या सिर्फ भैंस के मांस के निर्यात के बल पर भारत विश्व में बीफ का सबसे बड़ा निर्यातक देश है ???? नहीं। बीफ के साथ साथ उसमे वील ( Veal) भी लिखा है। और एक सांख्यिकी यह भी दी है कि 2007 के मुकाबले 2012 में 19वीं पशु गणना के अनुसार भारत में पशुओं की संख्या सिर्फ 4.1% गिरी है। 


अभी ये बातें न अवैज्ञानिक मुसलामानों को नज़र आयेंगी ( क्योंकि वो तो शारीरिक व्यायाम योग को भी अपने मज़हब के खिलाफ मानते है ) न मुसलामानों के वोटों के भूखे सांसदों को नज़र आएँगी न फट्टू सुप्रीम कोर्ट को नज़र आएँगी। जब गाय की उपयोगिता नज़र और समझ आएगी तब तक गायों की हालत सफ़ेद गैंडे , बाघ , काले हिरण गिर के शेर जैसे लुप्तप्राय जानवरों जैसी हो जाएगी। 


भाड़ में गयी हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएँ और वैज्ञानिक शोध।  मुसलामानों को तो गाय का ही मीट खाना है उसके लिए चाहे जान देनी ही क्यों न पड़ जाये बाकि तो सुप्रीम कोर्ट और तमाम अवार्ड वापसी गैंग के सदस्य  है ही इनकी तरफदारी करने के लिए। 
बलात्कार और फिर हत्या , लगता है सबने सऊदी अरब के वैज्ञानिक के शोध को सहमति दे दी है कि  औरत सिर्फ  एक स्तनधारी प्राणी है साल में अगर 35-36000 बलात्कार और क़त्ल हो गए तो क्या फ़र्क़ पड़ता है। फ़र्क़ तो सिर्फ मुसलामानों की मौत से पड़ता है। 

शनिवार, 1 जुलाई 2017

जोशुआ प्रोजेक्ट्स

कृपया जातिवाद, क्षेत्रवाद  से ऊपर उठ कर धर्म पर मंडराते हुए इस सुनियोजित खतरे पर मनन करे। जाल आपके ऊपर फेंका जा चुका है , अलग अलग दिशा में उड़ने की ज़िद में सब जाल में फंसे रह जाओगे।

हम मूलनिवासी और विदेशियों पर बहस करते हैं। हम जातियों और भाषाओँ पर बहस करते हैं। हम आपस में अपनी मान्यताओं की खिल्ली उड़ाते हैं एक दुसरे को जातिसूचक शब्दों से सम्बोधित करते हैं। हम आरक्षण के समर्थन में लड़ते है और आरक्षण के विरोध में लड़ते हैं।  हम जातियों के आधार पर राजनितिक पार्टियों में बंटे हुए हैं। पर हम कौन हैं हम कितने हैं यह हमें तो क्या शायद सूक्ष्म रूप से भारत सरकार को भी नहीं पता होगा। 

लेकिन विश्व में एक संस्था है जिसे आपके किसी भावनात्मक मुद्दे से कोई मतलब नहीं है फिर भी उसे भारत में रहने वाले हर वर्ग और जाति ---बनिआ, भील, ब्राह्मण ,चमार , धोबी,गोंड ,जाट (हिन्दू), जाट (सिख),कापु, कोली, कुम्हार, कुंबी, मराठा, नाइ, राजपूत, तेली, वन्नियां, यादव, जाटव  . . . . . . . . . . . . . . . की गिनती हजार तक (राउंड ऑफ करने के बाद ) मालूम है। फिर एक जाति कितने वर्गों में बंटी हुई है इस संस्था ने त्रुटिहीन  तरीके से उनका भी विवरण संकलित किया हुआ है। जैसे कि ब्राह्मणों में ---चितपावन , औदिच्च , देशस्था , वारेन्द्र , गौड़ , सारस्वत , कनौजिया ,जोशी, कश्मीरी पण्डित , जोशी , वगैरह वगैरह। आप लोग अपने आप को सवर्ण और दलितों में बांटते होंगे मगर उस संस्था के लिए आप सिर्फ हिन्दू हैं और आपको आपकी मान्यताओं के हिसाब से उसने आपका सूक्ष्तम विवरण एकत्रित किया हुआ है।  
इस संस्था का नाम है #जोशुआ_प्रोजेक्ट्स। अमरीका में स्थापित इस संस्था का सिर्फ एक उद्देश्य है पूरे विश्व को ईसाई बनाना।  इसको धन से वैसे तो विश्व भर के ईसाई पोषित करते हैं लेकिन अमरीकी सरकार भी इसे पोषित करती है। 

इनकी कार्यशैली पर बहुत लम्बी पोस्ट न लिखते हुए बस इतना ही बताना चाहता  हूँ कि इसने भारत को 2507 ग्रुप्स  में बाँट रखा है जिसमे इनके अनुसार अभी तक यह संस्था  अभी 2250 ग्रुप्स तक नहीं पहुँच पायी है जो कि इसका लक्ष्य है।
निम्न लिंक का अवलोकन कर सकते हैं। इसी लिंक से आगे बढ़ते बढ़ते आप इनकी वृहद् कार्यशैली के पैमाने को नाप सकते हैं।  

ऊपर मैंने लिखा है कि ये आपको सिर्फ हिन्दू समझते हैं और जैसे विश्व भर में ये सफल हैं वैसे भारत में सफल नहीं हो प् रहे । भारत में सफल क्यों नहीं हो पा रहे उसका कारण इन्होने निम्न लिंक में दिया है , जिसके आखिरी दो बिंदुओं को अंग्रेजी में कॉपी पेस्ट करने के साथ उसका  हिंदी तर्जुमा मैं यहाँ लिख रहा हूँ।


Prayer Points
* Brahmins are a key community in India who uphold Hinduism. Please pray that the light of the gospel breaks through the veil that blinds this community.
* Pray that the true God will reveal Himself to this community and use Brahmins to preach and teach about Jesus Christ.

1) भारत में ब्राह्मण एक बुनियादी / महत्वपूर्ण समुदाय हैं जिन्होंने हिन्दू धर्म को थाम रखा है। कृपया प्रार्थना कीजिये कि सत्य की रोशनी ( Gospal) इनके उस परदे को काट दे जिससे ये अंधे हैं। 
2) प्रार्थना कीजिये कि असली भगवान् इस समुदाय के समक्ष खुद को प्रस्तुत करे और जीसस क्राइस्ट के विषय में प्रचार करने और पढ़ाने के लिए ब्राह्मणों का उपयोग करे। 

#क्या_अभी_भी_समझ_नहीं_आया_कि_आपको_ईसाई_बनाने_के_लिए_कैसे_एक_एक_वर्ग_को_तोड़कर_कमज़ोर_किया_जा_रहा_है_????? #क्या_अभी_भी_समझ_नहीं_आया_क्यों_इतिहास_के_हर_अनदेखे_पन्ने_से_लेकर_आजतक_हर_घटना_के_लिए_ब्राह्मणों_को_कटघरे_में_खड़ा_किया_जाता_है ???
#क्या_अब_भी_समझ_नहीं_आया_कि_सहारनपुर_की_घटना_से_बंदूकों_का_मुंह_ठाकुरों_की_तरफ_क्यों_मोड़_दिया_गया_है ????
#क्या_अब_भी_समझ_नहीं_आया_कि_हर_मुद्दे_को_सवर्ण_और_दलित_रंग_क्यों_दिया_जाता_है ?????

