रविवार, 15 मार्च 2015

धर्मनिरपेक्षता का भूत



भारतवर्ष के तमाम "SICK U LAR" नागरिकों, नेताओं और मीडिया को मेरा सादर प्रणाम !!!!!!!!!!!!!" बादशाह राम" और "बेगम सीता" ये धर्मनिरपेक्ष विचार गांधी के थे, और उनके अंधभक्तों ने उनके इन विचारों का पुरज़ोर समर्थन किया। 

गांधी के जितने भी प्रयोग थे वे हिन्दुओं और हिन्दू धर्म पर ही होते थे, वे कभी जिन्नाह को श्री जिन्नाह नहीं कह पाये और मौलाना आज़ाद को कभी पंडित आज़ाद नहीं कह पाये । ( Page 71, why I assasinated Mahatama, Nathuram godse) । जैनमुनि श्री ललितप्रभ के अनुसार " हर विचार से शब्द बनते हैं ,हरशब्द से प्रवृति बनती है और प्रवृति से संस्कार बनते हैं"। यही विचार औरशब्द फिर इनसे पैदा हुए संस्कार,सभ्यताओं को कहाँ से कहाँ पंहुचा देते हैं उसकी कुछ बानगियाँ देख लीजिये,और दुनिया में हो रही घटनाओं से उनको जोड़ कर देखिएगा। कुरान सूरा 2 आयात 223 --- तुम्हारी बीवियाँ तुम्हारे (लिए बतौर )खेत (के ) हैं। सो अपने खेत में जिस तरफ से होकर चाहो जाओ। और आइन्दा के लिए ( भी) अपने लिए कुछ करते रहो, और अल्लाह तआला से डरते रहो और यह यकीं रखो की बेशक तुम अल्लाह तआला के सामने पेश होने वाले हो, और ( ऐ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व् सल्लम) ऐसे ईमानदारों को ख़ुशी की खबर सुना दीजिये।
सूरा 14:आयत 33 ---- और तुम्हारे नफे के वास्ते सूरज और चाँद को ( अपनी कुदरत का ) ताबे बनाया जो हमेशा चलने में ही रहते हैं, और तुम्हरे नफे के वास्ते रात और दिन (अपनी कुदरत का) ताबे बनाया।
सूरा 9 :आयत 29---- अहले किताब जो कि न,खुदा पर(पूरा-पूरा ) ईमान रखते हैं और न क़ियामत के दिन पर,और न उन चीज़ों को हराम समझते है जिनको खुद तआला ने और उसके रसूल ने हराम बतलाया है ,और न सच्चे दीन (इस्लाम) को कबूल करते हैं, उनसे यहाँ तक लड़ो की वे मातहत होकर और रैय्यत बनकर जिजया "यानि इस्लामी हुकूमत में रहने का टैक्स" देना मंजूर कर दें।
सूरा 61:आयत 6 ---और ( इसी तरह वह वक़्त भी ज़िक्र करने के काबिल है ) जबकि ईसा इब्ने मरियम ने फ़रमाया कि ऐ बनी इस्राइल ! मैं तुम्हारे पास अल्लाह का भेजा हुआ आया हूँ कि मुझसे पहले जो "तौरात" (आ चुकी) है में उसकी तस्दीक करने आया हूँ ,और मेरे बाद जो एक रसूल आने वाले हैं जिनका (मुबारक) नाम "अहमद" होगा,मैं उनकी खुशखबरी देने वाला हूँ। फिर वह जब उन लोगों के पास खुली दलीलें लाये तो वे लोग ( उन दलीलों यानि मोज़िज़ों के बारे में) कहने लगे, यह खुला जादू है।


