शनिवार, 28 मई 2016

भारत की मासूमियत को लगा इस्लाम का ग्रहण

लज़्ज़त कभी थी , अब तो फितरत सी हो गयी है।
हमको गुनाह करने की , आदत सी हो गयी है।।
‪#‎भारत_में_मनुस्मृति_को_‬जलानेवाले_मूलनिवासियों_नवबौद्धों_वामपंथियों_धर्मनिरपेक्षों_और मुसलामानों_ को समर्पित इस पोस्ट को समझने के लिए आपको वर्तमान की कुछ घटनाओं और इतिहास की कुछ तारीखों को अपने ज़ेहन में रखना होगा ।
‪#‎घटनाएँ‬ ---- 1 ) पूरे देश और दुनिया में एक मुहिम चली हिन्दू असहिष्णु हो गया है। ( वर्ष 2014 से )
2) जे एन यू और कश्मीर में नारे लगना ,"भारत तेरे टुकड़े होंगे -इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह। और एक बड़े तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग का इसे आज़ादी की अभिव्यक्ति घोषित करना। ( वर्ष 2016 )
3) फरीदाबाद आग काण्ड , आरोपी ने खुद आग लगायी थी और मुद्दा बन दिया गया दलित / सवर्ण का। (वर्ष 2015)
4) बहुत से छात्रों ने पिछले वर्षों में आत्महत्या की है ,एक और छात्र ने भी आत्महत्या की , नाम था रोहित वेमुला, मुद्दा बना "दलित" की आत्महत्या का।
5 ) दो वामपंथी महिलाओं ,कविता  कृष्णन्  और उसकी माँ का यह कहना कि उन्होंने फ्री सेक्स किया है और Unfree सेक्स सम्भोग नहीं ब्लात्कार है। उन्होंने उस फाइल की भी निंदा की जिसमे JNU के अध्यापकों ने तथ्यों को संजोया है कि " JNU छात्रों की ज़िन्दगी शराब से भरी हुई है। (वर्ष 2016 )
6 ) फैज़ाबाद में बजरंग दल द्वारा शस्त्र चलाने की ट्रेनिंग देने पर प्राथमिकी दर्ज़। ( वर्ष 2016)
7 ) इशरत जहाँ ,बाटला हॉउसऔर साध्वी प्रज्ञा का सच सामने आना। ( वर्ष 2016 )
अब भारतीय इतिहास की कुछ उन ‪#‎तिथियों‬ को याद रखें जिन में लगभग 400 वर्षों का अन्तराल है -----
‪#‎विंस्टन_चर्चिल‬ ----1940 के दशक में इंग्लैंड का प्रधानमंत्री।
‪#‎औरंगज़ेब‬ ------ ( 4 नवंबर 1618 - 3 मार्च 1707 ) ने 1658 से 1707 तक राज किया।
‪#‎अल_बरुनी‬ ---- ( 5 सितम्बर 973 -13 दिसम्बर 1048) महमूद ग़ज़नवी के साथ भारत आया और #1030 तक "किताब तारीख अल हिन्द " पूरी कर ली।
‪#‎हुएन_त्सांग‬ ---- वर्ष 630 में भारत आया और 645 ई तक भारत भ्रमण किया।
(‪#‎यहाँ_पर_याद_रखें_कि_कुरान‬ /‪#‎इस्लाम_22_दिसम्बर_609‬ ई को पैदा होना शुरू हुआ था और ‪#‎कुरान_की_आखिरी_आयत_वर्ष_632‬ मोहम्मद के मृत्यु के वर्ष में लिखवाई गयी थी। )
‪#‎फा_हियान‬ -------399 ई से 412 ई तक भारत,नेपाल , बंग्लादेश तथा श्रीलंका में घूमा।
‪#‎मेगस्थेनिेज‬ ----- 305 ई पूर्व से 298 ई पूर्व तक चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में भारत में रहा।
‪#‎बाल्मीकि_रामायण‬ ----- 500 ई पूर्व किसी वर्ष में लिखी गयी थी ।
वर्तमान वर्षों में हिन्दू असहिष्णु हो गया है यही प्रचारित किया जा रहा है, कश्मीर केरल असम और कोलकाता में मिनी पकिस्तान के उदाहरण किसी उड़द पर सफेदी नहीं लाएंगे।