शनिवार, 24 जून 2017

जिहाद ---दि_क़ुरानिक_कॉन्सेप्ट_ऑफ़_वॉर

#दि_क़ुरानिक_कॉन्सेप्ट_ऑफ़_वॉर ----------

#अगर_आप_आदमखोरों_के_साथ_खाना_खाने_जा_रहे_है_तो_देरसवेर_आप_भी_उनका_भोजन_बनेंगे ------ भारत के तमाम छोटे बड़े तथाकथित  सेक्युलर आदमखोरों और ईद के उपलक्ष्य में कुरान को समर्पित है आज की यह पोस्ट। 
ईरान इराक सीरिया इंग्लैंड ब्रुसेल्स अफगानिस्तान कश्मीर रोज़ दुनिया का कोई न कोई कोना आतंकवादी घटना का शिकार होता। और फिर रेत के टीले में सिर घुसेड़े धर्मनिरपेक्ष शतुरमुर्ग बयां देते हैं कि आतंकवादियों का कोई मज़हब नहीं होता।

आतंकवादियों की बात छोड़ दें , कश्मीर में अब फ़ौज या पुलिस में भर्ती कश्मीरी भी मारे जाने लगे हैं ???? या पकिस्तान भारत के रोज़ रोज़ ऊँगली करता रहता है, मालूम है क्यों ???? 

कल ईद है।  जैसा सबको बताया गया है वही मैं भी जनता हूँ कि इस महीने में कुरान नाज़िल होनी शुरू हुई थी। कुरान ने पैदा होते ही दुनिया को दो हिस्सों में बाँट दिया दारुल इस्लाम ( जहाँ सिर्फ इस्लाम है ) और दारुल हर्ब (जहाँ काफिर हैं) मुसलामानों के लिए क़ुरान ने कर्तव्य निर्धारित किया वे गैर मुसलामानों को इस्लाम में शामिल करें। जो उनकी बात मान कर मुसलमान बन गए वो तो दीनी भाई हो गए। और जो नहीं मानें उनके लिए क़ुरान हिदायत देती है उनसे लड़ो और तब तक लड़ो जब तक वो इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर न हो जायें। इसी लड़ाई को #जिहाद कहते हैं। 
 कुरान --सूरा 2, आयत 193  मुसलामानों को आदेश देती है कि " तुम उनसे लड़ो यहाँ तक कि फितना ( कुफ्र का उपद्रव) शेष न रह जाए और दीन अल्लाह का ही हो जाये . . . . . . . ". कुरान का सम्पूर्ण दर्शन ही जिहाद है। 
अगर आपको कुरान का जिहादी दर्शन समझना है तो आपको पाकिस्तानी फौज में राष्ट्रपति जिया उल हक़ के कार्यकाल में उनके एक ब्रिगेडियर एस के मलिक ने एक किताब लिखी थी " दि क़ुरानिक कांसेप्ट ऑफ़ वॉर

http://www.discoverthenetworks.org/Articles/Quranic%20Concept%20of%20War.pdf

इस किताब की प्रस्तावना खुद ज़िआ उल हक़ ने लिखी थी और इसकी भूमिका भारत में पाकिस्तान के राजदूत रह चुके "अल्लाह बक्श ब्रोही ने लिखी थी।  इसकी भूमिका में ब्रोही लिखते हैं " ----

इस्लामी शब्दकोष में #जिहाद सर्वाधिक गौरवशाली शब्द है , जिसका अंग्रेजी में अनुवाद संभव नहीं , लेकिन जिसका प्रयोग उद्यमशील, संघर्षशील  और अल्लाह के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में प्रयासरत रहने के अर्थ में अधिकता से किया जाता है। इसके आगे अपनी लम्बी चौड़ी प्रस्तावना में ब्रोही लिखता है कि -पश्चिमी चिंतक अक्सर क़ुरान की आयतों पर उंगली उठाते हैं कि इनकी वजह से इस्लाम के अनुयायी गैर इस्लामियों के साथ हमेशा संघर्षरत रहते है। उनके लिए यह जवाब काफी है कि ---खुदा के गुलाम द्वारा खुदा के हुक्म को न मानना उसे इस्लामिक क़ानून की दृष्टि  में गुनहगार मानती है और उसका इलाज वैसे ही किया जाना चाहिए जैसे कैंसर युक्त अंग को शरीर से काट कर अलग कर दिया जाता है जिससे कि बाकि की इंसानियत को बचाया जा सके। 
ब्रिगेडियर मलिक ने अपनी इस पुस्तक में कुरान से बहुतेरे से उद्धरण देकर कहा है कि ----"#जिहाद_अनवरत_चलने_वाली_लड़ाई_है जिसे काफिरों के खिलाफ लड़ा जाता है। ब्रिग मलिक ने लिखा है , " जिहाद कुफ्र के विरुद्ध राजनितिक, आर्थिक ,सामाजिक,मानसिक,नैतिक,आध्यात्मिक ,गृह और अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर लड़ी जाने वाली सदा चलते रहने वाली लड़ाई है।  सशस्त्र युद्ध तो उसके अनेक तरीकों में से एक है। जिहाद हर मुसलमान का निजी और सामूहिक फ़र्ज़ है।
मलिक आगे लिखते हैं "जिहाद में हमारा लक्ष्य दुश्मन का दिल और दिमाग होता है। दुश्मन के दिलों में पैदा किया हुआ खौफ या आतंक हमारा साधन नहीं बल्कि लक्ष्य होता है। यदि एक बार दुश्मनों के दिलों में खौफ पैदा कर दिया फिर कुछ और करने के लिए बाकि नहीं बचता। आतंक दुश्मन पर निर्णय लादने का साधन नहीं है बल्कि लादा हुआ निर्णय होना चाहिए। सिर्फ वही रणनीति सीधा परिणाम पैदा कर सकती है , जो तैयारी की अवस्था से ही शत्रुओं के दिलों में आतंक उत्पन्न करने के लक्ष्य की ओर केंद्रित हो" ( पृष्ट 59 ) 
अपने इस कथन को साबित करने के लिए मलिक सूरा 8 आयत 12 को उद्घृत करता है जिसका हिंदी तर्जुमा इस तरह है --- जबकि आपका रब फरिश्तों को हुक्म देता था कि मैं तुम्हारा साथी हूँ, सो तुम ईमान वालों की हिम्मत बढ़ाओ , मैं अभी काफिरों के दिलों में रौब डाले देता हूँ , सो तुम काफिरों की गर्दनों पर मारो और और उनके पोर पोर मारो। 

