शनिवार, 11 नवंबर 2017

गुलाम मानसिकता के पहरे दार (2)

10  नवम्बर को कर्नाटक के कांग्रेसी मुख्यमन्त्री सिद्धाराम्मैया ने टीपू सुल्तान की जयंती मनाई।  कांग्रेस टीपू की जयंती 2015 से मना रही है लेकिन मैसूर प्रान्त के सेक्युलरिस्ट और भारत के मुसलामान इसे दशकों से राष्ट्रवीर बना रहे हैं। उसे राष्ट्रनायक बनाने के किये लेख लिखे जा रहे हैं नाटकों का मंचन किया जा रहा है जिन्हे सरकारें प्रायोजित करतीं हैं। 

एक ने टीपू सुलतान पर सीरियल बनाया और आग में जल गया।  दूसरे ने तलवार खरीदी और बर्बाद हो गया। टीपू की जयंती मनाने वाली कांग्रेस का क्या होगा शायद साफ़ नज़र आ रहा है। 


भारतीय इतिहास की सच्चाई को रौंद डालने और झूठ को ही सच्चाई की शकल में दिखने के कई उदाहरणों में से एक टीपू सुलतान का भी है। 
एक समय था जब नैसुर के हाटों और बाज़ारों में , उत्सवों और महोत्सवों में भाट लोग देवी देवताओं की प्रशंसा के गीत गाने वाले, भाट बंदियों में तब्दील होकर टीपू के गीत गाने लग गए। उन्हें न इतिहास से मतलब था न टीपू के दुष्कृत्यों से।  उन्हें इस काम के लिए मुसलमान व्यापारी पैसा दिया करते थे। वक़्त बदला तो टीपू का महिमामंडन करने वाले नाटकों का मंचन शुरू हो गया। जब वो अंग्रेजों से लड़ रहा था तो तत्कालीन लेखकों ने ऐसे नाटक और लेख लिखे जैसे उससे बड़ा और कोई देश भक्त था ही नहीं। देखने वालों ने इसे ही सही इतिहास मान लिया। आजादी मिलने के बाद मार्क्सवादी लेखकों ने, वोट बैंक का धंदा करने वालों ने ,मुस्लिम कलाकारों तथा नाटककारों ने , फिल्मे बनाने वालों ने , टीपू सुलतान का राष्ट्रिय नायक के रूप में खूब महिमामंडन किया। असली इतिहास को मार कर दफना दिया गया। 
उसने अपने दो बच्चों को अंग्रेजों के यहाँ बंधक रखा था इसलिए वो नायक हो गया और अंग्रेज सबसे निकृष्ट कौम हो गए।  ऐसा लिखते वक़्त लेखक ये छुपा गए की बच्चो और परिजनों को युद्धबंदी बना कर रखने की प्रथा मुसलामानों ने ही शुरू की थी।  
अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने को लेकर यदि टीपू को राष्ट्रनायक बनाया जाता है तो उन्ही अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले मराठों को ये इतिहासकार महानायक क्यों नहीं बनाते ??? ज़माने से मैसूर में चली आने वाली राजभाषा कन्नड़ को बदल कर फ़ारसी को राजभाषा बना दिया। ( हिंदी का विरोध करने वाले आज भी राजस्व विभाग में फ़ारसी के बहुत से शब्दों का प्रयोग करते हैं, और राजस्व विभाग के दस्तावेजों में आज भी बाप और बेटे के बीच #बिन शब्द का प्रयोग होता है , जैसे राहुल गाँधी बिन राजीव गाँधी )। 
गाँवों और शेरोन के नाम बदल दिए जैसे - ब्रह्मपुरी को सुल्तानपेट ,चित्रदुर्ग को फार्रुखयब , कोडगु को जफराबाद ,देवनहल्ली को युसूफाबाद ,डिंडिगल को खलीलाबाद , गुत्ती को हिस्सार , कृष्णगिरि को फलक इल अज़म , मैसूर को नज़रबाद , पेनुगोंडा को फक्राबाद, सँकरीदुर्ग को मुजफ्फराबाद , सिरा को रुस्तमाबाद , सकलेशपुर को मंजराबाद। ये सब टीपू की राष्ट्रीयता और धर्म सहिषुणता की अप्रितम मिसालें हैं।

कर्नाटक केरल और तमिलनाडु के हजारों टूटे हुए मंदिरों को देखने के बाद इतिहासकार और साहित्यकार तमाम शैव और वैष्णव युद्धों का नकली जामा पहना कर झूठ को सच साबित करने में व्यस्त हैं लेकिन वो इन पत्रों और लेखों का क्या करेंगे जो टीपू सुलतान ने खुद लिखे थे और आज भी लन्दन के " इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी में मजूद है ????

(i) अब्दुल खादर को लिखित पत्र 22 मार्च 1788 
“बारह हजार से अधिक, हिन्दुओं को इ्रस्लाम से सम्मानित किया गया (धर्मान्तरित किया गया)। इनमें अनेकों नम्बूदिरी थे। इस उपलब्धि का हिन्दुओं के मध्य व्यापक प्रचार किया जाए। स्थानीय हिन्दुओं को आपके पास लाया जाए, और उन्हें इस्लाम में धर्मान्तरित किया जाए। किसी भी नम्बूदिरी को छोड़ा न जाए।”(भाषा पोशनी-मलयालम जर्नल, अगस्त 1923 )