मेरा सवाल उन बिना रीढ़ की हड्डी वाले वृहद मानसिकता वाले धर्मनिरपेक्ष हिन्दुओं से है, जिन्हे सारे दोष हिन्दू धर्म और हिन्दू धर्म ग्रंथो में नज़र आते हैं , क्या उन्होंने कभी किसी मुस्लिम महिला संगठन को इस बात के खिलाफ आवाज़ उठाए हुए सुना या देखा की उनकी तुलना खेत से की जा रही है ??? या जहाँ चाहो वहाँ से घुसो पर किसी महिला को आपत्ति उठाते हुए सुना???? क्या इन बदज़ात धर्मनिरपेक्षों ने किसी मुस्लिम वैज्ञानिक को यह कहते हुए सुना की क़ुरान में गलत लिखा है ,सूरज चल रहा है और यह गलत लिखा है ???? क्या उन्होंने किसी कानून के ज्ञाता को यह कहते हुए सुना कि वर्तमान समाज में यह ज़बरदस्ती मार काट,धर्म परिवर्तन और जजिया गलत है, तथा इन आयतों का धर्मनिरपेक्ष संविधान के तहत चलने वाले देश में होना खतरनाक है ???? क्या उन्होंने किसी मुस्लिम अग्निवेश को यह सवाल उठाते हुए सुना कि ईसा के बाद तो "अहमद" ने पैगम्बर होना था यह "मोहम्मद साहिब" पैगम्बर कैसे हो गए ????
न मुझे दिक्कत इन आयतों से है और न ही उन मुसलमानों से जो आँख बंद करके इन्हे मानते हैं। उनकी धार्मिक किताब में लिखा है तो उन्हें मानना भी चाहिए और अगर कहीं दिल में इन बातों से नाइत्तेफकी रखते भी हैं तो तुम भोंडी मानसिकता वाले हिन्दुओं की तरह गले में ढोल डाल कर अपने ही मज़हब का जनाजा नहीं निकालते। वे कभी क़ुरान के विशेषज्ञों से ये नहीं पूछते की इजराइल क्षेत्रफल ( ( 20770 sq km ) में दिल्लीं एनसीआर ( 45887 sq km ) का आधा है उसका तो ज़िक्र,क़ुरान की आसमान से बैठ कर डिक्टेशन देने वाले ने क़ुरान में 49 बार किया है, तो क्यों डिक्टेशन देने वाले को भारत, ग्रीस, रोम,चीन उस समय के बड़े बड़े धार्मिक देश नज़र नहीं आये ????
बस कहीं से मनु स्मिृति के बारे में सुन लिया की उसमे वर्णव्यवस्था बताई गयी है, मनुस्मृति पढ़ी कभी नहीं और लगे मनु को गालियाँ देने। कहीं से सुन लिया की "रामचरित मानस " में लिखा हुआ है --"ढोल गवांर शूद्र पशु नारि. यह सब ताड़न के अधिकारी"---- न इसका सन्दर्भ जानेंगे , न यह जानेंगे कि तुलसीदास जी ने यह पंक्तिया किसकी Quote की हैं, बस पेल देंगे अपना अधकचरा ज्ञान। प्राणायाम और सूर्य नमस्कार कभी किया नहीं , बस चूँकि उसे हिन्दू ऋषियों ने बनाया है इसलिए स्कूलों में नहीं करना चाहिए इससे दूसरे धर्म आहत होते हैं। विदेशी भाषाओँ के मोह में मरे जा रहे हैं, जबकि नासा कह चुका है की संस्कृत सबसे ज्यादा वैज्ञानिक भाषा है, संस्कृत पढने से किसका धर्म खतरे में आ रहा है जो जर्मन भाषा पढने से नहीं आ रहा ??? क्या मुसलमान द्रविड़ों की देव भाषा तमिल नहीं बोलते सीखते या पढ़ते? या जिस देश में वे रहते हैं वहां की भाषा नहीं सीखते ??? आरएसएस के बारे लफ्ज़ एक नहीं जानते और लग जाते हैं संघी शब्द का गाली की तरह उपयोग करने, लेकिन उस मुस्लिम लीग बारे में इनके मुंह से एक लज़्फ़ नहीं फूटता (जिसके जवाब में हिन्दू हितों की रक्षा के लिए आरएसएस बनी थी) जो मुस्लिम हितों के लिए पाकिस्तान बनाने के लिए बनी थी और आज भी भारत में चुनाव लड़ती है। बस उसका सम्बन्ध हिन्दुओं से नहीं होना चाहिए।
मक्का में वो मस्जिद तोड़ दी गयी ,जिसमे मोहम्मद साहिब ने पहली नमाज़ अदा की थी , '''मस्जिद अबू बकर' ''-'मस्जिद सलमान अल फ़ारसी'''-मस्जिद उमर इब्न अल खत्ताब'''-मस्जिद सईदा फातिमा बिन्त रसूलुल्लाह'''-और मस्जिद अली इब्न अबू तालिब'''' इन सभी को तोड़ कर गिरा दिया गया है.l लेकिन जब रामजन्म भूमि ,काशी और मथुरा की बात चलती है तो पहले पशुवृत हिन्दू ही हिन्दुओं का यह कह कर विरोध करते हैं, की इन मुद्दों को उठा कर हिन्दू साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं ??? क्या कभी मुसलामानों से पुछा की जब पैगम्बर साहिब से जुडी हुई मस्जिदें तोड़ दी गयीं हैं तो इनका औरंगज़ेब द्वारा तोड़े गए मंदिरों से इतना मोह क्यों???
सितम्बर-13 के मुज़्ज़फरनगर दंगो की बात तो छेड़ देते हो उसका कारण और अगस्त -13 किश्तवाड़ के जबरदस्ती के दंगे क्यों भूल जाते हो ???
जैसा कि सबसे ऊपर लिखा है , गाँधी की भी दगती थी और तुम्हारी भी दगती है। तुम्हारी धर्मनिरपेक्षता का प्रेरणास्त्रोत गांधी मंदिरों में तो कुरान का पाठ करवा लेता था, लेकिन एक उदाहरण दे दो जब उसने किसी मस्जिद में रामधुन या गीता का पाठ करवा कर मुसलामानों की धर्मनिरपेक्षता साबित की हो। गांधी के भी सारे प्रयोग और नसीहतें हिन्दुओं के लिए होती थीं और तुम्हारी भी हैं। इसलिए नहीं की हिन्दू निरे बेवकूफ और मुसलमान पूरे अक्लमंद हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि हिन्दू सुन लेता है, और मुसलमान जैसे गांधी और नेहरू की नहीं सुनता था तो तुम्हारी तो खाक सुनेगा। और समृद्ध हिन्दू संस्कृति को जितना मुग़ल आक्रान्ताओं ने मिटटी मिलाया उससे ज्यादा गांधी, नेहरू और इनके चापलूसों ज़िम्मेदार हैं, हिन्दुओं और हिन्दू धर्म रीढ़ ही हड्डी तोड़ कर पुनर्जीवित न करने के लिए। और जो सम्पदा को बचाना चाहते है उसे साम्प्रदायिक और संघी घोषित कर दिया जाता है।
जो इतिहास भारत का है पूरा अक्षरश वही इतिहास इजराइल का भी है, भारत 1000 वर्ष तक गुलाम रहा , तो इजराइल भी रहा। यहाँ हिन्दू मारे गए गुलाम बनाये गए वहां यहूदी मारे गए और गुलाम बनाये गए। 1947 में भारत आजाद हुआ 1948 में इजराइल आज़ाद हुआ। इजराइल का कुल क्षेत्रफल 20770 sqkm है जो की दिल्ली और एनसीआर के 45887 sqkm के आधे से भी कम है। 21 मुस्लिम देशों से घिरा होने के बावजूद, जब बात अपने धर्म और स्वाभिमान की आती है तो पूरी दुनिया को जूते की नोक पर रखता है। भारत और इजराइल के नेताओं की सोच में बस इतना सा फर्क है की उसे अपने धर्म और संस्कृति पर गर्व है ,और सिर्फ यहूदी ही नहीं ,हिन्दू कमीनस्तों ( कम्युनिस्ट्स) को छोड़ कर हर धर्मपरायण व्यक्ति अपने धर्मऔर संस्कृति पर गर्व करता है। क्योंकि उनमे वो स्वाभिमान है जो हिन्दुओं में मार दिया गया है। तुम लोगों की धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा अब तुम्हारी वृहद मानसिकता का परिचायक नहीं बल्कि अल्पसंख्यंकों के तुष्टिकरण के कटघरे में खड़ी है, क्योंकि तुम वो जाहिल हो जो इतिहास से सबक न लेकर उसे कहीं अधिक कीमत चुका कर दोहराने में यकीं रखते हो। जिस वृहद मानसिकता का परिचय कश्मीरी हिन्दुओं और यज़ीदियों ने दिया और उसकी कीमत चुका रहे है उसी लीक पर न सिर्फ तुम लोग चल रहे हो बल्कि पूरे समाज को वध के रस्ते पर धकेल रहे हो।
बहुत सुलग रही होगी मेरा यह लेख पढ़कर ,और उंगलियां कांप रहे होंगी मुझे गलियां लिखने के लिए , लेकिन उससे पहले कि कुछ लिखो मेरी एक नसीहत मान लेना , जिस भी विषय पर तर्क देना कायदे से अध्ययन कर लेना, अगर पढ़ लिख लोगे तो मेरी बात से असहमत नहीं होगे, और यह भी सिद्ध कर लोगे की हिन्दू धर्म श्रेष्ट है , बिना ज्ञान के तो कभी यह भी यह भी सिद्ध नहीं कर पाओगे की जिस आदमी को तुम अपनी माँ के कहने पर अपना बाप कहते हो, जिस बच्चे को अपनी पत्नी के कहने पर अपनी औलाद समझते हो ,वो वाकई तुम्हारे बाप और औलाद हैं। मुझे यह भी मालुम है की कि कुत्तों की दुम फेसबुक के एक लेख से सीधी होने से रही, आएंगे कमेंट बॉक्स में भौकने के लिए ,ज़रूर आईये,कम से कम अपना परिचय तो दीजिये, हम भी जाने कि की हमारे धर्म में फेसबुक चलने वाले कितने कुत्ते मौजूद है। मेरे जवाब की उम्मीद मत करना ,क्योंकि अब मुझे ……… को जवाब देने में कोई रूचि नहीं रह गयी है।
उपरोक्त लेख पढ़ कर मेरे बारे में नपुंसक धर्मनिरपेक्ष कोई भी धारणा बनाने से पहले यह भी पढ़ लें कि ---मैं सनातन धर्म की मान्यताओं "वसुधैव कुटुम्बकम" में पूरा विश्वास रखता हूँ , मैं "सर्वे भवन्तु सुखिना:" में पूरा यकीं रखता हूँ , पर "अहिंसा परमोधर्म" को वहीँ तक मानता हूँ जहाँ से "धर्मं हिंसा तथैव च" शुरू नहीं होता।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेय:परधर्मो भयावह : ।। ( गीता ,अध्याय -3 ,श्लोक 35)
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मेरा अपने धर्मनिष्ट भाइयों से यही निवेदन है की आप घर बार त्याग कर दुनिया नहीं बदल सकते, शुरुआत अपने घर की दुनिया से करिये। अपने बच्चों को हिन्दुधर्म प्रद्दत मानवता का पाठ पढ़ाते हुए यह ज़रूर समझाइये की अन्याय करना अधर्म है और अन्याय के विरुद्ध न लड़ना उससे भी बड़ा अधर्म है।
वन्दे मातरम !!!!!!!!!
1. 3 . 2015 
विवेक मिश्र 






महात्मा गाँधी की वासनायें

आज कश्मीर भी चर्चा में है और गांधी भी, वैसे यह हम भारतियों की अल्प स्मरणशक्ति है जो बहुत से तथ्यों को बहुत जल्दी विस्मृत कर देती है। नेहरू ने कश्मीर समस्या को पैदा किया यह तो सब जानते हैं लेकिन उसमे गांधी का क्या योगदान रहा यह बहुत कम लोग जानते हैं। मेरी 30 जनवरी की पोस्ट जिन मित्रों ने पढ़ी होगी उसमे मैंने 26 में से तीन कारण बताये थे जिनकी वजह से नाथूराम गोडसे जी ने गांधी जी की हत्या की थी। उस पोस्ट में या आज के सन्दर्भ में चौथा कारण भी उतना ही महत्वपूर्ण है ,जितने की वे तीन थे। चौथा कारण नाथूराम गोडसे जी के शब्दों में ---
-"कश्मीर के सन्दर्भ में गांधी जी ने बार बार यह घोषणा की, कि राज्य की ज़िम्मेदारी शेख अब्दुल्लाह को सौंप देनी जानी चाहिए और महाराजा कश्मीर को सेवानिवृत हो कर बनारस चले जाना चाहिए, उन्होंने (गांधी ने) इसके इलावा कोई और कारण नहीं बताया कि कश्मीर मुस्लिम बाहुल्य राज्य है। उनकी यह घोषणा इस बात का बिलकुल विरोधाभास करती है कि उन्होंने निज़ाम हैदराबाद को ऐसा कोई सुझाव नहीं दिया जो की भारत के गणराज्य में शामिल नहीं होना चाहता था और हैदराबाद एक हिन्दू बाहुल्य राज्य है। उन्होंने निज़ाम को एक बार भी सेवानिवृत हो कर मक्का जाने का सुझाव नहीं दिया। " Excerpts from Page 79, "Why I Assasinated Gandhi --- Nathuram Godse .
ये तो थे नाथूराम जी के शब्द, जो कांग्रेसी सरकारें दशकों तक छुपाये रहीं, लेकिन कभी कभी सोचता हूँ कि क्या कांग्रेसी सिर्फ ब्लॉग या फेसबुक पर ही ध्यान देते हैं, भारत के प्रतिष्ठित अखबारों के समाचारों का संज्ञान नहीं लेते ??? वैसे आज सिर्फ काटजू के खिलाफ संसद में निंदा प्रस्ताव पारित होने के बाद "दैनिक भास्कर" वाले सोच रहे होंगे भैया बच गए अगर संसद 30 जनवरी को चल रही होती तो हम भी निपट जाते। आप ही पढ़ लीजिये, बापू की अमर कहानी, "दैनिक भास्कर" की ज़ुबानी। ( 6 स्लाइड्स हैं ,काफी ज्ञानवर्धक हैं) http://www.bhaskar.com/…/GUJ-AHM-mahatma-gandhiji-wanted-re…