ब्रिग मलिक आगे लिखता है कि " उनके दिलों में दर तभी भरा जा सकता है यदि आप उनकी आस्था को ध्वस्त कर दें।  अंतिम विश्लेषण का निष्कर्ष यही निकलता है कि काफिरों के दिलों में दर भरने के लिए उसकी आस्था की नींव हिला दी जाये।  (पृष्ट 60)
उपरोक्त कथन को सूरा 9 आयत 5 के परिपेक्ष में देखिये --- " फिर जब हुरमत के महीने बीत जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ कहीं पाओ कत्ल करो और पकड़ो और उन्हें घेरो और हर जगह घात  लगा कर उनकी ताक  में बैठो।  फिर अगर वे तौबा कर लें , नमाज़ कायम करें, ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो। 
ब्रिग मलिक ने तो #दि_क़ुरानिक_कांसेप्ट_ऑफ़_वॉर , कुरान के आधार पर 164 पन्नों की लिख दी जिसका अंश आपके लिए मैंने यहाँ लिखा है।
 पूरी कुरान में काफिरों को  मुसलमान बनाने की ज़द्दोज़हद में जिहाद के ऊपर 164 आयते लिखी गयीं हैं। इन आयतों का सारांश यह है कि कुरान या खुदा की बात मनवाने के दौरान अगर कोई मर भी जाता है तो उसे जन्नत नसीब होगी और यही खुदा की इबादत का दूसरा सबसे बेहतरीन तरीका है।  

कभी कभी भटके हुए नौजवान क़ुरान और हदीस के संदेशों के ऊपर अपना ज्ञान झड़ने और इस्लाम को सहिष्णु दिखने के लिए और ऊपर लिखी सूरा 9 की आयत 5 के सन्दर्भ समझने लगते हैं। उन सबकी जानकारी के लिए बता दूँ कि क़ुरान में कुल 114 सूरा ( चैप्टर) हैं और सूरा 9,  113वें नम्बर पर सुनाया गया था यानि कि यह चैप्टर पहले के सब चैप्टर्स पर ग़ालिब माना जाये। और इस सूरा में साहब ने कह ही दिया था कि जो मुसलमान न बने उसे निपटा दो।  
 

अब समझ में आया आपको कि फ्रांस में क्यों गला कटा जाता है , इंग्लैंड में क्यों जनता के ऊपर ट्रक चढ़ाया जाता है, ब्रुसेल्स में क्यों धमाका होता है , इंदौर पटना ट्रेन क्यों  हादसे का शिकार होती है , भोपाल उज्जैन ट्रैन में धमाका क्यों होता है , या पाकिस्तान सैनिकों के शव क्षत विक्षत क्यों करता है ????? #पिछले_30_दिनों में (रमज़ान के महीने में )दुनिया भर 29 देशों में  164 इस्लामिक हमले हुए जिनमे 1540 लोग मारे गए 1629 लोग घायल हुए।  लिस्ट निम्न लिंक में दी गयी है। 


मकसद सिर्फ दिलों में खौफ पैदा करके ईमान कबुलवाना। मकसद पूरी दुनिया को इस्लामिक राष्ट्र बनाना है।  मकसद आपकी आस्था की नीवें हिलाना है।  और इसी मकसद से #दि_कुरानिक_कांसेप्ट_ऑफ़_वॉर, जो कि मुझे कुरान का संशोधित संस्करण नज़र आती है ,लिखी गयी है। 

मेरी मित्रता सूची में जो सेक्युलर इसे पढ़ चुके हैं , वे सब कुछ भूल कर कल ईद मिलन की तैयारी शुरू कर दें। क्योंकि भुगतना आपने नहीं आपकी आने वाली पीढ़ियों ने है। Please Go ahead and enjoy the BEEF PARTY.  

शनिवार, 3 जून 2017

प्रसव का दर्द झेला माँ ने , नेग ले गयी दाई और हिजड़े ले गए बधाई।

प्रसव का दर्द झेला माँ ने , नेग ले गयी दाई और हिजड़े ले गए बधाई। 
 यदि वैदिक मान्यताओं में विश्वास रखने वाले सनातन धर्मी है तो इस लेख को पढियेगा जरूर , वर्ना जानकारी के आभाव में कदम कदम पर आप जलील होते रहेंगे और गायें कटती रहेंगी। 
मुख्य मुद्दे पर बाद में आएंगे पहले अपने पिछड़ेपन की निशानियों का छोटा सा नमूना देख लीजिये। 

नयी पीढ़ी को छोड़ दें , तो शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे जब चोट लगी होगी तो उसे गर्म दूध के साथ हल्दी न पिलाई गयी हो या चोट पर हल्दी लगा कर पट्टी न बंधी गयी हो। पूजा में अक्सर हल्दी या तो भगवान् को चढ़ाई होगी या उसका तिलक किया होगा। । यह भी कोई नहीं कह सकता कि उसने सर्दियों में कभी चाय में तुलसी की पत्तियां डाल कर चाय नहीं पी होगी या आजकल प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले "तुलसी ड्रॉप्स" का विज्ञापन नहीं देखा होगा । वैसे पहले ज़माने में घर के आँगन में तुसलीचौरा हुआ करता था और उसकी पूजा की जाती थी।
कुछ दिन पहले बड़ी अमावस को आपने महिलाओं को बरगद की पूजा करते देखा होगा , या शनिवार को बहुत से लोगों को पीपल के पेड़ के नीचे दिया जलाते देखा होगा या यह कहते हुए सुना होगा कि पीपल के पेड़ को काटने से पाप लगता है। बृहस्पतिवार को केले की पूजा करते हुए महिला या पुरुष को देख कर उसका मज़ाक भी उड़ाया होगा। 
आंवला एकादशी शायद ही कुछ लोगों को मालूम हो, लेकिन इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा का विधान बताया गया है। 
तुलसी केले नीम पीपल बरगद आंवले की पूजा कोई 1990 के दशक में तो भारतियों को बताई नहीं गयी कुछ हजार साल पहले किस रूप में बताई गयीं थीं मालुम नहीं पर आज जैसी नहीं बचीखुची है , उनको उतना ही मान लीजिये। 