(ii) कालीकट के अपने सेना नायकको लिखित पत्र दिनांक 14  दिसम्बर 1788 
”मैं तुम्हारे पास मीर हुसैन अली के साथ अपने दो अनुयायी भेज रहा हूँ। उनके साथ तुम सभी हिन्दुओं को बन्दी बना लेना और वध कर देना…”। मेरे आदेश हैं कि बीस वर्ष से कम उम्र वालों को काराग्रह में रख लेना और शेष में से पाँच हजार का पेड़ पर लटकाकार वध कर देना।”
(iii) बदरुज़ समाँ खान को लिखित पत्र (दिनांक 19 जनवरी 1790)
”क्या तुम्हें ज्ञात नहीं है निकट समय में मैंने मलाबार में एक बड़ी विजय प्राप्त की है चार लाख से अधिक हिन्दुओं को मूसलमान बना लिया गया था। मेरा अब अति शीघ्र ही उस पानी रमन नायर की ओर अग्रसर होने का निश्चय हैं यह विचार कर कि कालान्तर में वह और उसकी प्रजा इस्लाम में धर्मान्तरित कर लिए जाएँगे, मैंने श्री रंगापटनम वापस जाने का विचार त्याग दिया है।”
(उसी पुस्तक में)
टीपू ने हिन्दुओं के प्रति यातनाआं के लिए मलाबार के विभिन्न क्षेत्रों के अपने सेना नायकों को अनेकों पत्र लिखे थे।
”जिले के प्रत्येक हिन्दू का इस्लाम में आदर (धर्मान्तरण) किया जाना चाहिए; उन्हें उनके छिपने के स्थान में खोजा जाना चाहिए; उनके इस्लाममें सर्वव्यापी धर्मान्तरण के लिए सभी मार्ग व युक्तियाँ- सत्य और असत्य, कपट और बल-सभी का प्रयोग किया जाना चाहिए।”
(हिस्टौरीकल स्कैचैज ऑफ दी साउथ ऑफ इण्डिया इन एन अटेम्पट टूट्रेस दी हिस्ट्री ऑफ मैसूर- मार्क विल्क्स, खण्ड 2  पृष्ठ 120)
 इतिहासकार कहते हैं कि टीपू बहुत धर्म सहिषुण और राष्ट्रीयता से ओतप्रोत था ------ मैसूर के तृतीय युद्ध (1792 ) के पूर्व से लेकर निरन्तर 1798 तक अफगानिस्तान के शासक, अहमदशाह अब्दाली के प्रपौत्र, जमनशाह, के साथ टीपू ने पत्र व्यवहार स्थापित कर लिया था। कबीर कौसर द्वारा लिखित, ‘हिस्ट्री ऑफ टीपू सुल्तान’ (पृ’ 141-147) में इस पत्र व्यवहार का अनुवाद हुआ है जिसमे उसने अफगानिस्तान के शासक और तुर्किस्तान के शासक से भारत पर हमला कर ईसाईयों को भगाने और काफिरों को खत्म करके इसे दारुल इस्लाम बनाने का प्रस्ताव भेजा था। 
विकिपीडिया पढ़ेंगे तो टीपू को बहुत दानवीर बताया गया है लेकिन हक़ीक़त यह है कि जिस वर्ष टीपू सुलतान मारा गया था उस वर्ष सिर्फ दो मंदिरों ( श्रीरंगपत्तनम और श्रृंगेरी के मठ ) को ही राजकीय सहायता मिलती थी , श्रीरंगपत्तनम को इसलिए कि वो वहां राज करता था और श्रृंगेरी को इसलिए क्योंकि उस मठ पर हमला करने के बाद ही टीपू की हार हुई थी। और अगर टीपू इतना ही बड़ा धर्म सहिषुण व्यक्ति था तो पुरातत्व के संकलनकर्ता रवि वर्मा के हिसाब से उसने 8000 मंदिरों को न तोड़ा होता। 
टीपू कितना बड़ा धर्म सहिषुणता का पालक था वो उसकी तलवार पर लिखी हुई निम्न नज़ीर से ही पता चलता है ---  टीपू की बहुचर्चित तलवार’ पर फारसी भाषा में निम्नांकित शब्द लिखे थे- ”मेरी चमकती तलवार अविश्वासियों के विनाश के लिए आकाश की कड़कड़ाती बिजली है। तू हमारा मालिक है, हमारी मदद कर उन लोगों के विरुद्ध जो अविश्वासी हैं। हे मालिक ! जो मुहम्मद के मत को विकसित करता है उसे विजयी बना। जो मुहम्मद के मत को नहीं मानता उसकी बुद्धि को भृष्ट कर; और जो ऐसी मनोवृत्ति रखते हैं, हमें उनसे दूर रख। अल्लाह मालिक बड़ी विजय में तेरी मदद करे, हे मुहम्मद!”
इस अकाट्य तथ्य के बावजूद पिछले 70 सालों से कांग्रेस सरकार टीपू का महिमामण्डन हर संभव तरीके से कर कर रही है। अफ़सोस जिन्हे गुलामी में रहने की आदत पड़ गयी है वो दूसरों की मानसिकता भी गुलाम ही बनाये रखना कहते हैं। 
एक ने टीपू सुलतान पर सीरियल बनाया और आग में जल गया।  दूसरे ने तलवार खरीदी और बर्बाद हो गया। टीपू की जयंती मनाने वाली कांग्रेस का क्या होगा शायद साफ़ नज़र आ रहा है। 

गुलाम लोगों की गुलाम मानसिकता (1)



#तेलंगाना_में_मुस्लिमों_को_नौकरियों_में_12%_आरक्षण ( 10  नवम्बर के समाचारपत्रों में छपी मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव की घोषणा )
#टीपू_सुलतान_की_जयन्ती_ समारोह ( 11 नवम्बर के समाचार पत्रों में सिद्धरमैया द्वारा महिमागान) और #पद्मावती_जी_के_ऊपर_विवादित_चलचित्र।  
 तेलंगाना में आरक्षण की खबर कुछ यूँ है कि मुख्यमंत्री ने पिछड़े हुए मुसलामानों का आरक्षण का कोटा 6 से 12 प्रतिशत तथा मुस्लिम जनजातियों के 4% से 10 प्रतिशत करने का बिल इस शीतकालीन विधानसभा सत्र में करने की घोषणा की है और कुल आरक्षण फिलहाल 62 % तक ले जाने की बात कही है जिसे तमिनाडु की तर्ज़ पर 69% तक ले जाने की चाहत जतायी है। मुसलामानों पर इतनी इनायत क्यों ????

दो पंक्तियों में इस्लाम की मानसिकता को समझने के बाद जब मुस्लिम बादशाह भारत पर राज्य कर रहे थे उस समय के हिन्दुओं और मुसलामानों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर एक नज़र डालते है। 
कुरान के अनुसार इस पूरी दुनिया को अल्लाह ने बनाया है और वही इसका सही मायने में राजा है। धरती पर हुकूमत चलाने वाला राजा ही अल्लाह नाम के उस राजा का सही प्रतिनिधि है; अल्लाह के मज़हब का प्रचार और प्रसार करना ही हुकूमत का अहम् लक्ष्य होता है। अल्लाह के प्रतिस्पर्धी किसी और खुदा के प्रति विश्वास रखता है या ऐसे प्रतिस्पर्धी खुदा के अस्तित्व का प्रचार और प्रसार करता है तो वह राजद्रोह करता है , उससे बढ़कर कोई पाप नहीं होता और उसके लिए मौत ही सही दंड है : अल्लाह के इस मार्ग पर चलना ही #जिहाद कहलाता है। लड़ाई में जीत जाने के बाद इस्लाम में विश्वास नहीं रखने वाले सभी लोग , जीतने वालों के गुलाम बन जाते हैं। और फिर भी जो धर्म परिवर्तन नहीं करता उसे मार दिया जाए ऐसा क़ुरान की सूरा 9 आयत 5-6 और सूरा 8 आयत 38 कहती है कि यदि वे इस्लाम कबूल कर लेते हैं तो उनके पिछले सारे गुनाह माफ़। काफिरों के न मानने पर उन्हें जान से मार देने वाली दसियों आयतें कुरान में दी गयीं हैं। ये थी कुरान मानने वालों की मानसिकता और इसके परिणाम जो हिन्दुओं ने झेले उसका साराँश इतिहास की पुस्तकों में कुछ यूँ दिया हुआ है। 