विवेक मिश्र
11. 3 . 2015
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प्रेम का प्रतीक 'रामसेतु' अथवा 'ताजमहल'

दैविकता श्रद्धा का विषय है और ऐतिहासिकता आस्तित्व का। लगभग 1000 हजार वर्ष तक दासता की बेड़ियों को गले में डाले डाले, दरबारबारियों और वामपंथियों द्वारा रचित पक्षपातपूर्ण इतिहास पढ़ कर हमने अपनी हीनभावना की ग्रंथियों को इतना विकसित कर दिया है की अपने धर्म, देवी देवताओं , ग्रंथों और संस्कारों का मान मर्दन करने में ही अपनी बुद्धिमत्ता समझते हैं। ऋषि मुनियों के द्वारा उद्धृत तथ्य आज की संस्कारहीन पीढ़ी को हास्यास्पद लगते थे लेकिन वही तथ्य जब पाश्चात्य वैज्ञानिक सामने रखते हैं तो भी हठधर्मिता की पराकाष्ठा ये हैं की उसे नकारने के कुतर्क ढूंढें जाते हैं।
बात कर रहा हूँ प्रेम के प्रतीक तेजो महालय (वर्तमान का ताज महल) बनाम राम सेतु की।
17 जून 1631 को अपने 14वें बच्चे को जन्म देते समय "आरज़ूमन्द बानो" वीरगति को प्राप्त हुई। मैं इसे वीरगति ही कहूँगा क्योंकि इतिहासकारों के मुताबिक वैवाहिक जीवन के 19 साल में, यदि बायोलॉजिकल कारण बाधा न बनते तो यह मशीन हर वर्ष एक मॉडल बना रही थी और ओवरप्रोडक्शन कहिये या ओवरलोड फैक्ट्री आगरा से 600 कि.मी दूर बुरहानपुर नाम के शहर में ढह गयी। प्रेम के रूप में कितना सुन्दर चित्रण करते हैं हमारे इतिहासकार शाहजहाँ की इस वासना का, जिसके हरम में 5000 से ज़्यादा अय्याशी के सामान थे। वैसे तो " Tajmahal The True Story authored by Shri P.N. Oak" ने लगभग 110 ऐतिहासिक और वैज्ञानिक तर्क दिए हैं की ताजमहल पहले एक शिव मंदिर था जिसे जयपुर के राजा से शाहजहाँ ने धोखेवश हथियाया था और बाद में हलकी फुलकी फेर बदल करके तथा उसपर आयतें खुदवा कर उसे ताज महल बनवा दिया। ( Purushottam nagesh Oak, के facebook page से विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं )। वर्तमान इतिहासकारों के अनुसार दिसंबर 1631 में बुरहानपुर से "आरज़ूमन्द " की कब्र खोद कर लाश आगरा लायी गयी और फिर उसके ऊपर 1632 से 1655 में ताज महल बनाया गया।जिसमे 3 करोड़ 32 लाख के करीब रूपए, 1000 हाथी और 20000 मज़दूरों ने २० वर्ष तक मेहनत की थी और इसके बाद उस प्रेम पुजारी ने शिल्पीकारों के हाथ इस लिए काट दिए थे की वे दुबारा कोई ऐसी कलाकृति न बना पाएं।
और दूसरी तरफ प्रेम का वो अद्भुत आश्चर्यजनक नमूना नल सेतु, ( नल ,राम सेतु के वास्तुकार तथा विश्वकर्मा के वंशज ), जो कालांतर में राम सेतु के नाम से प्रचलित हुआ। नासिक (सीता जी का अपहरण हुआ था ) से 1739 km पदयात्रा करते करते हुए श्री राम रामेश्वरम पहुंचे तथा मानवीय कल्पना से परे समुद्र के ऊपर 48 km लम्बे सेतु का निर्माण करवाया,जिसका अस्तित्व हज़ारों वर्षों बाद आज भी कायम है और जिसका ज़िक्र वाल्मीकि रचित रामायण ,जो की लगभग 5000 वर्ष पूर्व लिखी गयी थी , या कम्बन रामायण जो की 1000 वर्ष पूर्व लिखी गयी थी, कालिदास कृत रघुवंशम जो की 5 वीं शताब्दी में लिखी गयी थी और तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस जो की 17 वीं शताब्दी में लिखी गयी थी में हैं। इतने कवि उत्तर भारत में बैठ कर इतनी सटीक कल्पना नहीं कर सकते यदि यह यथार्थ न होता।
अफ़सोस हैं की नई पीढ़ियों और दरबारी इतिहासकारों को एक लुटेरे और निर्मम शख्स की वासना और जल्लादियत का नमूना प्रेम का प्रतीक ताज महल तो नज़र आता है परन्तु अपने अराध्य का प्रेम और त्याग राम सेतु तब तक कोरी कल्पना लगा जब तक NASA ने उसे अधिकृत रूप से सेतु घोषित नहीं कर दिया।
श्री राम के प्रेम में दैविकता भी है और ऐतिहासिकता भी। अब तय आप को करना है की ताज महल (तेजो महालय ) असली प्रेम का प्रतीक है या राम सेतु।
विवेक मिश्र 
4 .11  .2014 