भारतीय बेवकूफों का पिछड़ापन इसमें नहीं है , कि वे हल्दी का इस्तेमाल करते हैं , केले , बरगद, पीपल और आंवले को पूजते हैं। भारतियों का पिछड़ापन इसमें है कि बजाये इसके पीछे का तर्क समझ कर पूर्वजों द्वारा दिए गए इस ज्ञान और थाती को समझ कर सहेजते , बल्कि 1990 के दशक तक अपनी हीनभावना में तब तक डूबे रहे जब तक , विदेशियों ने इस बात के मर्म को समझ कर उपरोक्त इन सब चीज़ों के पेटेंट नहीं करवा लिए। 

कुछ उदाहरण दे रहा हूँ ---
बरगद का पेटेंट ---
तुलसी का एक पेटेंट नहीं करवाया गया है , कई हैं , एक का उद्धरण दे रहा हूँ ---- https://www.google.co.in/search?q=patent+of+basil&oq=patent+of+basil&aqs=chrome.0.69i59j0l2.13000j0j7&sourceid=chrome&ie=UTF-8

नीम के कई पेटेंट में से एक का उदाहरण ---
हल्दी का पेटेंट वैसे भारत ने कानूनी लड़ाई के तहत जीत लिया है , लेकिन वो स्थिति ही क्यों आयी जब किसी और देश ने इसे अपने नाम करवा लिया था ????---
पीपल के पेड़ के भी एक दो नहीं कई पेटेंट विदेशों ने करवा रखे है ,----

बासमती का पेटेंट तो बेशक भारत जीत गया हो , लेकिन ट्रेड मार्क नहीं जीत पाया ---


आंवला जिसके गुण च्यवन ऋषि बताते बताते खत्म हो गए , उसे सुंदरता के लिए अमरीका ने पेटेंट करवावा लिया --

क्या बड़ा किला फतह कर लिया अगर हल्दी और बासमती के पेटेंट कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद वापिस जीत लिए ???? लेकिन सूतियो हजारों सालों से तुम्हारी रही चीज़ को कोई कानूनी रूप से अपना बताने लगा और तब भी अन्य विषयों पर तुम्हारा अपने धर्म और संस्कृति के प्रति स्वाभिमान नहीं जगा। 
पहली रोटी गाय को और गाए को पूजने का विधान भी आज का नहीं ऋग्वेद के समय का है। बेवकूफ थे सनातन धर्म वाले जो नदियों को पूजने की बात करते थे। गणेश जी के धड़ पर हाथी का सिर लगाने पर विद्व्जन बहुत हँसतें है लेकिन जब पहली बार , मनुष्य का दिल , लिवर , किडनी बदली गयी कटा हुआ हाथ जोड़ा गया तो उसे विज्ञान और और पश्चिमी देशों का चमत्कार माना गया। भारतीय जाहिल जानवरों के अंगो के  मनुष्यों में प्रतिरोपण का अभी मज़ाक उड़ाने में व्यस्त हैं और विदेशी वैज्ञानिक इस पर काम भी कर रहे है।  जिस दिन वो सफल हो जायेंगे तो भारत के सूतिये दूर खड़े हो कर हिजड़ों की तरह तालियां बजायेंगे।

http://www.smithsonianmag.com/…/future-animal-to-human-org…/

कल से एक खबर देख कर चित्त खिन्न हो गया , जिसमे दिल्ली के हवाला व्यापारी कश्मीरियों तक पैसा पहुंचा रहे थे। क्या उम्मीद की जाए ऐसे लोगों से गाय बचाने की जिन्हे देश को मारने में कोई दर्द नहीं हो रहा है।

ग्लोबल वार्मिंग पर 2 जून को विश्व के लगभग सभी देश आज चिन्तित नज़र आये। ग्लोबल वार्मिंग के बहुत से कारणों में मीट खाना एक अहम् कारण है। अगर ये बात कोई वैक धर्म से सम्बंधित जज कहता तो पूरी दुनिया में उसका मज़ाक उड़ता ,लेकिन यह बात ऑक्सफ़ोर्ड मार्टिन स्कूल के वैज्ञानिक कह रहे हैं। न यकीन आये तो निम्न लिंक पढ़ लीजिये।  


अब चूँकि गोरी चमड़ी के विदेशी वैज्ञानिक यह कह रहे हैं तो पूरी दुनिया इसे मानेगी। लेकिन जब हमारे शास्त्रों ने प्रकृति जिसमे पेड़ पौधे , जीव जन्तु और सूर्य पृथ्वी और जल शामिल हैं , ने इसकी पूजा करने के तरीके से इन्हे बचाने का सन्देश दिया तो वो आज मूढ़मगजों के हँसी के पात्र बन रहे हैं।  
हमारे पूर्वजों ने आत्मीयता की दृष्टि से धार्मिक जामा पहनाते हुए समझाया कि गौ का संरक्षण होना चाहिए , तो किसी की समझ नहीं आया। अब अमरीकी वैज्ञानिक कह रहे हैं कि रेड मीट खाने से कैंसर के खतरा 60 -70 प्रतिशत बढ़ जाता है यह मैं नहीं कह रहा हूँ , यह कैंसर काउंसिल कह रही है ,तो भी इस ढाई इंच की जुबान के कुछ मिनटों के स्वाद के गुलाम शायद इसे नहीं छोड़ पाएंगे।

बहुत विस्तार में जाते में न जाते वैज्ञानिकों द्वारा गौ उत्पादों #पंचगव्य पर शोधपत्र का सारांश यहाँ लिख रहा हूँ ---दुनिया भर में शोध के पश्चात् गाय का दूध A 2 श्रेणी में रखा गया है। जो कि सिर्फ गायों में ही पाया जाता है , वो भी विशेषकर भारतीय गायें में। 
(A 2 Milk के विषय में अधिक जानकारी के लिए पढ़ें  https://en.wikipedia.org/wiki/A2_milk ) 

इस A 2 मिल्क को पीने मोटापे, गठिया , टाइप 1 डायबटीज़ , और बच्चों में आटिज्म की बिमारी से बचा जा सकता है। आज की तारीख में विश्व के वैज्ञानिक बिमारियों पर दवाइयों के विशेष कर एंटीबायोटिक दवाइयों के बेअसर होने के कारण चिंतित हैं। वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार अगले बीस सालों में एंटीबायोटिक दवाईयां बिकुल असर करना बंद कर देंगी। इसका विकल्प उन्होंने गौमूत्र में ढूंढा और गौमूत्र का 6896907 , तथा 6410059 नंबर का गौमूत्र का पेटेंट इसके औषधीय गुणों के कारण करवा लिया ।  These Patents have been granted for its medicinal properties, particularly as a bioenhancer, and as an antibiotic, antifungal, ant anticancer agent . ( #आइये_हम_भारतीय_गौमूत्र_का_मज़ाक_उड़ा_कर_समय_व्यतीत_करें )

पिछले वर्षों में खेती में रासायनिक खाद का बहुतायत में उपयोग होने से एक तो उनके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं और फसलों की बहुत सी बीमारियाँ भी रसायन प्रतिरोधक क्षमता पैदा कर चुकीं हैं। इन्ही बिमारियों से लड़ने के लिए भारतीय साहीवाल गाये के दूध में से Bacilus Lentimorbus  NBRI 0725 ,B. Subtilis NBRI 1205 , और B.Lentimorbus NBRI 3009 नाम के पदार्थ (Strains) अलग किये गए हैं  which have the capability to control phytopathogenic Fungi and promote plant growth under field conditions, increase tolerance for antibiotic stresses and solubilise Phosphate under abiotic conditions.