जो मुसलमान नहीं होता, उसके लिए कोई राजनितिक अधिकार भी नहीं होता।  मुसलमानी सल्तनत में उसे जीने का हक़ भी नहीं होता। उसे जीने दिया जाता है तो वह भी तत्काल के लिए ही। तब भी उसकी हालत गुलामों की हालत से थोड़ी सी बेहतर होतीथी।  तब उसको "जिम्मी" कहा जाता था क्योंकि तब वह एक करारनामे के तहत जीता था। इसके इलावा मुसलमानी सल्तनत के तहत जीने दिए जाने के एवज़ में उसे एक खास टैक्स भरना पड़ता था। उसका नाम था जजिया ( जज़िया का प्रावधान कुरान के सूरा 9 आयत 29 में है)। मुसलामानों को जिस भूमिकर से छूट मिली होती थी उसे जजिया के साथ वो कर "खरज" भी भरना पड़ता था। लड़ाई के लिए पाले जाने वाले सैनिकों के लिए उसे एक और टैक्स देना होता था।  मुसलामानों को ही सिपाही बनने का अवसर मिलता था और जो गैर मुसलमान होता था उसे सिर्फ निचले दर्जे का नौकर बनने दिया जाता था , वह कभी सिपहसालार या घुड़सवार नहीं बन सकता था। वह कभी घोड़े पर सवार नहीं हो सकता था था अच्छे कपडे नहीं पहन सकता था, हथियार नहीं रख सकता था। मुसलमान जाति के सभी सभी व्यक्तियों के सामने उसे विनीत रहना होता था । अदालत में उसके सबूत के लिए वह मान्यता नहीं होती थी जो एक मुसलमान के सबूत को मिलती थी। वह मेलों, पर्वो तथा त्योहारों में भाग नहीं ले सकते थे। नए मंदिरों का निर्माण नहीं कर सकता था : पुराने मंदिरों को दुरुस्त नहीं करवा सकता था। कमर झुका कर , खुद आ कर खड़े होकर उसे जजिया चुकाना होता था। ये प्रथा कुरआन की सूरा 9 आयत 29  के आधार पर बनायीं गयी थी ( जब तक काफिर जजिया नहीं भरते उनके साथ लड़ते रहो) , जजिया स्वीकार करने वाले मुसलमान को ऊँचे स्थान पर बैठना होता था। 
कभी कोई मुसलमान खंखार के थूकता था तो जिम्मी को भय और भक्ति के साथ , मुंह खोलकर उसको स्वीकार कर लेना चाहिए। परहेज़ की भावना व्यक्त न करते हुए , इसे निगल लेना चाहिए। यदि कोई मुसलमान गैर मुसलमान का  क़त्ल कर देता था तो यह गुनाह नहीं होता था। ये सब जिम्मियों पर इसलिए थोपा जाता था ताकि बेइज़्ज़ती, गरीबी और करों के बोझ से बचने के लिए ये जिम्मी धर्मांतरण करके मुसलमान बन जाएँ। 
मुसलमान व्यापारियों पर ढाई प्रतिशत टैक्स लगता था तो हिन्दू व्यापारियों पर पांच प्रतिशत।  एक समय ऐसा भी आया जब मुसलमान व्यापारियों का टैक्स तो पूरी तरह माफ़ कर दिया गया लेकिन हिन्दू व्यापारियों का यथावत रखा गया। बात यहीं ख़त्म नहीं हुई हिन्दुओं को इन सब करों के अतिरिक्त जब कभी तीर्थयात्रा ( प्रयाग में कुम्भ,काशी , मथुरा वगैरह ) करनी होती थी तो उसके लिए अलग से कर देना होता था। 
नीतिविहीन युद्ध करके जीतना और जीत कर काफिर आदमियों को मार डालना , गुलाम बना लेना और कंधार से लेकर ईरान तक के बाजार में बेचना ,औरतों को अपने जनानखाने में लौंडिया  बना कर रखना और 15 साल से काम उम्र के लड़कों को हिजड़ा बनाने को ये दारुल इस्लाम की तरफ एक कदम मानते थे। 
किसानों के ऊपर लगान का इतना बोझ लाद दिया था कि लगान न चुका पाने की स्थिति में किसान को अपने चार चार साल के  बच्चों को हिजड़ा बना कर गुलामों के बाज़ार में बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता था। और वक़्त के साथ ये मजबूरी एक प्रथा बन गयी जिसके विषय में अकबर के बेटे जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा "तुजुक ए जहाँगीरी " में लिखा है कि -- "हिन्दुस्तान में , खासकर बंगाल की मातहत में रहने वाले सिलहट प्रांत के लोगों में अपने बच्चों को हिजड़ा बना कर , लगान के बदले सुबहदारों को सौंप देने की प्रथा जारी थी। अन्य प्रांत के लोग भी इस प्रथा को धीरे धीरे अपनाने लगे हैं। इस वजह से बच्चे अपनी सृजन शक्ति से वंचित हो रहे हैं। " यह प्रथा बंगाल के बाहर भी प्रचलित थी यानि सारी मुग़ल सल्तनत में फैली हुई थी। स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी थी की हिजड़ों की तादाद के आधार पर राज्य के लगान का हिसाब किताब होता था। .जहांगीर ने ही लिखा है कि उसके दरबारी सैय्यद खान छुगताय के पास ही हज़ार दो सौ हिजड़े थे। इसके अलावा हिजड़ों का व्यवसाय बहुत फायदे का बना हुआ था। एक हिजड़े की कीमत आम गुलाम के मुकाबले तीन गुना हुआ करती थी। भारत के हिजड़ों की मांग इस्पहान , समरकंद और विदेशों में बहुत अधिक थी। औरंगज़ेब ने बेशक मज़हबी कारणों से अण्डकोष फोड़ने की प्रक्रिया का निषेद किया था,फिर भी इस प्रथा को बंद नहीं करवा पाया।  उसकी हुकूमत के दौरान गोलकुण्डा (हैदराबाद) शहर में 1659 में ही बाईस हज़ार मर्दों के अंडकोष फोड़े गए थे। ऐसे हिजड़ों की बजाय लगान के रूप में बच्चों को को ही लेकर उनका धर्मांतरण कर देने से मुसलामानों की तादाद बढ़ेगी , यह जहांगीर का विचार था।" 

यह सिर्फ सारांश है , अत्याचारों की पराकाष्ठा की कल्पना भी आज की पीढ़ी नहीं कर सकती और नामपंथी इतिहासकार पूरी शिद्दत से उन ज़ख़्मों को छुपाने में व्यस्त हैं। मुझे गर्व है और आपको भी होना चाहिए अपने पूर्वजों पर जो अत्याचारों को सहते हुए प्रलोभनों को नकारते हुए मुगलों के सामने नहीं झुके।  पर आज के हिजड़ों का क्या किया जाये ?????

इतिहास में हिन्दुओं द्वारा झेले गए ये असहनीय अत्याचारों का संक्षेप लिखने के बाद चन्द्रशेखर राव  मैं ये पूछना चाहता हूँ कि जब मुग़ल सल्तनत थी तब भी मुसलामानों ने सत्ता का सुख भोगा, जो कष्ट नहीं झेल पाए वो सुख भोगने के लिए मुसलमान बन गए। क्या उन्ही कष्टों को भोगने का सिला आज तुम हिन्दुओं को दे रहे हो , बिना अंडकोष फुड़वाये हुए हिजड़े बनकर ??????

क्रमशः ----#टीपू_सुलतान_की_जयन्ती_ समारोह ( 11 नवम्बर के समाचार पत्रों में सिद्धरमैया द्वारा महिमागान) और #पद्मावती_जी_के_ऊपर_विवादित_चलचित्र।  