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बुधवार, 29 जनवरी 2014

6 दिसम्बरकी साम्प्रदायिकता बनाम 19 जनवरी की धर्मनिरपेक्षता

  6 दिसम्बरकी साम्प्रदायिकता  बनाम 19  जनवरी की धर्मनिरपेक्षता 

इस लेख को लिखने से पहले मैंने 19 जनवरी को पूरा दिन आँखें गड़ा कर सभी न्यूज़ चैनल बहुत गौर से देखे।  शिद्दत से 20 जनवरी के समाचार पत्रों का इंतज़ार किया कि पूरे देश में 19 जनवरी के सन्दर्भ में किस नेता या किस राजनितिक दल ने क्या कहा।  इत्तेफाक से इसी दिन भाजपा की कार्यकारिणी में मोदी बोले सुषमा स्वराज बोलीं राजनाथ सिंह बोले इससे पहले कांग्रेस की राज्यइकाइयों की बैठक में राहुल गांधी बोले मणिशंकर अय्यर बोले सलमान खुर्शीद बोले।  लखनऊ में आयोजित " साम्प्रदायिकता के खिलाफ आवाम की प्रतिध्वनि " में बृंदा करात बोलीं। केजरीवाल भी बोले और उनके अतिप्रतिभावान मंत्री सोमनाथ भारती भी बोले।  समाज और नेताओं को अपने पैमाने पर सही और गलत नापने वाला मीडिया भी बोला। सब ने सब कुछ कहा पर नहीं कहा तो 19 जनवरी और 19 जनवरी 1989 पर कुछ नहीं कहा। नहीं कहा तो एक भी शब्द आज़ाद भारत के मुंह पर कालिख पोतने वाली 19 जनवरी 1989 की उस तारीख के बारे में नहीं कहा जिस दिन कश्मीर की तमाम मस्जिदों से हिंदुओं के खिलाफ इतना जहर उगला गया था कि हिंदुओं का सरेराह  कत्लेआम शुरू हो गया था जिसके चलते साढ़े तीन लाख कश्मीरी पंडितों को रातों रात खाली हाथ अपना घर द्वार छोड़ना पड़ा और जो 24 साल से अपने ही देश में विस्थापित हो कर कैम्पों में शर्णार्थियों की ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं। 
अजब है इस देश की जनता और नेता कि कुछ सौ दंगा पीड़ित परिवारों को चंद दिनों में ही पांच लाख प्रति परिवार के हिसाब से 90 करोड़ का मुआवज़ा बाँट दिया जाता है। अगर सत्ताधारी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव या कुछ मीडिया रिपोर्टों का संज्ञान लें तो दंगापीड़ितों के लिए लगाये गए कैम्पों में रहने वाले आधे से अधिक लोगों को मुआवज़े मुफ्त कपडे और खाने का लालच दे कर स्थानीय नेताओं ने ज़बरदस्ती उन केम्पों में बसाया था। अजब है इस तथाकथित धर्मनिर्पेक्ष देश का मानवाधिकार आयोग और मीडिया जिसे चार माह के अस्थायी रूप से विस्थापित एक सम्प्रदाय विशेष के उन लोगों का दर्द तो नज़र आ रहा है जो एक परिवार को मिलाने वाले पांच लाख ले कर भी इस लिए कैम्प नहीं छोड़ रहे थे कि उनके परिवार के हर सदस्य को पांच लाख रुपए चाहिए। लेकिन 24 साल से बेघर हुए साढ़े तीन  लाख लोगों का दर्द इन्हे नज़र नहीं आता। अजब हैं इस देश के विदेश मंत्री जिन्हे चार विदेशी महिलाओं से अभद्रता से दो देशों के बीच सम्बन्ध खराब होने की चिंता है पर कश्मीर में 19 जनवरी 1989 के बाद  कितनी महिलाएं बेइज़ज़त हुईं और कितनी अपनी जान और आबरू बचा कर भागीं इस पर सलमान खुर्शीद जी की आज तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी। सरकार तब भी केंद्र में कांग्रेस की ही थी और आज भी उसी कांग्रेस की है जिस की वो नुमाइंदगी कर रहे हैं।  
जिस तारीख में पूरी कश्मीर घाटी से धर्म के आधार पर हिंदुओं को पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया था वो तारीख किसी भी धर्म निरपेक्ष नेता या साम्प्रदायिकता के खिलाफ आग उगलने वाले राजनितिक दल को याद नहीं रहती। हाँ याद रहती है तो 6 दिसम्बर जिस दिन एक दमनकारी सेनापति द्वारा मंदिर तोड़ कर बनवाई गयी उस मस्जिद को तोड़ दिया था जिसमे नमाज़ भी अदा नहीं होती थी। यह एक सांप्रदायिक शक्तियों का कृत्य था पर जब मंदिर या महात्मा बुद्ध की मूर्ति तोड़ी जाती है चाहें वो घटना लखनऊ कि हो या अफगानिस्तान कि उससे शरारती या तालिबानियों की उद्दण्डता कह कर इतिश्री कर ली जाती है। मुसलमान जब हिन्दू देवी देवताओं के नग्न चित्र बनाता है तो उसके लिए वो कला है इसके खिलाफ आवाज़ उठाने वाले साम्प्रदायिक और संकीर्ण मानसिकता के हो जाते हैं। लेकिन जब कोई विदेशी पैग़म्बर का कार्टून बना देता है तो और उग्र प्रदर्शन भारत में होते हैं तब किसी  धर्मनिरपेक्ष नेता की जबान उन्हें शांत करवाने के लिए नहीं खुलती। अगर गोधरा में सुनियोजित ढंग से कारसेवकों की बोगी जलाई जाती है तो वो धर्मनिर्पेक्षकों की नज़ार में हादसा हो जाता है लेकिन जब उसकी प्रतिक्रिया होती है वो साम्प्रदायिकता हो जाती है।  मुज़फ्फरनगर में जब मुसलमान हिन्दू लड़की को छेड़ने के विरोध में उसके भाई को मार देते हैं और थाने से छोड़ दिए जाते हैं यह नाइंसाफी किसी को नज़र नहीं आती लेकिन उसकी प्रतिध्वनि साम्प्रदायिक हो जाती है। गुजरात में जहां इशरत जहाँ उग्रवादियों के साथ मारी जाती है तो वो इन सब धर्मनिरपेक्ष दलों के लिए बेक़सूर हो जाती है लेकिन अपनी जान पर खेल कर उग्रवादियों को मारने वालों को मानवाधिकार के सामने मुज़रिमों की तरह अपनी सफाई देनी पड़ती है। भारत का यदि कोई नेता यह कहता है कि वह राष्ट्रवादी हिन्दू है तो सभी राजनीतिक दलों  और मीडिया में आग लग जाती है और दूसरी तरफ मुस्लिमों को खुश करने के लिए एक नेता अपनी एक रैली में डंके की चोट पर कहता है की कारसेवकों पर गोली मैंने चलवाई थी या दूसरी रैली में कहता है कि देश के विकास में सिर्फ किसानों और मुसलमानों का सहयोग है तो एक भी राजनितिक दल या मीडिया यह नहीं कहता की आप साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं।  यही नेता जी प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखने का हक़ उसी वक़्त खो देते हैं जब वो कहते हैं कि मैं मरते दम तक मुसलामानों का भला करूंगा।  आप यदि प्रधानमंत्री बनाने का सपना संजोते हुए यह बयान देते कि मैं मरते दम तक देशवासियों का भला करूंगा तो राष्ट्रीयता और धर्मनिर्पेक्षता के पक्ष में यह बयान ज्यादा शोभा देता। इन्ही नेता जी के पास निहत्थे कारसेवकों पर चलवाने के लिए तो गोलियां थीं परन्तु जब रक्षामंत्री बने तो शायद  कश्मीर में सक्रिय उग्रवादियों के लिए इनकी गोलियां खत्म हो गयीं थीं या इन्हे साढ़े तीन लाख कश्मीरी पंडितों में वोट बैंक नज़र नहीं आया कि उन्हें वापिस उनके घरों में बसा देते। चूँकि आज इन कश्मीरी पंडितों के वोट मायने नहीं रखते इसलिए किसी भी तथाकथित साम्प्रदायिक अथवा धर्मनिरपेक्ष दलों को इनकी न दुर्दशा दिखती है न ही यह 19 जनवरी को अपनी रैलीओं अथवा अधिवेशनों में मुद्दा बनाते हैं। अजब है यह देश जहाँ का कानून कहता है कि चाहे सौ गुनहगार बच जाएँ लेकिन एक बेगुनाह को सज़ा नहीं होनी शायद इसीलिए कुछ सौ उग्रवादियों को इस लिए नहीं मारा जा सकता कि जो साढ़े तीन लाख लोग बेघर हो कर अपने ही देश में शरणार्थियों कि ज़िन्दगी बसर कर रहे हैं उन्हें उनके घर मिल जायेंगे।
 जिस तरह आप सोते हुए व्यक्ति तो जगा सकते हैं लेकिन सोने का नाटक करने वाले को आप जगा नहीं सकते उसी तरह वोट की राजनीति में अंधे तथाकथित धर्मनिर्पेक्ष राजनीतिज्ञों को आप 6 दिसम्बर भुलवा नहीं सकते और आज़ाद भारत के सबसे काले अध्याय 19 जनवरी को याद करवा नहीं सकते। जिन साढ़े पांच सौ वर्ष पुरानी  दमनकारी नीतियों के प्रतीक बाबरी मस्जिद के गिरने का अफ़सोस जो धर्मनिर्पेक्ष दल हर वर्ष करते हैं, इतिहास उन्हें ही कश्मीरी पंडितों की  ढाई हज़ार वर्ष पुरानी सभ्यता और संस्कृति को मिटाने के लिए ज़िम्मेदार ठहरायेगा। आज से सात सौ वर्ष पहले भी हिंदुस्तान के कमज़ोर शासक प्रजा को लुटेरों की दमनकारी नीतियों से नहीं बचा पाये थे और आज के सत्तालोलुप शासक भी इतिहास के पन्नों कायर और कमज़ोर कहलायेंगे जो एक नस्ल को मिटते हुए देखते रहे लेकिन अतातायिओं के खिलाफ इस लिए कार्यवाही नहीं की क्यूँकि इस से उनके धर्मनिर्पेक्ष होने का तमगा छिन जाता।   

                                                            विवेक मिश्र     

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

"आप: कल, आज और कल "