गोबर से बने उपलों या गोबर गैस द्वारा ऊष्मता एक ख़ास तापमान से ऊपर नहीं जाती है जिससे खाने के पौष्टिक तत्व अन्य साधनो पर पकाये खाने की तरह नष्ट नहीं होते। 

 रूरल डेवलपमेंट एंड टेक्नोलॉजी ( CRDT) ने IITs , ICAR ,DBT ,ICMR ,CSIR ,AAYUSH , NDRI से से शोध पत्र मांगे , जिसमे से पूरे भारत में से प्रारम्भिक रूप में आये हुए 54 में से 34 को पंचगव्य पर पारम्परिक मान्यताओं को मान्यता देने के लिए चुना गया। 
अगर अभी भी समझ नहीं आया कि गौ को क्यों पूजने के लिए कहा गया है तो 
आइये मिलकर अपनी धार्मिक मान्यताओं की धज्जियाँ उड़ाते हुए , नीम ,आंवले और पीपल के पेड़ काटें , शहर भर के गंदे नाले नदियों में मिलाएं और हर सड़क चौराहे पर गौहत्या की जाए।  बीफ पार्टी का न्योता सबको दिया जाए। गाये की पूजा और पर्यावरण की चिंता हम और आप क्यों करें। कोई अगले 20-25 सालों में जब तक हमने जीना है गायों के ख़त्म होने से कयामत तो आ नहीं जाएगी।  रही बात दूध की तो वो तो यूरिया , पानी, पेंट, डिटर्जेंट ,चीनी कास्टिक सोडा से बन कर आज भी बिकना शुरू हो गया है , 20 साल बाद गाय का मांस पचाने वाले इस प्रकार निर्मित दूध को भी पचाने लगेंगे। 



अभी आपको समझ आया ???? प्रसव का दर्द झेला माँ ने , नेग ले गयी दाई और हिजड़े ले गए का मतलब ???? बधाई प्रसव या कटने का दर्द झेला गाय ने। नेग यानि की काटने का पैसा ले गया कसाई और हिजड़े वो जो खायें और खिलाएँ गाय का मांस।
या यूँ कह लीजिये , ऋषि मुनियों ने मेहनत से ज्ञान अर्जित किया , आज के विदेशी वैज्ञानिक उसी भारतीय ज्ञान पर आधारित सभी शोध अपने नाम लिखवा रहे हैं और दवा कंपनियां कर इन्ही दवाओं पर जमकर पैसा कमा रहीं हैं।
और सबसे मज़ेदार बात बच्चे के बाप होने की दावेदारी पडोसी पेश कर रहा और पेटेंट अपने नाम लिखवा रहा है।

शनिवार, 27 मई 2017

#जो_अण्डे_चुराता_है_एक_दिन_ऊँट_भी_चुराता_है।




पिछले वर्ष जैसे ही रमज़ान का महीना शुरू हुआ , इस संग्रहालय से रमज़ान में सुबह की अज़ान और सेहरी की रस्म अदा होने लगी। यह परम्परा पिछले साल से नहीं 2012 से शुरू हो गयी थी। 2012 से 31 मई को यहाँ इस्लाम के अनुयायी बहुत बड़ी तादाद में इकट्ठे होते हैं और नमाज़ अदा करते हैं। वैसे तो यह लेख मैंने 29 मई के दिन लिखने के लिए सोचा था , लेकिन रमज़ान शुरू हो गए हैं और 29 मई कल है। 29 मई ही क्यों ????? 

नीचे जो आपको पहली तस्वीर नज़र आ रही है , उसमे मरियम की गोद में ईसा मसीह हैं , और वर्तमान के इस संग्रहालय के अन्दर का एक दृश्य है। इसी संग्रहालय के अन्दर से रमज़ान के महीने में अजान होने लगी है , सहरी  होने लगी है और इसी के अन्दर इस्तानबुल और तुर्की के मुसलामानों की ज़िद है कि वो नमाज़ पढ़ेंगे। वैसे इस ज़िद को अमली जामा पहनाने के लिए ,अक्टूबर 2013 में तुर्की की संसद में बिल भी पेश कर दिया गया जिसका मजमून इस प्रकार था कि ----
“This bill has been prepared aiming to open the Hagia Sophia – which is the symbol of the Conquest of Istanbul and which has been resounding with the sounds of the call to prayer for 481 years – as a mosque for prayers.” 
इसका लगभग तर्जुमा कहता है --- कि इस बिल को पेश करने का लक्ष्य #हेगीआ_सोफिआ को खोलने के लिए है ----जो कि इस्तानबुल जीत की एक निशानी है और जो कि 481 वर्षों से नमाज़ की आवाज़ों से गूँज रही है ----एक मस्जिद नमाज़ के लिए। 
अब इस पूरी कहानी का मजमून दो वाक्यों में समझ लीजिये। वर्ष 336 में इस्तानबुल में तत्कालीन शासक कोंस्टांटियस  ने एक चर्च बनवाया था। वक़्त के थपेड़े  खाते  हुए कुछ बार गिरा फिर उठाया गया और 562 के आप पास वर्तमान शक्ल में  तैयार किया गया।  बस  इसके बाहरी हिस्से में नज़र आने वाली मीनारें नहीं थीं।  #29_मई_1453 को उस्मान वंश के तुर्क  सुलतान मोहम्मद ने  कोंस्टनटिनोप्ल  / इस्तानबुल जीत लिया , फिर ईसाईयों के साथ वही किया जो ईरान के पारसियों के साथ 800 साल पहले किया था  और इस चर्च को मस्जिद में तब्दील कर दिया।  इसे मस्जिद की शक्ल देने के लिए चार मीनारें और हल्के फुल्के बदलाव  कर दिए  और होने लगी यहाँ पांच वक़्त की नमाज़ । 1931 में तुर्की के प्रगतिशील प्रधानमन्त्री अत तुर्क  ने  दोनों धर्मो के बीच सौहाद्र स्थापित करने के लिए इसे संग्रहालय में तब्दील कर दिया।  82 सालों के बाद शांतिप्रिय मज़हब के दिमाग में इसे फिर से मस्जिद बनाने का कीड़ा पैदा हो गया  और उन्होंने संसद में  बिल भी पेश कर दिया और जबरदस्ती अजान  नमाज़ और सहरी का रिवाज़ भी शुरू कर दिया। 