शनिवार, 9 सितंबर 2017

पहले मुस्लिम फिर भारतीय

ये पहले मुसलमान हैं उसके बाद भारतीय ----डॉ अम्बेडकर (1940)
भारत के उत्तर पश्चिम म्यंमार से 3433.2 किमी दूर अमृतसर की खैरुद्दीन मस्जिद से लोगो ने रोहिंग्या मुसलामानों के समर्थन में शुक्रवार (08/09/17)को जुमे की नमाज़ के बाद जलूस निकाला। भारत के सुदूर दक्षिण में म्यंमार से 4293.4 किमी दूर केरल में समस्त केरल जमियतुल उलेमा ने जुमे की नमाज (08/09/17) में रोहिंग्या मुसलामानों के समर्थन में नमाज अदा की और 11 सितम्बर को दिल्ली में म्यंमार के दूतावास के बाहर विरोध प्रदर्शन करने की घोषणा की है।
इस्लाम को शांति और भाईचारे का मज़हब बताने वाले दुनिया भर के मुसलामानों और बुद्धिजीवियों को आज इंसानियत याद रही है। आज के ये बुद्धिजीवी मोपला और नोआखली में लाखों हिन्दुओं के कत्ले आम के जवाब नहीं दे पाएंगे। पर आज इन रोहिंग्या मुसलमानों को सहानुभूति दिखाने वालों को 1990 में न कश्मीर के शरणार्थियों से कोई सहानुभूति हुई और न 2014 में इराक के कुर्द और यज़ीदियों से कोई सहानुभूति हुई। आदमी मारे गए, बच्चे और औरतें जानवरों की तरह बाजार में बेचीं गयीं , मगर एक भी बुद्धिजीवी नहीं बोला।
कुछ दिन पहले एक टीवी चैनल पर बहस के दौरान वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने डंके की चोट पर कहा था की भारत में वामपंथी पत्रकार अमरीका से मोटा पैसा पा कर उसका एजेंडा चला रहे हैं। ये तो चरित्र हुआ वामपंथी पत्रकारों का। अब भारत के मुसलामानों को इन्सानियत का पाठ याद आने लगा , इनके इस चरित्र को डॉ आंबेडकर 1940 में #थॉट्स_ऑन_पकिस्तान और बाद में 1945 में ही इसी पुस्तक के संशोधित संस्करण #पाकिस्तान _और_द_पार्टीशन_ऑफ़_इंडिया में बखूबी ब्यान कर दिया था।
इस पुस्तक के 12 वे अध्याय में अंग्रेज़ों से आज़ादी की लड़ाई के मुद्दे पर कांग्रेस गाँधी से मुसलामानों के मतान्तरों के लम्बे चित्रण के बाद पृष्ट 320 पर आंबेडकर लिखते हैं ----
" तमाम सिद्धातों को मद्देनज़र रखते हुए इस्लाम के इस सिद्धांत पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। इस सिद्धांत के अनुसार , एक देश में जिसमे मुस्लिम शासक नहीं हैं, जब कभी मुस्लिम कानून और उस देश के कानून में विरोधाभास होगा , वहां पर ये लोग उस देश के कानून के ऊपर मुस्लिम कानून ही प्रभावी मानेंगे और देश के कानून को चुनौती देना ये न्यायसांगत मानेंगे।
8 जुलाई 1921 को कराची में हुई "आल इंडिया खिलाफत कॉन्फ्रेंस " में अध्यक्षता करते हुए मोहम्मद अली ने एक संकल्प पारित किया कि " उलेमाओं की यह ज़िम्मेदारी है कि धार्मिक रूप से वे यह सुनिश्चित करें कि कोई भी मुसलमान अंग्रेजी हुकूमत और सेना में ऐसा कोई आदेश नहीं मानेगा जो इस्लाम के खिलाफ हो। " उनकी इस तहरीर के लिए उनके ऊपर मुकद्दमा दायर किया गया जिसकी सफाई में उन्होंने बहुत लम्बे तर्क दिए जिसका सार यह है कि मुस्लिम सिर्फ खुदा के बताये हुए कुरान द्वारा दिए गए आदेशों के इलावा किसी और के न तो आदेश को मानेगा और न किसी का प्रभुत्व स्वीकार करेगा।"
मोहम्मद अली के उपरोक्त जवाब का संज्ञान लेते हुए आंबेडकर लिखते है कि " इससे जो भी एक स्थिर सरकार की कल्पना करता है उसके लिए चिंतित होना स्वाभाविक है। आगे आंबेडकर लिखते हैं कि " मुस्लिम धार्मिक कानों के हिसाब से दुनिया दो हिस्सों में विभाजित है-- दारुल इस्लाम ( इस्लाम का घर) और दारुल हर्ब ( लड़ाई का घर)। दारुल हर्ब वो देश हैं जहाँ मुसलमान सिर्फ रहते हैं मगर शासक नहीं हैं। जब मुसलामानों का यह धार्मिक क़ानून है तो भारत कभी भी संयुक्त रूप से हिन्दुओं और मुसलामानों की मातृभूमि नहीं हो सकता। यह मुसलमानों की ज़मीन हो सकता है पर यह संभव नहीं की हिन्दू और मुसलमान बराबरी के साथ रह सकें। , हाँ ,यह मुसलमानों की ज़मीन हो सकता है जब इसकी सत्ता मुसलामानों के हाथों में हो। जिस क्षण देश की सत्ता गैर मुस्लिमों के हाथों में चली जाती है , यह मुसलमानों की धरती नहीं रहती और दारुल इस्लाम की जगह दारुल हर्ब बन जाती है।
इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए अम्बेडकर इनकी जिहादी मानसिकता की विवेचना करते हैं और 1919 में अफगानिस्तान के आमीर से भारत के ऊपर आक्रमण करने की घटना का ब्यौरा देते हुए पृष्ट 324 पर लिखते हैं --- न सिर्फ ये जिहाद की घोषणा कर सकते हैं बल्कि जिहाद को सफल बनाने के लिए किसी भी विदेशी मुस्लिम ताकत का सहारा ले सकते हैं। ( पृष्ट 325-26) मुसलामानों का तीसरा धार्मिक सिद्धांत यह है कि ये क्षेत्र / अथवा राष्ट्र की सीमाओं में नहीं बंधते , इनके बन्धन सामाजिक और धार्मिक होते हैं, जो कि क्षेत्र की सीमाओं से बाहर होते हैं। यही इनके सम्पूर्ण इस्लामीकरण का आधार होता है। यही कारण है जो भारत का हर मुसलमान कहता है कि वो पहले मुसलमान है फिर भारतीय है। इनका यह मनोभाव स्पष्ट करता है ,क्यों भारतीय मुसलमान भारत की प्रगति में बहुत कम हिस्सेदारी निभाते हैं और मुस्लिम देशों की समस्या के लिए अपने आपको पूरी तरह से थका देते हैं, और क्यों मुस्लिम देश इनके ख्यालों में पहले आते हैं और भारत बाद में आता है। ( यहाँ 1912 में बाल्कन के युद्ध. तथा 1922 में तुर्की और अरब देशो की यूरोप के देशों से युद्ध का उदहारण दिया गया है)
इन लोगों की निगाह में गाँधी जी ( काफिर )का क्या दर्जा था इस सन्दर्भ में मोहम्मद अली के 1924 में अलीगढ और अजमेर में दिए गए वक्तव्य इस प्रकार है ----( पृष्ट 332) गाँधी का चरित्र कितना भी शुद्ध क्यों न हो परन्तु मेरे धार्मिक नज़रिये से वो बिना चरित्र के मुसलमान से भी घटिया है। इसी वर्ष लखनऊ के अमीनाबाद पार्क की एक सभा में जब मोहम्मद अली से दुबारा पुछा गया कि क्या गाँधी जी के विषय में दिए गए वक्तव्य पर वे कायम हैं तो मोहम्मद अली ने दोहराया --" हाँ, मेरे धर्म और धर्म मत के हिसाब से मैं एक दुश्चरित्र और गिरे हुए मुसलमान को गाँधी से बेहतर समझाता हूँ।"
वो 1924 था आज 2017 है। कुछ बदला क्या ??? ( तीन तलाक़ पर इन्होने अंत समय तक संविधान को चुनौती दी और जद्दो जहद की, और यदि मुस्लिम महिलाएं सामने न आतीं तो जो अल्पमत से ये जो केस हारे हैं वो भी न हारते )। हमारी सरकारें सच्चाई से मुंह मोड़ कर कश्मीर समस्या पाकिस्तान प्रायोजित बतातीं हैं, जबकि हकीकत यह है कि वहाँ के बहुसंख्यक मुसलामानों को यह कबूल नहीं है कि उनके ऊपर काफिरों का शासन हो , इसीलिए पाकिस्तान के हालात जानते हुए भी वो पकिस्तान की सत्ता के अधीन आने या अपनी खुद की सत्ता की मांग कर रहे हैं। इन्हे दारुल इस्लाम चाहिए।
बाकि इनको कश्मीरी हिन्दुओं के मरने और रिफ्यूजी होने का कष्ट नहीं है , आतंकवादियों के मरने पर पूरा मातम होता है। 2014 से मारे जा रहे कुर्दों और यज़ीदियों का अफ़सोस नहीं है , पर रोहंगिया मुसलामानों के भारत में शरण देने पर पूरी सहानुभूति है।
कारण आप समझ ही गए होंगे। वही हैं जो अम्बेडकर जी ने आज से 80 साल पहले लिखे थे। इनके लिए देश से पहले धर्म है। आएंगे शरणार्थी बन कर , दारुल इस्लाम बना पाएं या नहीं पर कश्मीर , कैराना , पश्चिमी बंगाल और केरल बना कर हर कदम पर सुविधाएँ मांगेंगे और ये कह कर संविधान को हर कदम पर चुनौती देंगे कि हमारे लिए कुरआन का कानून ही अंतिम कानून है।
जिस कौम को #भारत_माता_की_जय कहने में गुरेज़ होता है , उम्मीद करता हूँ आप उसके#जय_भीम_जय_मीम के पीछे छुपे इरादों को समझ गए होंगे। भारत के लोग समँझे या न समझें म्यांमार के लोग समझ गए हैं।