बचपन में  एक कहानी पढ़ी थी, "एक बार  शिवा जी एक युद्ध में हार कर जंगलों में चले गए।  रात बिताने के लिए उन्होंने एक बुढ़िया की झोंपड़ी में शरण मांगी । बुढ़िया उन्हें पहचानती नहीं थी,  उसने उन्हें वहाँ रुकने की  इज़ाज़त दे दी । रात में  खाने के लिए बुढ़िया ने जब गरम गरम खिचड़ी परोसी तो शिवा जी ने जल्दी से खिचड़ी को बीचों बीच से खाने की शुरुआत की । खिचड़ी गरम थी और उनका हाथ जल गया । यह देख कर बुढ़िया बोली तुम भी बिलकुल शिवा जी की तरह हो, बजाये कि एक तरफ से राज्यों पर आक्रमण कर के उन्हें जीतने के बजाय बीचों बीच हाथ डाल दिया और जल गए । शिवा जी ने मन ही मन में उस बुढ़िया की  बात को गाँठ में बांध लिया और इस नीति पर चलते हुए वह एक दिन "छत्रपति शिवाजी" बने.'' शायद यह कहानी या तो अरविन्द केजरीवाल ने सुनी नहीं या एक ही जीत ने उन्हें इतना महत्वाकांक्षी बना दिया कि "आप" पार्टी ने न सिर्फ इस वर्ष होने वाले लोकसभा चुनावों में हिस्सा लेने की बल्कि सभी दलों के प्रमुख राजनेताओं के खिलाफ अपने उम्मीदवार खड़े करने की घोषणा कर दी। 
इस पूरे घटनाक्रम में "आप" के जनक और सलाहकार शायद यह भूल गए कि दिल्ली एक राज्य होते हुए भी सिर्फ एक बड़ा शहर है और दिल्ली नाम के इस खेत में  जो फसल " आप" ने काटी है उसके लिए हल अन्ना ने ढाई साल पहले भूखे रहकर और जेल जा कर चलाया था। अगर दो साल पहले सितम्बर 2011 में कांग्रेस ने हठधर्मिता का परिचय न देते हुए अन्ना के जनलोकपाल को तब पारित कर दिया होता तो न तो कांग्रेस की  यह दुर्दशा होती न ही "आप" पैदा होती। वैसे तो पूरा देश ही भ्रष्टाचार से त्रस्त है और इससे मुक्ति चाहता है पर देश में जब भी कोई राष्ट्रीय मुद्दा उठता है तो उसे सुलझाने के लिए दिल्ली ही कर्मक्षेत्र बनता है। चाहें अन्ना का आंदोलन हो या रामदेव  का;  उसमे जान तो दिल्ली की  जनता ही फूंकती है। भ्रष्टाचार से आन्दोलित जनता को दिल्ली में ही "निर्भया काण्ड" और "गीतिका-गोपाल कांडा" का मुद्दा  भी मिल गया जिसने पूरी दिल्ली को धर्म  और वर्ग से ऊपर उठा कर एक समुदाय में बदल दिया जिसे वर्त्तमान सरकार  से नफरत हो गयी थी.।  वो एक ईमानदार एवं कर्तव्यनिष्ठ व्यवस्था चाहती थी।
यदि हम "आप" को बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो कर देखें तो आप ने एक ईमानदार और आदर्श सरकार का ख्वाब जनता को दिखाया। चुनाव जीतने के लिए मुफ्त पानी सस्ती बिजली वी.आई.पी कल्चर से निजात और न जाने क्या क्या वायदे कर डाले। इसी लहर  पर सवार हो कर "आप" एक बड़े दल के रूप में उभरी भी। सरकार बनने पर मुख्यमंत्री   ने शर्तों के साथ वायदों को घोषणाओं में तब्दील कर दिया। आम आदमी का भला करने चली "आप"ने कहने को तो मुफ्त पानी दे दिया, बिजली सस्ती कर दी परन्तु एक आई.आर.एस क्वालीफाईड व्यक्ति  ने एक बार भी जनता को यह नहीं चेताया की कोई भी चीज़ वाकई मुफ्त नहीं मिलती।  सरकार जो इसकी कीमत चुकाती  है वो बजट में कहीं न कहीं वित्तीय घाटे  के रूप में नज़र जरूर आती है और इसी घाटे को पूरा करने के लिए सरकार हर वर्ष आम आदमी पर नए कर का बोझ लाद देती है या पेट्रोल डीज़ल या रसोई गैस के दाम बढ़ा देती है।  
केजरीवाल एण्ड पार्टी ने अपनी मुहीम तो भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू की थी पर वो अपने को न तो राजनीति में आने से रोक सके न ही इसकी गंदगी को अपनाने से रोक सके।  चुनाव जीतने में कोई कसर न रह जाये इस लिए विवादस्पद मुस्लिम नेताओं से समर्थन लिया।  सत्तारूढ़ होने के लिए लोकलुभावन वायदे किये। यदि  "आप" अपने वायदे पूरे भी करेगी तो किसकी जेब से और किस कीमत पर।  यदि विभिन्न समाचार पत्रों की रिपोर्ट पर या अन्य राजनीतिक दलों की मांग पर जाएँ तो "आप" तो अपनी दुकान विदेश से विशेषकर 'फोर्ड फाउंडेशन' से मिलने वाले चंदे से चला लेगी पर देश चलाने के लिए तो आम आदमी की जेब से पैसा निकालेंगे ना ।  यह यक्ष प्रश्न सिर्फ "आप" पार्टी से नहीं है बल्कि बसपा से भी है जिसने जनता की गाढ़ी कमाई के 6000 करोड़ रुपये प्रदेश के उत्थान में लगाने की बजाए स्मारक बनवाने में लगा दिए जिसमे से 1400 करोड़ घोटाले के रूप में कलियुगी देवी देवताओ की बलि चढ़ गए।सपा किसके पैसे से 15 लाख लैपटॉप बंटवा रही है। दक्षिण में डी.एम.के तमिलनाडु में 40 लाख टीवी शर्तिया अपने पार्टी फण्ड से नहीं बांटेगी या कांग्रेस सवा लाख करोड़ खाद्य सुरक्षा योजना के लिए किसकी कमाई से निकालेगी। सत्ता में आने और अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए ये राजनीतिक  दल किस तरह से देश को खोखला कर रहें है कि हर कदम पर टैक्स देने के बावज़ूद यदि इसी आम आदमी को शहर के बीच लघुशंका का समाधान करना पड़ जाये तो उसे हर बार शौचालय का प्रयोग करने के लिए दो से पांच रुपये देने पड़ते हैं। एक आम आदमी इन्कम टैक्स देने के बाद अपनी जरूरत की हर खरीद पर 12 से 15% सेल्स टैक्स, सर्विस टैक्स ,आबकारी टैक्स या वैट अदा करता है। किसलिए कि सरकार अपना खर्च चला सके या उसकी गाढ़ी कमाई को सत्ता में बने रहने के लिए मुफ्त में लुटवा सके। "आप" से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि वो भी आम आदमी का कांग्रेस की तरह ही लेकिन परिष्कृत ढंग से शोषण और दोहन करेगी।  