इन अरब के लुटेरों ने  पहला अण्डा मक्का के नाम का वहां के कुरैश कबीले का चुराया था ।  फिर यहूदियों के सबसे पवित्र मन्दिर #अल_अक्सा पर कब्ज़ा जमाया। इसके बाद पारसियों के मंदिरों पर कब्ज़ा जमा कर कैसे उन्हें मस्जिदों में तब्दील किया यह मैं अपनी पिछली पोस्ट में लिख ही चुका  हूँ। ये अंडा चोर अब तक मुर्गी  चोर हो चुके थे । 

1528  में इन्ही के मज़हबी भाई ने  हजारों  मील दूर राम मंदिर तोड़ कर बाबरी मस्जिद बनवा दी थी। सोफ़िआं हेगीआ की तरह यहाँ के मुसलमान भी उस पर पूरा हक़ जता रहे हैं।  दो दिन बाद ये तुर्की के सोफिया हेगीआ पर इक्कठे हो कर नमाज़ पढ़ कर उस पर अपना हक़ जताएंगे और भारत में 30 मई को बाबरी मस्जिद तोड़ने के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है जिसमें राम मंदिर पर ये अपना नाज़ायज़ दावा बरकरार रखे हुए है।  समय, स्थान और  दलीलें अलग हो सकती हैं , लेकिन मकसद एक ही है  कि जहाँ इनके पाँव पड़ गए वो जगह बस इनकी है। 
वर्ष  710 में मोहम्मद बिन कासिम नाम का मुर्गी चोर भारत में आया था और फिर नालंदा का इतिहास सब जानते हैं।  उसके बाद  28 नवम्बर 1001 को महमूद ग़ज़नवी के पहले आक्रमण से लेकर 1707 में औरंगज़ेब की मौत तक ये बीस हज़ार से  चालीस हज़ार मंदिरों को तोड़ कर ये ऊँट चुराने  वाले शातिर चोर हो गए। काशी विश्वनाथ मन्दिर के साथ ज्ञानवापी मस्जिद, कृष्ण जन्मभूमि से सटी हुई शाही मस्जिद , और सोमनाथ मन्दिर तोड़ कर बनायीं गयी मस्जिद ऊंट चोरी के ही विभिन्न प्रमाण पत्र  है। 

ईरान इराक इजराइल लेबनान तुर्की सायप्रस हंगरी मोरक्को अल्जीरिया नाइजीरिया लीबिया सोमालिया जर्मनी मलेशिया इंडोनेशिया पाकिस्तान अफगानिस्तान बांग्लादेश मिस्र कौन सा ऐसा देश है जहाँ इन्होने अण्डों से लेकर ऊँट तक नहीं चुराए हैं ????? और ऊपर से तुर्रा ये कि इनकी कुरान में लिखा है कि दूसरों के धर्मस्थलों में नमाज़ हराम है। 

https://en.wikipedia.org/wiki/Conversion_of_non-Islamic_places_of_worship_into_mosques

11 जनवरी 630 में मक्का के मन्दिर को  मस्जिद बनाने से लेकर 2001 में अफगानिस्तान के  बामियान में 50 मीटर ऊँची बुद्ध की मूर्ती तोड़ना इन अंडा चोरों के ऊंट चोरी में स्नातक होने की गवाही देता है। 
 इतने सब के बावजूद कुछ जड़बुद्धि सेक्युलर, रामजन्मभूमि की जगह भी अस्पताल , पार्क,स्कूल बनाने का सुझाव दे रहे थे। वैसे बच गए भारत वाले वर्ना ऊँट चोरों के दबाव में #रामजन्मभूमि का हाल भी #सोफिया_हेगीआ माफिक ही होता। अभी भी कुछ कह नहीं सकते क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के जज और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के हिन्दू वकील अभी अभी सेक्युलरता की बूटी पीकर सारे कायदे कानून हिन्दुओं के ऊपर ही अम्ल में लाते है अन्य मज़हबों की आस्था में खलल डालना वे संविधान के खिलाफ समझते हैं ।

शनिवार, 20 मई 2017

लोमड़ी सपने में भी मुर्गियाँ गिनती है



हम उन्हें बता रहे हैं कि ये बैल हैं, लेकिन वो फिर भी दूध दुहने की बात करते हैं। यह तर्जुमा है अरब की कहावत #नोलोम_तो_येएलो_इहीबूह का। क्या करें उन जाहिलों का जो वामपंथियों द्वारा मनगढंत इतिहास पढ़ कर हर बार हिन्दुओं को लड़वाने की साज़िश करते हुए जाहिलों को बैल दुहने के लिए उकसा रहे है। 

दो दिन पहले मैंने इसी फेस बुक पर एक सवाल पुछा था कि ---वो कौन सा मुस्लिम आक्रांता था जिसने हिन्दुओं की लाशों से नदी पाट कर पानी का रंग लाल कर दिया था ???? इस सवाल का जवाब इस पोस्ट के अंत में दूंगा लेकिन , यह सवाल क्यों किया था , उसे समझ लीजिये।

 "Milk the Persians and once their milk dries, suck their blood." ----
 पारसियों का दूध निकाल लो और जब दूध सूख जाये तो उनका खून चूस लो। शायद यही तर्ज़ुमा है इस आदेश का जो दिया था अरब के मुस्लिम खलीफा  ने वर्ष 741 AD में ईरान पर काबिज होने के बाद। ईरान इराक से पारसियों पर अत्याचारों होने की कहानी न यहाँ से शुरू होती है और न यहाँ पर ख़त्म होती है। 
लेख पढ़ने से पहले इतनी सी बात याद रख लीजिये कि वर्ष 610 में इस्लाम के पैदा होने से पहले वर्तमान ईरान और इराक में एक शांतिप्रिय धर्म #पारसी हुआ करता था। --- अब आगे पढ़िए , कि क्या हुआ उस धर्म का। 
वर्ष 636 में अरब के खलीफा उमर ने ईरान के राजा को पत्र भेजा कि वो लोग पारसी धर्म छोड़ कर इस्लाम कबूल कर लें। जिसे ईरान के राजा यज़्दगिर्द ने यह कह कर मन कर दिया कि हमें तुम्हारा मारकाट वाला धर्म स्वीकार नहीं करना है। हम जहाँ भी जाते हैं , वहां धर्म प्यार मोहब्बत और बंधुत्व के बीज बोते हैं।  बस यही बात खलीफा को नागवार गुज़र गयी। ( अधिक जानकारी के लिए और पारसी राजा के बेहतरीन जवाब के लिए निम्न लिंक अवश्य पढ़ें या जिन शांतिप्रिय मज़हब के लोगों को बहस करने की खुजली हो वे पहले निम्न लिंक को अवश्य पढ़ लें )