शनिवार, 12 अगस्त 2017

भारत को आज़ादी किसने दिलवाई

आज़ादी भारत ने ली थी या भारत को दी गयी थी ??? अगर आज़ादी भारतियों ने लड़ कर ली थी तो इसका असली श्रेय किसे मिलना चाहिए ??? सवाल अटपटा सा है न। 

राष्ट्रपति महोदय ने गाँधीजी  का नाम नहीं लिया तो कांग्रेस ने एक मुद्दा बना दिया। फिर भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ पर सोनिया जी कहती हैं कि बहुत से संगठनों ने "भारत छोड़ो आन्दोलन" का विरोध  था। मीडिया ने सुर्ख़ियों में इसे आर एस एस पर निशाना साधना बताया।  हो सकता है सोनिया गाँधी की मंशा भी यही रही हो। पर जिसने भी इतिहास का गहन अध्ययन होगा या कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन महासचिव पी सी जोशी के ब्रिटिश सरकार को  पत्र पढ़े होंगे  वे जानते होंगे कि बाबा के साथ भारत छोड़ो आन्दोलन का मुखर विरोध और उस समय अंग्रेज़ों का साथ वामपंथियों ने दिया था। 
खैर जब इतिहास लिखा जाता है तो लिखने वाला अपने नज़रिये से घटनाओं को लिखता है। कांग्रेस कोई मौका नहीं चूकती दुनिया को ये बताने में कि आज़ादी उन्होंने दिलाई। क्लास एक से बारह तक "आज़ादी की लड़ाई " नाम के अध्याय में गाँधी नेहरू टैगोर सरोजिनी नायडू और दो चार नामों के इलावा कौन सा नाम पढ़ाया जा रहा है आज कल ??? लाल बाल पाल की तिकड़ी, भगत सिंह , सुख देव और राजगुरु के इलावा खुदीराम बोस, चंद्र शेखर आज़ाद, बदल गुप्ता ,दिनेश गुप्ता और बिनोय बासु की तिकड़ी किसे याद है ,---- मातंगिनी हाज़रा ,सेनापति बापत, पोट्टी श्रीराममुलु , तारा रानी श्रीवास्तव , कन्हैया लाल मानेक लाल मुंशी ,कमला देवी चट्टोपाताध्याय, तिरुपुर कुमारन, राजकुमारी गुप्ता ,बिरसा मुंडा ,अल्लुरी सीताराम राजू -- हजारों लोगों ने अपनी जान दी थी जो गुमनामी के अँधेरे में खो गए। कैसे खो गए ??? 
जैसे कांग्रेस ने पाठ्यक्रम में भगत सिंह को आतंकवादी बता दिया था , जैसे बंगाल सरकार ने 18 साल की उम्र में फांसी के फंदे को चूमने वाले खुदी राम बोस का नाम पाठ्यक्रम से हटवा दिया उसी तरह जब अंग्रेज़ अपना इतिहास लिखते हैं या बच्चों को पढ़ाते है तो वो बताते हैं की उन्होंने भारत को आज़ादी --ब्रिटिश पार्लियामेंट में  " Indian Independence Act "  5 जुलाई 1947 को पास करके दी थी। 
यह बात ठीक है कि अंग्रेज़ भारत छोड़ने का मन बना चुके थे और उसपर अपने देश के क़ानून के हिसाब से इंग्लैंड के हाऊस ऑफ़ कॉमन्स में एक्ट के रूप में पारित करके किया लेकिन उनका भारत से मोहभंग क्या गाँधी उनके भारत छोड़ो आन्दोलन और कांग्रेस के कारण हुआ था ??? नहीं। 

कितने लोगों ने इतिहास के पन्नों में यह पढ़ा है कि 1946 में भारतीय जल सेना और थल सेना ने अंग्रेज़ों के खिलाफ विद्रोह किया था। आगे जो लिखने जा रहा हूँ उसे बेहतर समझने के लिए नीचे दो लिंक्स  दे रहा हूँ चाहें तो पढ़ सकते हैं अन्यथा इतना तो समझ ही लीजिये कि भारतीय सैनिकों में अंग्रेज़ों के प्रति वफादारी ख़त्म हो चुकी थी। 



पी बी चक्रवर्ती जो कि 1956 में कलकत्ता हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और बंगाल के कार्यकारी राज्यपाल भी थे ने प्रसिद्द इतिहासकार आर सी मजूमदार की पुस्तक A History Of Bengal के प्रकाशक को एक पत्र द्वारा बताया -- (ब्रिटिश पार्लियामेंट में इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट पेश और पास करवाने वाले इंग्लैंड के प्रधानमंत्री ) क्लेमेंट एटली  (1945-1951) 1956 में भारत आये। वे कोलकाता के राजभवन में दो दिन ठहरे थे। उनके इन दो दिनों के प्रवास में मेरी उनसे उन असली तथ्यों पर लम्बी चर्चा हुई जिनके कारण अंग्रेज़ों को भारत छोड़ना पड़ा। चक्रवर्ती आगे लिखते हैं कि मेरा उनसे सीधा सवाल था कि जब गाँधी जी के #भारत_छोड़ो आन्दोलन को बिखरे हुए बहुत समय हो गया और 1947 में ऐसे कोई बाध्य कारण नहीं थे जिनसे अंग्रेज़ों का जल्दबाजी में भारत छोड़ना अपरिहार्य हो जाये, तो उन्होंने भारत क्यों छोड़ा ???? 

अपने जवाब में एटली ने बहुत से कारणों में से नेताजी की सैन्य गतिविधियों के कारण थल सेना और जल सेना में ब्रिटिश राजशाही के प्रति वफादारी बहुत तेजी से ख़त्म होने को मुख्य माना। 

चक्रवर्ती आगे लिखते हैं कि बात यहाँ ख़त्म नहीं होती। अपनी चर्चा के अंत में मैंने एटली से पूछा कि अंग्रेज़ों के  भारत छोड़ने के निर्णय में गाँधी का कितना प्रभाव था। यह सवाल सुनकर एटली के होंठ व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ मुड़े और उन्होंने चबाते हुए एक शब्द कहा m-i-n-i-m-a-l ( अति सूक्षम )
उपरोक्त पोस्ट या निम्न लिंक पढ़ने के बाद आप तय करिये आज़ादी लेने का श्रेय किसे मिलना चाहिए था।      