आइए देखें 80 वर्ष पहले स्वतन्त्रता पाने वाले दशक में विन्स्टन चर्चिल ने भारतियों के बारे में क्या कहा था। " Power will go to the hands of rascals, rogues, freebooters ; all Indian leaders will be of Low calibre and Men Of Straw.They will have sweet tongues and silly hearts.They will fight amongst themselves for power and India will be lost in political squabbles. A day would come when even Air and Water be Taxed in India " अर्थात " सत्ता दुष्ट कपटी और लुटेरों के हाथों में चली जाएगी ; सारे भारतीय नेता कम क्षमता और नीच चरित्र के होंगे। उनकी जुबां मीठी होगी और दिल से बेवकूफ होंगे। वे सत्ता के लिए आपस में लड़ेंगे और भारत रानीतिक झगड़ों में उलझ जायेगा। एक दिन ऐसा आएगा जब भारत में पानी और हवा पर भी टैक्स देना पड़ेगा।
आईये इससे 400 साल पीछे चलें औरंगज़ेब के ज़माने में। Munnaci एक इटली का घुम्मकड़ जो औरंगज़ेब के समय में भारत में रहा लिखता है ------"कोई भी कभी भी एक भी शब्द ऐसा नहीं बोलता जिस पर विशवास किया जा सके ................. यह लगातार आवश्यक हो जाता है कि बुरा से बुरा सोचा जाये और जो बताया जा रहा है उसके विपरीत सोचा जाये।"
3000 साल पुराना ,शूद्रों पर अत्याचारों का राग अलाप कर ‪#‎मनुस्मृति_जलाने‬ वालों के लिए तत्कालीन हिन्दू समाज के विषय में इस मुस्लिम इतिहासकार ने क्या देखा उसे पढ़ना नितांत आवश्यक है। वर्ष 1030 में महमूद ग़ज़नवी के समय में ‪#‎अल_बरूनी‬ क् लिखता है कि --- पारम्परिक हिन्दू समाज चार वर्णो और अंत्यज ( जो किसी जाति में नहीं आते थे) में विभाजित हुआ करता था , लेकिन उसने उच्च जातियों द्वारा नीच जातियों पर अत्याचारों का कोई ज़िक्र नहीं किया। बावजूद इसके कि चारों वर्ण एक दूसरे से भिन्न थे लेकिन वे शहरों और गांवों में एक साथ रहते थे और एक दूसरे के घरों में घुला मिला करते थे। ‪#‎अन्त्यज‬ --- आठ श्रम निकायों / शिल्पी संघ / मंडली में अपने व्यवसाय के अनुसार विभक्त थे, जो कि आपस में विवाह कर लिया करते थे --सिवाय धोबी , मोची और जुलाहों के। ये लोग चार वर्णो के शहरों और गाँवों के पास मगर बाहर रहते थे।
चारों वर्णो के खान पान के विषय में #अल_बरुनी ने देखा कि जब एक साथ खाना खाने का आयोजन होता था , तो चरों वर्ण अपना अपना अलग समूह बना लेते थे। एक समूह में दूसरे वर्ण का व्यक्ति शामिल नहीं होता था। हर व्यक्ति अपना भोजन करता था और किसी को बची हुई जूठन खाने की इज़ाज़त नहीं थी। वे एक दूसरे की थाली में बचे हुए भोजन /जूठन का भाग बांटते नहीं थे।
.http://www.columbia.edu/…/colle…/cul/texts/ldpd_5949073_001/
#हुएन_त्सांग ---- वर्ष 630 में भारत आया और 645 ई तक भारत भ्रमण किया।
(#यहाँ_पर_याद_रखें_कि_कुरान /#इस्लाम_22_दिसम्बर_609 ई को पैदा होना शुरू हुआ था और #कुरान_की_आखिरी_आयत_वर्ष_632 में मोहम्मद के मृत्यु के वर्ष में लिखवाई गयी थी। ) - समझ रहे हैं न इस्लाम नाम की गिद्ध तब तक पैदा नहीं हुई थी। उस समय हुए त्सांग ने हिन्दू समाज में क्या देखा , उसी की लेखनी के अनुसार ------" हिन्दू सरल एवं सम्मानीय हैं ....... .......पैसों के मामले में इनमे कपट नहीं है और न्याय करने के मामले में यह विचारवान हैं ........ ...... अपने आचरण में वे विश्वासघाती और धोखेबाज नहीं हैं वे अपनी शपथ और वायदों में वफादार हैं। शासकीय नियमों में इनमे अविश्वसनीय ईमानदारी है और इनके व्यवहार में शिष्टता और सौम्यता है। अपराध और विद्रोह के मामले न के बराबर हैं और कभी कभार ही परेशान करते हैं। लोगो से जबरदस्ती काम नहीं लिया जाता ....... ....... बहुत हलके किस्म के कर लगाए जातें हैं और व्यक्तिगत सेवाएं बहुत कम ली जाती है।