  मुख्य ईरान पर अरब आक्रमण से पहले खलीफा इब्न अल खत्ताब ने मेसोपोटामिया और ईरान के एक राज्य खवरवरण (आज का इराक) पर कब्ज़ा किया। वर्ष 637 में इस खलीफा के एक सेनापति साद इब्न अबी वक़्क़ास ने खवरवरण की राजधानी स्तेस्फियन को जीता -- और वहां के महलों , और संग्राहलयों को आग लगा दी। इसके बाद #तारीखे_अल_ताबरी के लेखक #अल_ताबरि के अनुसार साद इब्न अबी वक़्क़ास ने खलीफा  से पूछा कि "स्तेस्फियन में किताबों का क्या करना है ?" उमर का जवाब आया "अगर इनमे कुरान से अलग कुछ लिखा है तो यह ईश निंदा है और अगर इनमे कुरान जैसी बातें ही लिखी हैं तो इनकी ज़रुरत नहीं है हमारे लिए कुरान ही पर्याप्त है।" इसके बाद वक़्क़ास ने पुस्तकालयों को आग लगा दी और बचीखुची किताबों को फराह नदी में बहा कर पारसी वैज्ञानिकों और विद्वानों की पीढ़ियों की मेहनत कुछ दिनों में खत्म कर दी ।इसके बाद 40000 पारसियों को पकड़ कर अरब देशों में गुलाम बना कर बेच दिया। ( भारत की नालंदा, तक्षशिला , पाटलीपुत्र और ओदन्तपुर याद आये क्या ???) 
इसके बाद #मुस्लिम इतिहास बताता है कि उल्लाईस की लड़ाई में अरब सेनापति पारसियों के प्रतिरोध से थक कर इतना खीज गया कि युद्ध जीतते ही उसने सारे युद्ध बंदियों का क़त्ल करवा कर नदी में फिंकवा दिया और इस नदी पर बने हुए बाँध को खुलवा दिया। पूरी नदी में लाशें ही लाशें तैर रहीं थीं और पानी का रंग लाल हो गया था , जिसके बाद इस नदी को खून की नदी कहा जाने लगा। इसके बाद अरब लोग ईरान के शहर इस्तखर की तरफ बढ़े और पारसी धर्म को मानने वाले 40000 लोगों को कत्ल कर दिया। (मेरा सवाल तो ज़ेहन में है न , कौन सा वो मुस्लिम आक्रांता था जिसने हिन्दुओं का इतना खून बहाया था कि नदी का पानी लाल हो गया था और उपयोग में लाने लायक नहीं बचा था )

इसके बाद यज़ीद इब्न मोहल्लेब, एक उमय्यैद सेनापति ने ईरान के माज़न्दरान राज्य पर चढ़ाई की। युद्ध जीतने के बाद अरब  आदेश दिया कि जितने भी युद्ध बंदी हैं उन्हें मार कर राजधानी जाने वाली सड़क के दोनों तरफ लटका दो। जब वो माज़न्दरान की राजधानी पहुंचा तो उसने 6000 पारसियों को गुलाम बनाया और 12000 को क़त्ल करवा दिया। इसके बाद #गोरगन शहर में उसने आदेश दिया कि आटा पीसने वाली पनचक्कियां युद्धबंदियों के खून से चलाई जाएँ और तीन दिन तक लगातार पनचक्कियां पारसियों के खून से चलीं। यज़ीद आज भी इस बात के लिए जाना जाता है कि उसने रोटी का आटा युद्धबंदियों के खून से गुंथवाया था और खुद भी वो रोटी खायी थी। 
इसके साथ ही हज़ारों पारसी पुजारियों को मार दिया गया,  धार्मिक साहित्य जला दिया गया। उनके सारे आग के मदिर तोड़ दिए गए और जो नहीं तोड़े गए उनपर मीनारें बना कर उन्हें मस्जिदों में तब्दील कर दिया गया। #इस्तखर और #बुखारा के "चाहर तकि"आग मंदिर के ऊपर मीनारें लगा कर बनाई गयीं मस्जिदें इसी का उदहारण हैं। (अयोध्या,काशी मथुरा याद आया क्या ??? ) इस तरह अरब का ईरान इराक पर एकाधिकार स्थापित हुआ। 

ईरान जीतने के बाद , पारसियों को #धिम्मी / #जिम्मी  का दर्जा दिया गया। इस दर्जे के तहत कोई मुसलमान आत्मरक्षा की आड़ में किसी भी पारसी को परेशान कर सकता था,बेइज़्ज़त कर सकता था, गाली दे सकता था , शारीरिक यंत्रणा दे सकता था, पारसी का जबरदस्ती धर्मान्तरण कर सकता था या जान से मार सकता था। यह सब करने के लिए किसी वजह की ज़रुरत नहीं चाहिए होती थी। धिम्मी को कुरान के मुताबिक जजिया तो देना ही होगा, यह अलिखित क़ानून था। और जजिया देने का एक तरीका भी था , कि धिम्मी जजिया देने चल कर जायेगा और वसूलने वाला उसे गर्दन से पकड़ कर झिंझोड़ कर कहता है ,जजिया दो, और जजिया लेने के बाद उसकी गर्दन पर थप्पड़ मार कर उसे भगा दिया जाता था। मकसद धिम्मियों की हर हाल में बेइज़्ज़ती करना था। ( याद आया , भारत में अलाउद्दीन खिलजी के राज्य में जजिया वसूलने वाला , जजिया देने वाले का मुंह खुलवा कर उसके मुंह में थूक सकता था )
Mary Boyce अपनी किताब  Zoroastrians, Their Religious Beliefs and Practices में लिखती हैं कि जजिया सबसे बढ़िया साधन था , पारसियों को स्वेच्छा से इस्लाम कबूल करने के लिए। धिम्मी लोगों को त्वरित धर्मांतरण के लिए विशेष सुविधाएँ दी जातीं थीं जिससे वे धिम्मी होने के दंश और तत्पश्चात होने वाली बेइज़्ज़ती से निजात प् सकें। एक बार कोई पारसी इस्लाम कबूल कर लेता था तो उसके बच्चों को मदरसों में जाना पड़ता था ,अरबी भाषा और क़ुरान सीखनी पड़ती थी और इस तरह पारसी अपनी पहचान खोते गए। मैरी बॉयस आगे लिखती हैं कि इस्लाम कबूलना जितना आसान था पलट कर अपने धर्म में जाना उतना ही मुश्किल था यदि कोई कोशिश भी करता तो उसे मौत ही मिलती थी। इस तरीके से धर्मपरिवर्तन के पश्चात् अरब ये कहते थे कि पारसियों ने स्वेच्छा से धर्मपरिवर्तन किया है। इस तरह की दबावों और प्रतिबन्धों को जिनके तहत धर्म परिवर्तित किया जाता था उन्हें ,बहुत आसानी से भुला और नज़रअंदाज़ कर दिया जाता था। 
पारसी युद्धबन्दी और गुलाम जो इस्लाम कबूल कर लेते थे उन्हें आज़ाद कर दिया जाता था।  ( ये सब पढ़ने के बाद अलाउद्दीन खिलजी और औरंगज़ेब याद आये क्या ????)