शनिवार, 29 जुलाई 2017

दरगाहों को पूजेंगे पर धरती को नहीं

#हर_विचार_से_शब्द_बनते_हैं_शब्दों_से_प्रवृति_बनती_है_प्रवृति_से_कृत्य_बनते_हैं। 

पिछले हफ्ते  (27/07/17) टीवी पर मद्रास हाई कोर्ट के वन्देमातरम गाए जाने को अनिवार्य बनाने पर बहस देख रहा था। उसमे सभी मुसलमान वक्ताओं में एक हाजी अली दरगाह के सलाहकार भी थे। इन सलाहकार महोदय समेत सभी मुसलामानों का बस एक ही तर्क था कि हम उस खुदा के इलावा जिसने धरती और आसमान बनाये है किसी और को न तो नमन करेंगे और न ही वन्देमातरम गायेंगे। 
A से अहमदाबाद में बड़ी बड़ी 12 हैं तो B से बैंगलोर में 42 हैं। इसी तरह से अंग्रेजी के अल्फाबेट से शहरों के नाम लिखते जाइये और Z तक से शुरू होने वाले शहरों में मौजूद नामचीन दरगाहों की गिनती कीजिये।  इण्डियन सुन्नी नाम की संस्था ने  एक वेब साइट औलिआ ए हिन्द बनायीं है जिसमें भारत वर्ष के 257 शहरों में मौजूद दरगाहों के विषय में संक्षेप में बताया हुआ है।और यहाँ होने वाले चमत्कारों का भी वर्णन किया है। इनमे उत्तर भारत में  श्रीनगर की दरगाह हज़रतबल भी है तो दक्षिण भारत में तिरुवनंतपुरम की हज़रत कडुवाईल थंगल शरीफ भी है। इनमे पश्चिम भारत में मुंबई की हाजी अली भी है तो पूर्व में गौहाटी की हज़रत ज़ाहिर औलिया ख्वाजागन दरगाह भी है।औसतन अगर हर शहर में छोटी बड़ी पांच दरगाहें ले ली जाएँ तो भारत में 2500 से ज्यादा दरगाहें मौजूद हैं। 
http://aulia-e-hind.com/Cities.htm
दरगाहें दुनिया भर में मिलती हैं बस फर्क सिर्फ पुकारे जाने वाले नाम का होता है जैसे अफ्रीका में इन्हे करामात के नाम से जानते हैं और चीन में इन्हे गोंगबै के नाम से जाना जाता है।
इन दरगाहों की मैनेजमेंट कमेटी में ज़ाहिर सी बात है मूसालमान ही होते हैं। अब दरगाहें हैं तो सिर्फ हिन्दू (चूतिये) तो वहां जाते नहीं हैं। मान लेते हैं 50% दर्शनार्थी वहां माथा टेकने वाले मुसलमान होते हैं। जैसे मुंबई की हाजी अली दरगाह के आँकड़े बताते हैं कि यहाँ रोज़ लगभग दस हज़ार लोग आते हैं और अजमेर शरीफ में डेढ़ लाख लोग रोज़ आते हैं। हर दरगाह के अलग अलग आंकड़े हैं। इन दस हज़ार या डेढ़ लाख में से हिन्दू तो साधारण सी बात है सर झुका कर वंदना ही करते होंगे। लेकिन मुसलमान सर झुका कर मत्था रगड़ कर क्या करते हैं ???
ऐसा मैंने पढ़ा है कि मुसलमान लोग वहां ज़ियारत यानि की पूजा करने जाते हैं। अबे तुम्हारे नुमाइंदे और तो और हाजी अली दरगाह के सलाहकार तो कह रहे थे कि वो अल्लाह तआला के इलावा किसी और को पूजेंगे नहीं तो फिर ये दरगाहों पर मुसलमान क्या करते हैं ???
इस्लाम में मूर्ती पूजा शिर्क है तो कब्रों की पूजा क्या है ??? मंदिरों में फूल माला और प्रसाद चढ़ाया जाता है तो दरगाहों पर भी तो फूल माला और चादर चढ़ाई जाती है। मंदिरों में भजन कीर्तन होते हैं तो इस्लाम में जब संगीत हराम है फिर हर रोज़ वहां कव्वालियों की नुमाइश कैसे हलाल हो गयी ??? मनीरों में परिक्रमा की जाती है तो दरगाहों में तो परिक्रमा की जाती है। क्या ये सब कृत्य पूजा की श्रेणी में नहीं आते ???
बहुत से मुसलमान अभी कहेंगे कि हम दरगाहों को नहीं मानते। अच्छी बात है मत मानो पर जितने मुसलमान दरगाहों पर जाते हैं क्या वो सभी सूफी सम्प्रदाय के मानने वाले होते हैं ??? नहीं, क्योंकि जिन 2500 दरगाहों का ज़िक्र ऊपर किया है वो सब अलग अलग शाखाओं के मुसलामानों की हैं।  उनमे सूफी भी हैं शिया भी हैं सुन्नी भी हैं बरेलवी भी हैं। तो क्या इनको पूजने वाले तुमसे कमतर मुसलमान हैं ??? आसिफ अली ज़रदारी , शाहरुख़ खान , कैटरीना कैफ ,ज़हीर खान इमरान हाशमी ये सब अजमेर शरीफ में फूलों और चादर का टोकरा अपने सर पर उठा कर ले कर गए थे , क्या किया था उसका ??? हिंदी भाषा में कहें तो सब पूजा करके आये थे। तब कहाँ गया था एक और एक अल्लाह तआला जिसने पूरी कायनात को बनाया ??? फिर जब वो अल्लाह के साथ दरगाहों को पूज सकते हैं हाजी अली दरगाह के सलाहकार महोदय वंदेमातरम गाने में आपके पेट में मरोड़ क्यों उठाने लगी ???? महोदय , जब #पिया_हाजी_अली_गाया_और_फिलमाया_जा_रहा_था तब भारत भर के मुसलमान कहाँ थे कि एक अल्लाह की शान के इलावा दूसरे की शान में आप संगीत गा बजा कर गैर इस्लामिक काम कर रहे हैं। 
छोड़ो दरगाह की बातों को। 
अगर तुम्हारा सर्वशक्तिमान निराकार  अल्लाह सर्वव्यापी है तो फिर अरब जा हज का ढोंग क्यों ?? #संगे_अस्वद को चूमने चाटने छूने और उसकी परिक्रमा करने मक्का तक जाने की ज़ेहमत क्यों ?? 

दर असल भारत के मुसलामानों को चाहिए तुर्की के अता तुर्क जैसा शासक जिसने 1925 में सभी #मदरसों_और_दरगाहों को जमींदोज़ कर दिया था। या इनको चाहिए चीन जैसी लठमार सरकार जिसने 1958 से 1966 के बीच सभी दरगाहों और मस्जिदों के नमो निशान मिटा दिए थे। छोड़ो तुर्की और चीन की बात जब सऊदी अरब सरकार ने मक्का और मदीना में मोहम्मद और उनके परिवार से जुडी सभी मस्जिदें और कब्रगाहें मिट्टी में मिला दी उनका नामो निशाँ तक नहीं छोड़ा 
कर्बला को उन्होंने 1802 में ही नेस्तनाबूद कर दिया था।
https://en.wikipedia.org/wiki/Wahhabi_sack_of_Karbala  तो क्या है तुममें दम कि  भारत की ज़मीन पर गैरकानूनी रूप से  गारे मिट्टी की एक मस्जिद भी तुड़वा दो ??? नहीं , क्योंकि भारत और पकिस्तान में तो कोई मस्जिद में पाद देता है तो इस्लाम खतरे में पड़ जाता है फिर मुसलामानों में हिम्मत कहाँ कि मुंह से उस धरती माँ की प्रशंसा के दो लफ्ज़ बोल दें जिसकी छाती पर पैदा हुए अनाज को खा कर जिसकी मिट्टी में खेल कर पालते बढ़ते हो।   