खैर इस मुफ्त पानी सस्ती बिजली और एफ.डी.आई में विदेशी निवेश के विरोध की लहर पर जो जीत हासिल हुई उसमे "आप" यह भूल गयी कि यह उसकी एक राज्यनुमा शहर में दो साल की हलजुताई का नतीज़ा है और इसकी पृष्टभूमि की चर्चा हम पहले ही कर चुके हैं । "आप" की इस अप्रत्याशित जीत से पूरा देश अचंभित,खुश और उदास है।  जिसकी जैसी निष्ठा है वैसी ही उसकी प्रतिक्रिया है।  आप भी अपनी इस जीत से जोश में भर गयी। यहाँ तक तो ठीक था परन्तु सफलता यदि किसी के सर पर चढ़ कर बोलने लगे तो यह ठीक नहीं है। वर्त्तमान में आप के मंत्रियों के कृत्यों और बयानों से लगने लगा है कि ये सफलता को पचा नहीं पा रहे हैं। सफलता के नशे में चूर आप का थिंक टैंक भारत के मतदाताओं और राजनीति का इतिहास भूल गया जहाँ एक लहर  आपातकाल के बाद आयी थी जिसने कांग्रेस को इसी तरह उखाड़ फेंका था। एक लहर आंध्र  में रामाराव की आयी थी जब आंध्र से कांग्रेस साफ़ हो गयी थी। उस समय भी कई सत्तालोलुप बिन्नी पैदा हो गए थे और देश को मध्याविधि चुनाव देखने पड़े थे। "आप" ने भी एक लहर के सहारे जीत तो देख ली है और उसमें विनोद बिन्नी, और टीना शर्मा के रूप में विद्रोह भी शुरू हो गया है।  
 मुख्यमंत्री बनने के पंद्रह दिन के भीतर बिना किसी पूर्वानुमान के अधकचरी तैयारी के साथ खुले दरबार का आयोजन और फिर जनता से पीछा छुड़ाकर भागना  'आप' की  मानसिक परिपक्वता और दूरदृष्टि पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।  सत्ता ग्रहण करने के 15 दिन के भीतर ही इनके मंत्री जिस तरह कि उच्श्रंखलता का परिचय दे रहे हैं या  देशहित को दरकिनार कर बयानबाजी कर रहे हैं, वह इनकी आंतरिक अनुशासनहीनता दर्शाता है। दिल्लीवालों की जो समस्याएं 67 वर्षों में पल-बढ़कर जवान हुई हैं, उसे यदि 'आप' जनता दरबार लगाकर हैरी पॉटर की छड़ी हिलाकर दूर करने की ग़लतफ़हमी पाले हुए हैं; तो   यकीन मानिये दिल्लीवालों का मोहभंग होने में भी ज्यादा समय नहीं लगेगा।"आप" ने भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाते हुए जो लड़ाई जीती थी, उसी के तहत यदि भ्रष्ट व्यवस्था  को सही करने पर ध्यान केंद्रित किया जाता तो आम आदमी कि समस्याओं का निदान अपने आप ही हो जाता। यदि दिल्ली सरकार में सभी विभागों की उनके उत्तरदायित्वों के प्रति जवाबदेही तय कर दी जाती,भ्रष्टाचार के जिन मुद्दों को आप ने अपने आंदोलन के दौरान उठाया था उन पर कार्यवाही की जाती या पूरी दिल्ली की जनता को अपने दरबार में बुलाने की अपेक्षा जैसे आप वोट मांगने जनता के दरवाजे पर गए थे वैसे ही क्षेत्रवार समस्याएं समझने के लिए क्षेत्रों और सम्बंधित विभागों का औचक निरीक्षण किया होता तो निश्चित रूप से जैसा आप कह रही थी करने में सफल होती।  वैसे एक महीने में किसी भी सरकार के कार्यों की समीक्षा करना उसके साथ सरासर अन्याय होगा। परन्तु जिस तरह के निर्णय आप के मंत्री ले रहे हैं या विवादों में पड़ रहे हैं यह आप कि अपरिपक्व मानसिकता और अनियोजित कार्यशैली दर्शाता है।  
बात शुरू हुई थी आप कि जीत के जोश में होश खोने से।  अभी एक छोटे से राज्य का ठीक से सञ्चालन करने की स्थिति में आये  नहीं है और महतवकांक्षाएं हो गईं 300 सीटों पर  लोकसभा चुनाव लड़ने की। सम्भव है लोकसभा चुनावों से सम्बंधित कागज़ी तैयारी आप ने कर ली हो ,परन्तु इतिहास और बिन्नी प्रकरण से आप को यह आभास हो जाना चाहिए कि इस जीत की लहर में आपसे इस वक्त जो लोग जुड़ रहे हैं उन में से 50% लोग मौकापरस्त और हवा के साथ रुख बदलने वाले हैं। यदि ईमानदारी से देखें तो अधिकांश राज्यों में "आप" के संगठन के कार्यालय भी नहीं हैं। ऐसी स्थिति में भी यदि आप लोकसभा चुनाव लड़ना चाह रही है तो तीन बातें ही समझ में आती हैं। एक,आप देश को एक अस्थिर सरकार या त्रिशंकु लोकसभा की तरफ धकेल रही है। दूसरे आप कांग्रेस जिसने चुनाव से पहले ही अपनी हार मान ली है के एजेंट के रूप में मतदाताओं को भ्रमित करने की भूमिका अदा करने जा रही है। और तीसरे आप वाकई फोर्ड फाउंडेशन द्वारा दिए जा रहे अनुदान का क़र्ज़ एक अस्थिर भारत के रूप में अदा करने जा रही है। 
चुनावी परिणाम कुछ  भी आयें लेकिन नुक्सान देश, आम आदमी और आप का ही होगा। अस्थिर सरकार बनने से देश उसी गति से चलेगा जिस से देश की जनता निजात पाना चाहती है। स्पष्ट और निर्णायक जनमत न आने की स्थिति में दुबारा चुनाव सम्भव हैं जिसके खर्चे का वहन आम आदमी को ही करना पड़ेगा। संगठनात्म्क और राजनीतिक रूप से आप अभी इतनी मज़बूत नहीं है कि किंग मेकर की भूमिका में आ जायेगी,हाँ कांग्रेस के शिखंडी का तमगा आप को ज़रूर मिल जायेगा। 
जिस तरह से देश के विभिन हिस्सों से आप में विद्रोह के स्वर उठने लगें हैं तो यही लग रहा है कि शहर बसा नहीं और लुटेरे चले आये। यदि आप पूरे देश के वोटिंग पैटर्न को दिल्ली कि तर्ज़ पर देख रही है तो उसकी यह ग़लतफहमी भी जल्दी ही दूर हो जायेगी। क्योकि आज भी देश कि अधिकांश जनता जाती, धर्म और व्यक्तिगत  निष्ठा के नाम पर वोट डालती है।  अन्यथा न तो चुनावों से चार महीने पहले कांग्रेस जाटों को आरक्षण देती ,न अपनी सावधान रैली में माया वती दलित लड़की के लिए वोट मांगती, न ही मुलायम सिंह और नितीश कुमार अपने बजट में मुस्लिमों के नाम पर भरी भरकम प्रावधान करके आला पदों पर मुस्लिमो की नियुक्ति करते। 
इन सब बातों को मद्देनज़र रखते हुए यदि फिर भी "आप" 2014 के लोकसभा चुनाव लड़ती है तो सिर्फ एक बात ही कही जा सकती है कि धैर्य  रखिये ईमानदारी से अपने व्यवस्था परिवर्तन के लक्ष्य को उपार्जित करके दिखाइये, 2019 बहुत दूर नहीं है। अन्यथा आप कल तक एक आंदोलनकारी के रूप में सड़क पर थी। आज अपनी मर्ज़ी से सड़क से सरकार चलाना चाह  रही है लेकिन अपनी महत्वाकांछा और हठधर्मिता में आप का आंकलन गलत न हो जाये।  ऐसी स्थिति में आप जनता की मर्ज़ी से सड़क पर होगी। 
                                                                 विवेक मिश्रा 