एक वेबसाइट  tenets.zoroastrianism.com जिसका शीर्षक है Zarathustri Pilgrimage Sites In Iran में  Prof. Edward G. Browne in his A Year Amongst The Persians (the year being 1887-88): को उद्घृत करते हुए बहुत ही मार्मिक शब्दों में पारसियो की दयनीय दशा का वर्णन करते हुए कहती है कि --- इनके घरों में खिड़कियां नहीं होती थीं। रौशनी सिर्फ दरवाज़ों की झिरियों से आ सकती थी। खिड़कियों की जगह दीवारों में टूटी हुई बोतलें लगी होती थीं जिनसे सिर्फ बाहर कौन है सिर्फ यह देखा जा सकता। छतें घरों को को पूरा का पूरा ढकती थीं जिससे कोई लूटमार करने वाला , बलात्कारी छत के  घर में न घुस आये। हर तरफ से बंद घर एक दमनकारी अन्धकारपूर्ण भय पैदा करते थे और यह अंधकारपूर्ण स्थिति उस धर्म के अनुयायियों की थी जिन्होंने सिर्फ रोशनी और आग को ही पूजना सीखा था। 

    
 वर्ष 741 तक खलीफाओं के अत्याचार इतने बढ़ गए थे कि सब सन्धियों और करारों के बावजूद ईरान के सारे के सारे आग मंदिर तोड़ दिए गए और खलीफा ने ये ऐलान कर दिया कि -----"Milk the Persians and once their milk dries, suck their blood." --- 

#अछूत_बना_कर_मानमर्दन  ----
Prof. John Hinnells जो विश्वप्रसिद्ध विश्विद्यालयों में प्रोफेसर रहे हैं और जिन्होंने सिर्फ और सिर्फ पारसी इतिहास और धर्म पर शोध किया है , वे लिखते है कि पारसियों को इस्लामी आक्रांता #नाजिस कह कर सम्बोधित करते थे  और उन्हें अशुद्ध था मुसलमानों में अशुद्धता फैलाने वाला समझा जाता था। इसलिए पारसियों को अछूत समझा जाता था और उन्हें मुसलामानों के साथ रहने के अयोग्य समझा जाता था। इस मानसिकता का एक परिणाम यह भी निकला कि पारसियों को ज़बरदस्ती धक्के मार कर शहर से निकल दिया जाता था और मुसलमानों की उपस्थिति में उनपर हर प्रकार के प्रतिबन्ध लगे रहते थे। ये परिस्थियाँ वर्ष 637 से 750 तक की लिखी गयीं है ,( और अगर किसी को अल बरुनी का वर्ष 1030 में भारत के विषय में लिखा हुआ संस्मरण #किताब_तारीखे_अल_हिन्द,  याद हो तो वो साफ़ साफ़ लिख कर गया है कि चार वर्णो और सात शिल्पकार जातियों में छुआछूत जैसी कोई बिमारी नहीं थी।) 
इस तरह एक समय ईरान के बहुसंख्यक पारसी गिनती में कम होने लगे, कम होने के कारण उनकी प्रतिरोध क्षमता कम होती गयी और एक दिन ईरान और इराक से पारसी ख़त्म हो गए। 

आज ईरान की जनसँख्या आठ करोड़ की है यहाँ सिर्फ 25271 पारसी और 8756 यहूदी बचे हैं और इराक की जनसँख्या लगभग तीन करोड़ साठ लाख -- जान कर खुश हो जाइये कि इराक में एक भी यहूदी और पारसी नहीं  बचा है। ( भारत की कश्मीर घाटी की याद तो नहीं आ रही जहाँ 1910 तक दस लाख हिन्दू थे आज  2947 बचे हैं। )

ये बातें वामपंथी इतिहासकार कभी बताएँगे नहीं , छुआछूत और दलितापे का ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़ने वाले कभी जानने की कोशिश करेंगे नहीं और अपने को सेक्युलर समझने वाले बीमार दिमाग के लोग कभी असली मुज़रिमों को कटघरे में खड़ा करने का दम अपने अंदर पैदा कर नहीं पाएंगे। 

छुआछूत, ऊंच नीच,धोखाधड़ी, मारकाट, बलात्कार, बेगुनाहों का लाखों की तादाद कत्लेआम ,तेरा धर्म और मेरा मज़हब ये सब भारत में कब और कहाँ से आये इसके लिए भारत के इतिहास को नहीं दूसरे देशों और मज़हबों के इतिहास को ही जान लिया जाये तो आज के अवार्ड वापसी गैंग वाले एक ईमान वाले के मरने पर जो अवार्ड वापिस करने की होड़ में शामिल हो जाते हैं उनके पास  डूब मरने के लिए चुल्लूभर पानी भी ज्यादा होगा। 

बात शुरू हुई थी की कौन सा वो मुस्लिम आक्रांता था जिसने हिन्दुओं का इतना खून बहाया था कि नदी का पानी लाल हो गया था और उपयोग में लाने लायक नहीं बचा था -----

अपनी किताब #तारिख_ए_यामिनी में  अबू नस्र मुहम्मद इब्न मुहम्मद अल जब्बरुल उत्बी ---थानेसर के निकट महमूद ग़ज़नवी द्वारा किये गए कत्लेआम का ज़िक्र यूँ करता है कि ---- नदी के पानी में खून इतनी अधिक मात्रा में था कि नदी का पानी लाल हो गया था i लोग उसे पी नहीं सकते थे। जो लोग किला छोड़ कर भागे या तो उन्हें काट डाला गया या वो नदी में बह गए। कुछ नहीं तो पचास हज़ार से ज्यादा आदमियों का क़त्ल किया गया था। 
कहाँ ख़त्म हो गए पारसी अपने देश से ??? 
कहाँ खो गए यज़ीदी , अपने देश से ???
क्यों ख़त्म हो  बौद्ध धर्म दुनिया के नक़्शे से ???
क्यों और किससे कूर्द अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहे है ???

आज का मुस्लिम देश सीरिया कभी ईसाई  हुआ करता था ,
मलेशिया,इंडोनेशिया,अफगानिस्तान बौद्ध हुआ करता था 
पकिस्तान कभी हिन्दू हुआ करता था। 


क्या अभी भी तय नहीं कर पाए कि भारतीय संस्कृति में कमीनगी की मिलावट किसने की है ????