#हर_विचार_से_शब्द_बनते_हैं_शब्दों_से_प्रवृति_बनती_है_प्रवृति_से_कृत्य_बनते_हैं।-----समझ में आया इस ऋषि वाक्य का मतलब ????? चूँकि तुम्हारे विचारों में तमाम जीव जंतुओं को पलने वाली प्रकृति वन्दनीय नहीं है इसलिए पूरी दुनिया में इसे उजाड़ते घूम रहे हो। चूँकि तुम्हारे विचारों में स्त्री वंदनीय नहीं है इस लिए दुनिया भर में बलात्कार करते घुमते हो।   चूँकि तुम्हारे विचार में ही धरती माँ वन्दनीय नहीं है इसीलिए भारत समेत पूरी दुनिया में बम फोड़ते घूम रहे हो। 
चूँकि तुम भ्रमित हो इसलिए उन दरगाहों और मज़ारों को तो पूजते हो जो अल्लाह टाला से इतर हैं मगर उस धरती को पूजने से इंकार करते हो जिसने इन्हे सदियों से अपनी छाती पर सुला रखा है। 
बहुत छोटी मानसिकता का है तुम्हारा खुदा जो अपने इलावा किसी की प्रशंसा सुनने का कलेजा नहीं रखता।
इस्लाम के अनुयायियों , बात सिर्फ भावनाओं की है। कैसा लगेगा आपकी माँ या बहन को अगर आपका भाई बीवी की तरह इस्तेमाल करने लगे। करते ही है , क्योंकि बात सिर्फ विचारों और भावनाओं की है।

शनिवार, 22 जुलाई 2017

भाड़ में गयी हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएँ और वैज्ञानिक शोध।


गज़ब बेवकूफों का देश है भारत। लिंचिंग के ऊपर संसद में बहस कर रहे हैं लेकिन यह कहने का दम किसी में नहीं है कि अगर बहुसंख्यकों की धार्मिक  भावनाओं को आहत करोगे तो नतीजा कुछ ऐसा ही निकलेगा। 
भाड़ में गयीं बहुसंख्यकों की धार्मिक भावनाएं। किसी के पीट पीट कर मारे जाने पर ही इंसानियत शर्मसार होती है क्या ???? फेसबुक और संसद में लिंचिंग की अलग अलग गिनती सामने आ रही है। कोई दस कह रहा है , कोई तेईस कह रहा है।  इन 23 मौतों से संसद हिली जा रही है, क्यों  ???? आप भारत के अलग अलग हिस्सों में रहते होंगे। अखबार भी पढ़ते होंगे। आपके क्षेत्र के अखबार में रोज़ दो या तीन घटनाएं बलात्कार के बाद हत्या की छपती हैं। यदि सिर्फ बलात्कार की बात करें तो यही दो-तीन आपके क्षेत्र की मिल कर भारत में 2015 में 34600 हो गयीं थीं।  लेकिन संसद विधानसभा का हिलना तो छोड़िये हम भी पढ़ कर अगली खबर पढ़ने लगते हैं , क्यों ???? संसद  छह महीनों में 23 हत्याओं से इसलिए हिलती है क्योंकि मरने वाला मुसलमान होता है। और बलात्कार फिर उसके बाद हत्या झेलने वाली बच्ची , लड़की , महिला या वृद्धा इनकी न तो अस्मिता  की कोई इज़्ज़त है और न जान की कोई कीमत , तो फिर संसद  में कोई क्यों मुद्दा उठाने लगा इन दसियों नहीं सैकड़ों नहीं हज़ारों बलात्कारों का , और उन मासूमों का जिनकी हत्या हो गयी। 
2006 का निठारी काण्ड याद है , 15 नरमुंड मिले पुंडीर और कोली के पास। अगर 20 वर्षीय पिंकी सरकार को इन लोगों ने न मारा होता तो इनका वीभत्स खेल यूँ ही चलता रहता। क्यों ????? पहले 14 बच्चे जब इनके शिकार हुए तो कानून व्यवस्था क्या कर रही थी ???दिल्ली की ज्योति पर रोने वाले लोग थे , रोहतक में बलात्कार फिर हत्या के ऊपर रोने वाले थे, शिमला में बलात्कार फिर हत्या उस बच्ची के लिए रोने वाले हैं। लेकिन जैसे निठारी के 14  बच्चों और अनगिनत बलात्कार और हत्यायें जो लोगों के संज्ञान में नहीं आतीं उनके ऊपर कोई रोने वाला नहीं है कोई अवार्ड वापसी वाला नहीं है उसी तरह से #हलाल करके मारी गयी गायों के ऊपर भी कुछ ही रोने वाले हैं। 

भारतीय सुप्रीम कोर्ट में इतना दम तो है नहीं कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 48 का या अपने ही 2006 के आदेश का पालन करवा ले हाँ, होली, दिवाली दही हांड़ी कैसे मनाई जाये या गौरक्षकों को न बचाया जाये इसके लिए आदेश पारित करने में एक दिन का समय नहीं लगाती वहीँ मुसलमानो की धार्मिक भावनाएं आहत न हों उसके लिए तीन तलाक जैसे मुद्दों को धार्मिक रंग चढ़ा कर फैंसला सुरक्षित कर देती है। 
खैर भाड़ में गयीं हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं। गाय काटो और खाओ संसद में तुम्हारे इस हक़ लिए चिल्लाने वाले बहुत मौजूद हैं।  अजी गाय की बात छोड़ो मुसलामानों को खुश करने के लिए तो संसद में तथाकथित हिन्दू नेताओं को व्हिस्की में विष्णु और रम में राम नज़र आ सकते हैं लेकिन रमज़ान में रम और पैगम्बर में पैग नज़र नहीं आ सकता। 
भाड़ में गयीं हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं। लेकिन इन्ही धार्मिक भावनाओं को यदि वैज्ञानिक जामा  पहना दिया जाता तो आज तक जो 881 नोबल प्राइज बंटे हैं उनमे से एक उस ऋषि को मिलता जिसने गाय को पूजनीय बनाया। वैसे क्या आपको मालूम है कि अब तक 881 में सेपूरी दुनिया में सिर्फ 12 नोबल पुरूस्कार मुसलमानों को मिले हैं उसमे से भी 3 को ही विज्ञान के लिए मिले है। गाय, विज्ञान के लिए नोबल पुरूस्कार और मुसलमानो को मैंने क्यों जोड़ा ???? इसलिए क्योंकि विज्ञान के इनके शोधार्थी आज भी सूरज को ही पृथवी का चक्कर काटते हुए बताते है और  औरत को इन्सान न मान कर सिर्फ स्तनधारी प्राणी की श्रेणी में ही रखते है और गाय काटने का काम भी यही करते हैं तो फिर इनसे गाय की वैज्ञानिक उपयोगिता की बात करना निरी मूर्खता है क्योंकि इनकी कुरआन में तो खून, रेंगने वाले जानवर , बिना खुर वाले जानवर और सूअर के इलावा सब कुछ खाना जायज़ बताया गया है। 
गाय के उत्पादों के विदेशी वैज्ञानिकों द्वारा बताये गए औषधीय गुणों  के ऊपर एक लेख 4 जून के पहले ही लिख चूका हूँ जिसमे गठिया मधुमेह मोटापा  और कैंसर जैसी बिमारियों के इलाज की दवाइयाँ गाय के दूध और गौमूत्र से बनायीं जा रही हैं , जिसका लिंक नीचे दे रहा हूँ। 


लेकिन हाल ही में #स्क्रिप्स_इंस्टिट्यूट_और_ए_एंड_एम_विश्वविद्यालय_टेक्सास में किये गए एक शोध के अनुसार गाय से एच आई वी (एड्स) की दवाई बनायीं जा सकती है। (पूरी जानकारी के लिए निम्न लिंक क्लिक करें )