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

कश्मीर में जनमत संग्रह का दुराग्रह

                                   कश्मीर में जनमत संग्रह का दुराग्रह 

वर्ष 1900 में जम्मू कश्मीर में 10 लाख हिन्दू और कश्मीरी पण्डित रहते थे जोकि 1947 से 1989 के बीच 4.5 लाख रह गये और फिर 19 जनवरी 1989 को कश्मीर की मस्जिदों से ऐलान हुआ कि हिन्दुओं, अपनी औरतें और लड़कियों को छोड़कर चले जाओ वर्ना मार दिये जाओगे। मस्जिदों से इतने भड़कीले भाषण हुए कि सरेराह हिन्दु मारे जाने लगे और आज की तारीख में सिर्फ और सिर्फ 20000 से भी कम हिन्दु कश्मीर में रह गये। कश्मीर घाटी में रामबन से आगे खन्नाबल अनन्तनाग से श्रीनगर और श्रीनगर से सोफियाँ, सोफियाँ से सूरनकोट होते हुए पूंछ में एक तरफ से जले हुए घर, खाली पड़ी हुई बस्तियां इस बात की चश्मदीद गवाह है कि किस तरह से कश्मीरी पण्डितों और हिन्दुओं को मार कर भगाया गया, जो आज अपने ही देश में शरणार्थी होकर रह गये। 24 साल गुजरने को है और उनका आज तक कोई जनमत संग्रह नहीं किया गया। 24 साल गुजरने को है वे आज भी दिल्ली और जम्मू के कैम्पों में शरणार्थियों की जिन्दगी गुजारने को मजबूर हैं। 
5 जनवरी 2014 को ही कश्मीर के मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से माना कि कश्मीरी पण्डितों के साथ अन्याय हुआ है और हम उन्हें कश्मीर घाटी में वापिस लाने में सुरक्षा की दृष्टि से सक्षम नहीं हो सके। यदि सुरक्षा बल न हो तो सम्भव नहीं कि आप (कोई हिन्दु) अमरनाथ जी, क्षीर भवानी या शंकराचार्य जी के मंदिर के दर्शन कर पाये। 
इन सबके ऊपर प्रशान्त भूषण जी का एक वर्ष में दूसरी बार कश्मीर में सुरक्षा जवानों की तैनाती को लेकर जनमत संग्रह करवाने का वक्तव्य आता है। ये प्रशान्त भूषण जी उस राज्य में सेना की तैनाती को लेकर जनमत संग्रह करवाना चाहते हैं जहाँ श्रीनगर के लाल चौक पर भारतीय तिरंगा फहराना तो दूर, पिछले माह ही एक फिल्म की शूटिंग के लिए तिरंगा नहीं फहराया जा सका। प्रशान्त भूषण जी का यह बयान बन्द कमरे से उन लोगों से लिए आदर्शवादी लोकतन्त्र का ख्याल है जो लोग भारतीय लोकतन्त्र और संविधान में आस्था ही नहीं रखते। यदि प्रशान्त जी ने कभी आम कश्मीरी से बात की होती तो उन्हें पता चलता कि कश्मीरी जब बोलते है तो यही बोलते हैं कि ‘‘आपकी हिन्दुस्तानी सरकार ने हमारे साथ ये नाइन्साफी की या हमारे साथ वो नाइन्साफी की।’’  66 वर्षो बाद भी वो भारत को अपना भारत नही कहते। ऐसे जनसमूह के जनमत संग्रह के क्या नतीजे आयेगें, वही जो वहाँ के अलगाववादी और पाकिस्तान परस्त लोग चाहते हैं और अब इस बात को प्रशान्त जी समझना नहीं चाहते। समझें भी तो कैसे क्योंकि उनके वकालत के पेशे ने उनसे हमेशा सच को झूठ और झूठ को सच साबित करवाया है और यही उनके अवचेतन मन की मानसिकता बनकर रह गया है कि वे पिटने के बावजूद कश्मीर में जनमत संग्रह की बात करने लगते हैं। 
आपने यदि जनमत संग्र्रह की बात ही करनी थी तो फिर कश्मीर में जनमत संग्रह न कहकर भारत में कश्मीर पर जनमत संग्रह की बात की होती तो पूरा देश आपके साथ होता। यदि आप जनमत संग्रह की बात करते है तो सिर्फ कश्मीर मुद्दे पर ही क्यों? क्या श्रीलंकाई तमिलों के हालात बहुत अच्छे हैं? या जिन तिब्बती शरणार्थियों को भारत ढो रहा है उनके देश में आपकी सुनवाई नहीं है। यदि आप जनमत के इतने पक्षधर हैं तो अपने देश के तमाम मुद्दों जैसे राम और कृष्ण जन्मभूमि, समान नागरिकता कानून, आरक्षण, कावेरी जल विवाद, आर्टिकल 370, हिन्दी का राष्ट्रभाषा होते हुए भी राजभाषा न होना। इन मुद्दो पर जनमत संग्रह का मशविरा क्यों नहीं देते। क्या ‘निर्भया’ काण्ड में आपको जनमत संग्रह नजर नहीं आया था, तब क्यों अदालत में एक साल तक मुकदमा चला।
धारा 377 पर भी तो जनसमूह उमड़ा था तो क्या समलैंकिगता को जायज ठहरा दिया जाये? आप 1983 पंजाब में जनमत संग्रह करवाते, दो दिन में खालिस्तान बन जाता ।  आप उस कश्मीर में जनमत संग्रह की बात कर रहे हैं जिसे शान्त बनाये रखने के लिए पिछले दस वर्षों में 6000 करोड़ रूपये खर्च हो चुके हैं। आज भी यदि कोई स्थानीय कश्मीरी किसी भी प्रकार से भारतीय सरकार या फौज की सहायता करता है तो उग्रवादी उसके हाथ पांव काट देते हैं उसके घर की महिलाओं के साथ रोज बलात्कार किया जाता है। मई 2008 के अपने एक ब्लाग में वर्तमान मुख्यमंत्री श्री उमर अब्दुल्ला ने लिखा कि जब हिन्दुओं के साथ अत्याचार हो रहा था तो मैं तो यहाँ नहीं था लेकिन मेरे दोस्तों ओर जानकारों ने बताया कि यह जानते हुए भी कि अन्याय हो रहा है किसी ने उग्रवादियांें के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं की थी। खाली हाथ हिन्दु रातों रात अपनी जमीन जायदाद छोड़कर चले गये। क्या आपका जनमत संग्रह उन्हंें उनकी जानमाल और आबरू की गारण्टी देते हुए उन्हीं के कश्मीर में लुटी हुयी जमीन जायदाद वापिस दिलवा पायेगा।
आप किस लिहाज से कश्मीर में सुरक्षा बलों को हटाने के लिए जनमत संग्रह की बात कर रहें हैं। यदि सुरक्षाबल हटा लिए गये तो कश्मीर में बचे खुचे अल्पसंख्यक हिन्दु भी बेमौत मारे जायेगें जैसा कि किश्तवाड़ में 9 अगस्त 2013 को हुआ। एक बार को स्थानीय नागरिकों की और कश्मीरी पण्डितों की त्रासदी की चिन्ता को छोड़ दे, तो आप चाहते हैं कि देश की अखण्डता को आप जैसे लोगों की सनक के हवाले कर दिया जाये। वैसे भी 1947 से लेकर 2013 तक एक भी सरकार ने वोट बैंक की राजनीति के चलते कभी इस मुद्दे को सुलझाने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं दिखाई, वर्ना जो सेना 1971 में एक नया देश बना सकती है, खालिस्तान के सपने को खाक में मिला सकती है, क्या वो एक राज्य को सही नहीं कर सकती?, कर सकती है लेकिन जब जगमोहन सरीखा गर्वनर कुछ करना चाहता है तो उसे मानवाधिकारों की दुहाई पर 4 माह में हटा दिया जाता है।
इस समस्या के बीज सत्ता लोलुप शेख अब्दुला और हरि सिंह के जमाने के बोये हुए हैं। प्रशान्त जी इस समस्या की मानसिकता को समझने के लिए आपको शेरे-कश्मीर तथा वर्तमान मुख्यमंत्री के दादा शेख अब्दुल्ला की आत्मकथा - ‘‘आतिशे-चिनार‘‘ पढ़नी पढ़ेगी जिसमें उन्होंने लिखा है कि कश्मीरियत मुस्लिम धर्म को कट्टरता से मानने के लिए एक हिज़ाब है। उन्होंने कश्मीरी पण्डितों को तीन विकल्प दिये थे रालिव (धर्म परिवर्तन), गालिव (मौत को अंगीकार कर लो) तथा चालिव (कश्मीर छोड़ दो)। हो तो सब कुछ वैसे ही रहा है जैसा शेख साहब ने चाहा, क्योंकि उनके पुत्र फारूख अब्दुल्ला और पौत्र उमर अब्दुल्ला ने अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल में कोई ऐसा कदम नही उठाया जिससे उनके दादा की सोच गलत प्रतीत होती। हाँ Land Tillar Act जरूर पास करवा दिया जिसके तहत वहाँ कि हिन्दु जमींदारों की जमीन उन जमीनों पर काम करने वाले मजदूरों की हो गई। आज जब बिहारी मजदूर उसी जमीन पर काम करते हैं ते वे मजदूर ही रहते हैं।
प्रशान्त जी, कश्मीर में अल्पसंख्यक जिन्दा रहें तथा कश्मीर भारत के लिए और सिरदर्द न बने, इसलिए एक आम आदमी की तरह इस तरह की छोटी सोच को कृपया अपने तक ही सीमित रखे। जनमत संग्रह की बात वही करते हैं जिन्हें सही अथवा गलत में संशय होता है अथवा सही एवं कठोर निर्णय लेने की क्षमता  नहीं होती।

"क्या वाकई मोदी विनाशकारी है"?

                                           क्या वाकई मोदी विनाशकारी है?