दो दिनों से एक पोस्ट चल रही है जिसमे बीफ 1 , बीफ 2 और बीफ 3 तरह की किस्में बता कर यह साबित किया गया है कि बीफ -3 गाय का मांस होता है और भारत में इसका उत्पादन और उपभोग नगण्य है। चलिए मान ली आपकी बात , पर इतना ध्यान रखियेगा कि बीफ 3 को वील भी कहते हैं। नीचे लिंक दे रहा हूँ जिसमें अमरीका के कृषि विभाग ने भारत के पशुओं के सन्दर्भ में डाटा दिया है , आँखें खोल कर देख लेना क्या सिर्फ भैंस काटे जा रही है भारत में ???? क्या सिर्फ भैंस के मांस के निर्यात के बल पर भारत विश्व में बीफ का सबसे बड़ा निर्यातक देश है ???? नहीं। बीफ के साथ साथ उसमे वील ( Veal) भी लिखा है। और एक सांख्यिकी यह भी दी है कि 2007 के मुकाबले 2012 में 19वीं पशु गणना के अनुसार भारत में पशुओं की संख्या सिर्फ 4.1% गिरी है। 


अभी ये बातें न अवैज्ञानिक मुसलामानों को नज़र आयेंगी ( क्योंकि वो तो शारीरिक व्यायाम योग को भी अपने मज़हब के खिलाफ मानते है ) न मुसलामानों के वोटों के भूखे सांसदों को नज़र आएँगी न फट्टू सुप्रीम कोर्ट को नज़र आएँगी। जब गाय की उपयोगिता नज़र और समझ आएगी तब तक गायों की हालत सफ़ेद गैंडे , बाघ , काले हिरण गिर के शेर जैसे लुप्तप्राय जानवरों जैसी हो जाएगी। 


भाड़ में गयी हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएँ और वैज्ञानिक शोध।  मुसलामानों को तो गाय का ही मीट खाना है उसके लिए चाहे जान देनी ही क्यों न पड़ जाये बाकि तो सुप्रीम कोर्ट और तमाम अवार्ड वापसी गैंग के सदस्य  है ही इनकी तरफदारी करने के लिए। 
बलात्कार और फिर हत्या , लगता है सबने सऊदी अरब के वैज्ञानिक के शोध को सहमति दे दी है कि  औरत सिर्फ  एक स्तनधारी प्राणी है साल में अगर 35-36000 बलात्कार और क़त्ल हो गए तो क्या फ़र्क़ पड़ता है। फ़र्क़ तो सिर्फ मुसलामानों की मौत से पड़ता है। 

शनिवार, 1 जुलाई 2017

जोशुआ प्रोजेक्ट्स

कृपया जातिवाद, क्षेत्रवाद  से ऊपर उठ कर धर्म पर मंडराते हुए इस सुनियोजित खतरे पर मनन करे। जाल आपके ऊपर फेंका जा चुका है , अलग अलग दिशा में उड़ने की ज़िद में सब जाल में फंसे रह जाओगे।

हम मूलनिवासी और विदेशियों पर बहस करते हैं। हम जातियों और भाषाओँ पर बहस करते हैं। हम आपस में अपनी मान्यताओं की खिल्ली उड़ाते हैं एक दुसरे को जातिसूचक शब्दों से सम्बोधित करते हैं। हम आरक्षण के समर्थन में लड़ते है और आरक्षण के विरोध में लड़ते हैं।  हम जातियों के आधार पर राजनितिक पार्टियों में बंटे हुए हैं। पर हम कौन हैं हम कितने हैं यह हमें तो क्या शायद सूक्ष्म रूप से भारत सरकार को भी नहीं पता होगा। 

लेकिन विश्व में एक संस्था है जिसे आपके किसी भावनात्मक मुद्दे से कोई मतलब नहीं है फिर भी उसे भारत में रहने वाले हर वर्ग और जाति ---बनिआ, भील, ब्राह्मण ,चमार , धोबी,गोंड ,जाट (हिन्दू), जाट (सिख),कापु, कोली, कुम्हार, कुंबी, मराठा, नाइ, राजपूत, तेली, वन्नियां, यादव, जाटव  . . . . . . . . . . . . . . . की गिनती हजार तक (राउंड ऑफ करने के बाद ) मालूम है। फिर एक जाति कितने वर्गों में बंटी हुई है इस संस्था ने त्रुटिहीन  तरीके से उनका भी विवरण संकलित किया हुआ है। जैसे कि ब्राह्मणों में ---चितपावन , औदिच्च , देशस्था , वारेन्द्र , गौड़ , सारस्वत , कनौजिया ,जोशी, कश्मीरी पण्डित , जोशी , वगैरह वगैरह। आप लोग अपने आप को सवर्ण और दलितों में बांटते होंगे मगर उस संस्था के लिए आप सिर्फ हिन्दू हैं और आपको आपकी मान्यताओं के हिसाब से उसने आपका सूक्ष्तम विवरण एकत्रित किया हुआ है।  
इस संस्था का नाम है #जोशुआ_प्रोजेक्ट्स। अमरीका में स्थापित इस संस्था का सिर्फ एक उद्देश्य है पूरे विश्व को ईसाई बनाना।  इसको धन से वैसे तो विश्व भर के ईसाई पोषित करते हैं लेकिन अमरीकी सरकार भी इसे पोषित करती है। 

इनकी कार्यशैली पर बहुत लम्बी पोस्ट न लिखते हुए बस इतना ही बताना चाहता  हूँ कि इसने भारत को 2507 ग्रुप्स  में बाँट रखा है जिसमे इनके अनुसार अभी तक यह संस्था  अभी 2250 ग्रुप्स तक नहीं पहुँच पायी है जो कि इसका लक्ष्य है।
निम्न लिंक का अवलोकन कर सकते हैं। इसी लिंक से आगे बढ़ते बढ़ते आप इनकी वृहद् कार्यशैली के पैमाने को नाप सकते हैं।  

ऊपर मैंने लिखा है कि ये आपको सिर्फ हिन्दू समझते हैं और जैसे विश्व भर में ये सफल हैं वैसे भारत में सफल नहीं हो प् रहे । भारत में सफल क्यों नहीं हो पा रहे उसका कारण इन्होने निम्न लिंक में दिया है , जिसके आखिरी दो बिंदुओं को अंग्रेजी में कॉपी पेस्ट करने के साथ उसका  हिंदी तर्जुमा मैं यहाँ लिख रहा हूँ।


Prayer Points
* Brahmins are a key community in India who uphold Hinduism. Please pray that the light of the gospel breaks through the veil that blinds this community.
* Pray that the true God will reveal Himself to this community and use Brahmins to preach and teach about Jesus Christ.

1) भारत में ब्राह्मण एक बुनियादी / महत्वपूर्ण समुदाय हैं जिन्होंने हिन्दू धर्म को थाम रखा है। कृपया प्रार्थना कीजिये कि सत्य की रोशनी ( Gospal) इनके उस परदे को काट दे जिससे ये अंधे हैं। 
2) प्रार्थना कीजिये कि असली भगवान् इस समुदाय के समक्ष खुद को प्रस्तुत करे और जीसस क्राइस्ट के विषय में प्रचार करने और पढ़ाने के लिए ब्राह्मणों का उपयोग करे। 

#क्या_अभी_भी_समझ_नहीं_आया_कि_आपको_ईसाई_बनाने_के_लिए_कैसे_एक_एक_वर्ग_को_तोड़कर_कमज़ोर_किया_जा_रहा_है_????? #क्या_अभी_भी_समझ_नहीं_आया_क्यों_इतिहास_के_हर_अनदेखे_पन्ने_से_लेकर_आजतक_हर_घटना_के_लिए_ब्राह्मणों_को_कटघरे_में_खड़ा_किया_जाता_है ???
#क्या_अब_भी_समझ_नहीं_आया_कि_सहारनपुर_की_घटना_से_बंदूकों_का_मुंह_ठाकुरों_की_तरफ_क्यों_मोड़_दिया_गया_है ????
#क्या_अब_भी_समझ_नहीं_आया_कि_हर_मुद्दे_को_सवर्ण_और_दलित_रंग_क्यों_दिया_जाता_है ?????