प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह का बयान कि मोदी का प्रधानमंत्री बनना विनाशकारी होगा न सिर्फ उनकी बन्द कमरे के अन्दर की सोच, जोकि वास्तविकता से काफी दूर है, दर्शाता है बल्कि जयचन्द और विभीषण की याद दिलाता है। वे अपने ही देश के सिर्फ लोकतान्त्रिक तरीके से चुने हुए अपितु आज की तारीख में अत्यन्त लोकप्रिय नेता के लिए ऐसा बयान दे रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ पाकिस्तान जो लगातार डंके की चोट पर भारतीय जवानों के सिर काट रहा है, चीन जो आये दिन सीमा उल्लंधन कर रहा है, अमेरिका जो राजनायिकों का बेइज्जत कर रहा है उन सबसे प्रधानमंत्री जी दोस्ताना सम्बन्ध बनाने को आतुर प्रतीत होते हैं।
यदि मनमोहन सिंह जी के बयान का कायदे से मनन किया जाये तो दो बातें सामने आती हैं। एक, हाँ मोदी विनाशकारी हैं, किन्तु देश के लिए नहीं कांग्रेस के लिए। जैसा विनाश कांग्रेस का इन विधानसभा चुनावों में हुआ है तो मनमोहन जी ही नहीं अपितु कांग्रेस और जनसामान्य यह मानता है कि मोदी ने वाकई कांग्रेस का इन राज्यों में विनाश कर दिया। दूसरी बात यदि मनमोहन जी से ही पूछा जाये कि विगत 60 वर्षों में जो देश का विनाश इस कांग्रेस के नेताओं ने किया है उसकी और ज्यादा दुगर्ति क्या मोदी तो क्या कोई अनपढ़ या गंवार व्यक्ति भी नहीं कर सकता। मनमोहन जी कैसे भूल गये कि चीन और पाकिस्तान से सीमा विवाद कांग्रेस की देन है। देश में लहलहाता हुआ भ्रष्टाचार कांग्रेस की गोद मे पला बढ़ा है। देश में लचर कानून व्यवस्था कांग्रेस की अकर्मण्य नीतियों की देन है। आज समाज को कानून का कोई भय नहीं रह गया है। बलात्कार, रिश्वतखोरी और आतंकवादी गतिविधियां कोई भी कहीं भी बेखौफ कर जाता । यदि श्री प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति न बनते तो ये कांग्रेस अफजल गुरू और अजमल कसाब को तब तक पालती जब तक उन्हें छुड़ाने के लिए कोई और विमान हाईजेक न हो जाता।
देश के अन्दर राज्य पानी और सीमाओं के लिए लड़ रहे हैं  और कांग्रेस बंग्लादेश को पानी और जमीन देने की बात करती है। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री खुद रूपये के अवमूल्यन को रोक नहीं पाये ओर मोदी को विनाशकारी को मैडल दे रहे हैं।
सिर्फ और सिर्फ 2002 के गुजरात दंगों की लाश को अपने कन्धों पर ढोकर भाजपा और मोदी को निशाना बनाने वाली कांग्रेस इस बात से कैसे मूंद सकती है कि गुजरात दंगे सुनियोजित गोधरा काण्ड की प्रतिक्रिया न सिर्फ थे बल्कि अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीति में कांग्रेस ने बहुसंख्यक हिन्दुओं को उन्ही के देश में राम को पूजने से रोक रखा है का परिणाम थे। अफसोस तो इस बात का है कि अदालत के निर्णय आने के बाद श्री मनमोहन सिंह ने अदालत की गरिमा को  ताक पर रख दिया। क्या गुजरात दंगों से पहले या बाद में भारत मंें कभी दंगे नहीं हुए, तो उन राज्यों के मुख्यमंत्री विनाशकारी क्यांे नहीं कहे गयंे। पिछले दो वर्षों में उत्तर प्रदेश में दंगे हुए, असम में दंगे हुए, किश्तवाड में दंगे हुए, क्यों यहाँ के मुख्यमंत्रियों  को मानवाधिकार आयोग, स्वयंसेवी संगठन और मीडिया कठघरे में खड़ा नहीं करता।
यदि एक गुजरात दंगों की वजह से मोदी विनाशकारी कहे जा सकते हैं तो कांग्रेस अपने लिए उपर्युक्त शब्द का चयन करें क्योंकि 1947 से अब तक भारत में 13000 से अधिक दंगों में 75000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। अपने सहयोगी सपा के लिए भी कोई शब्द चुनें जिसके वर्ष 2013 के शासन काल में ही उत्तरप्रदेश में 250 दंगे हुए जिसमें 95 लोगों की जान गई तथा 313 लोग घायल हुये। ये कोई मीडिया की रिपोर्ट नहीं है। बल्कि गृह राज्यमंत्री आइ0पी0एन0 सिंह का लोक सभा में बी0 मेहताब तथा अन्य सदस्यांे द्वारा पूछे गये सवाल का लिखित जवाब है।
मोदी को विनाशकारी कहने से पहले शर्म तो सिख होते हुए मनमोहन सिंह जी को आनी चाहिए कि वे उस कांग्रेस का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जिसने 1984 में सिर्फ दिल्ली में 2733 सिख मारे गये, पूरे देश में जो सिखों के जानमाल का नुकसान हुआ उसका कोई आंकलन नही है, और वही कांग्रेस आज भी अपने रसूख से सज्जन कुमार और जगदीश टाईटलर को बचाने की कोशिश में लगी है। जब कांग्रेस की नेता मरीं, तब तो यह तर्क मान्य हो गया कि ‘‘जब भी बड़ा पेड़ गिरता है, तो हलचल तो होती ही है’’ वही तर्क गोधरा काण्ड के बाद गुजरात दंगों के लिए मान्य क्यों नहीं। गुजरात दंगे भी सुनियोजित गोधरा काण्ड की प्रतिक्रिया थे, और यह प्रतिक्रिया भी लम्बे समय से मुस्लिम तुष्टिकरण की उपज थी। हाईकोर्ट के फैसले के बाद मनमोहन जी को या तो ईमानदारी से नरेन्द्र मोदी को विनाशकारी सम्बोधित नहीं करना चाहिए था या उन्हें 1977 में आपातकाल में संजयगांधी द्वारा दिल्ली मंे निजामुद्दीन इलाके में अल्पसंख्यकों के विरूद्ध चलाये गये बुलडोजर याद कर लेने चाहिए थे।
बहुत अफसोस होता है कि जब मुजफ्फरनगर या असम में दंगे होते हैं तो आप या आपके नुमाइन्दे पीड़ितों का हाल जानने के लिए व्यक्तिगत रूप से मुआयना करते हैं। हर तरीके से उन्हें मुआवजा  दिया जाता है। किन्तु जब किश्तवाड़ में वहाँ के स्थानीय विधायक सज्जाद अहमद किचलू की मौजूदगी में दंगें होते हैं तो आपकी या अन्य किसी सेक्यूलर पार्टी का एक भी सदस्य पीड़ितों को मुआवजा देना तो दूर, उनका हाल पूछने की जहमत भी नहीं उठाते। बल्कि दंगों में संलिप्त विधायको और मौलानाओं को क्लीन चिट देकर लालबत्ती दी जाती है। और तो और सपा के मुख्यमंत्री तो रचनात्मकता की इस हद तक जा रहें है कि दंगों के लिए जिम्मेदार भड़काऊ भाषण देने वालों मौलानाओं के मुकदमें वापिस लेने की संस्तुति कर रहें हैं। एक सम्प्रदाय को हर तरफ से तुष्ट करके समाज में विद्वेष के बीज बोने वाले ये कृत्य क्या आपको सृजनात्मक नजर आते हैं?
क्या किश्तवाड़ में मरने वाले वहाँ के अल्पसंख्यक हिन्दु इन्सान नहीं हैं, या असम में जिन स्थानीय हिन्दुओं की जमीनों पर आपका बंग्लादेश्ी मुस्लिम वोट बैंक कब्जा कर रहा है उनके मानवाधिकार नही है या मुजफ्फरनगर में हिन्दु लड़कियों की इज्जत इशरत जहाँ से कम है।
आज मोदी तथा कथित सेक्यूलरवादी पार्टियों कि आंख की किरकरी इसलिए बने क्योंकि एक तरफ उनके सुशासन में विपक्षी कोई खामी नहीं निकाल पा रहे और मोदी बहुसंख्यकों की प्रगतिशील भावनाओं के अनुरूप हैं तो वे किसी भी विपक्षी दल को विनाशकारी नहीं, विध्वंसकारी ही नजर आयेगें।
यह तो स्पष्ट है कि गुजरात दंगों के लेकर पहले कांग्रेस तथा अन्य दल भाजपा पर वार करते थे, लेकिन कांगें्रस का यही दुष्प्रचार मोदी के लिए वरदान बन गया। कांग्रेस तथा इसके सहयोगी दलों की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीतियों ने बहुसंख्यक हिन्दुओं को यह याद दिला दिया कि पाकिस्तान में तो हिन्दुओं को मरना ही है लेकिन अपने देश में वे दोयम दर्जे के नागरिक होकर रह गये हैं। इसीधर्म के नाम पर कांग्रेस ने पहले देश बंटने दिया। फिर उन्हीं मुस्लिमों को इसी देश में रहने दिया जिनके लिए पाकिस्तान बना था और अब उन्हें अल्पसंख्यकों के नाम पर हर कदम पर अतिरिक्त सुविधा प्रदान करके समाज में ईर्ष्या और विद्वेष के विनाशकारी बीज कांग्रेस या इसके सहयोगी दल ही बो रहे हैं।
यह आप किसी एक समुदाय को पुरस्कृत और दूसरे को तिरस्कृत करेंगे तो स्वाभाविक है उसकी प्रतिक्रिया होगी और आपके इन्हीं कृत्यों से एक नहीं कई मोदी पैदा होगें।
मनमोहन जी यदि आपकी कांग्रेस ने ईमानदारी से 60 वर्षों से वोटबैंक और तुष्टिकरण की राजनीति से ऊपर उठकर शासन किया होता तो आज न आपको मोदी विनाशकारी लगते और ना ही भारत 127 भ्रष्ट देशों की फेहरिस्त में 91वें पायदान पर होता।