#फा_हियान ----- 399 ई से 412 ई तक भारत,नेपाल , बंग्लादेश तथा श्रीलंका में घूमा और हिन्दुओं के विषय में लिखा कि " वे धोखेबाजी नहीं करते और अपना दिया हुआ वचन निभाते हैं ........ ....... वे अन्याय नहीं सहते और न्याय के मामले में अपेक्षा से ज्यादा न्यायप्रिय है।
#मेगस्थेनिेज ----- 305 ई पूर्व से 298 ई पूर्व तक चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में भारत में रहा। "मैगस्थनीज़" के यात्रा वृतांत के अनुसार उस समय इसी चतुर्वर्ण में ही कई जातियाँ 1) दार्शनिक 2) कृषि 3)सैनिक 4) निरीक्षक /पर्यवेक्षक 5) पार्षद 6) कर निर्धारक 7) चरवाहे 8) सफाई कर्मचारी और 9 ) कारीगर हुआ करते थे। सत्य एवं नैतिकता को ही वे श्रेष्ठ मानते थे।
चन्द्रगुप्त के प्रधानमंत्री "कौटिल्य" के अर्थशास्त्र एवं नीतिसार अनुसार, किसी के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार की कठोर सज़ा थी। यहाँ तक की वैसे तो उस समय दास प्रथा नहीं थी लेकिन चाणक्य के अनुसार यदि किसी को मजबूरी में खुद दास बनना पड़े तो भी उससे कोई नीच अथवा अधर्म का कार्य नहीं करवाया जा सकता था।ऐसा करने की स्थिति में दास दासता के बन्धन से स्वमुक्त हो जाता था।सब अपना व्यवसाय चयन करने के लिए स्वतंत्र थे तथा उनसे यह अपेक्षा की जाती थी वे धर्मानुसार उनका निष्पादन करेंगे
#बाल्मीकि_रामायण -500 ई पूर्व किसी वर्ष में लिखी गयी थी के अनुसार ----" तस्मिन् पुरवरे हृष्टा धर्मात्मानो बहुश्रुताः। नरास्तुष्टा धनैः स्वैः स्वैरलुब्धाः सत्यवादिनः।। कामी वा न कदर्यो वा नृशंसः पुरुषः क्वचित्। द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नाविद्वान् न च नास्तिकः।। नानाहिताग्निर्नायज्वा न क्षुद्रो वा न तस्करः। कश्चिदासीदयोध्यायां न चावृत्तो न संकरः।। "(वाल्मीकिरामायणम् 1.6.6, 8, 12) अर्थात् उस श्रेष्ठ अयोध्यानगरी का असाधारण समाज था, जिसमें सभी प्रजाजन प्रसन्न, धर्मात्मा, बहुश्रुत विद्वान् थे। निर्लोभी, अपने-अपने धन से सन्तुष्ट रहने वाले और सत्यवादी थे। वहाँ कहीं कोई कामी, कंजूस, क्रूर व्यक्ति न था। न कोई मूर्ख और नास्तिक था। न ही अग्निहोत्र और पंच यज्ञ न करने वाला, न निम्न सोच वाला और चोर था। न ऐसा था जो सदाचारी न हो या वर्णसंकर हो।
अब बात कर लेते हैं ‪#‎मनुस्मृति‬ की -----वर्तमान मनुस्मृति में 2685 श्लोक पाए जाते हैं , जबकि डॉ कमल मोटवानी जिन्होंने मनुस्मृति पर शोध कार्य ,स्वामी दयानन्द ,ब्रिटिश शोधकर्ता Wooler,J.Jolly,Keith and MacDonell, Encyclopedia Americana और तमाम विद्वानों ने माना है कि मनुस्मृति की मूलप्रति में समय समय पर 1471 विरोधाभासी श्लोकों की मिलावट की गयी है। इसप्रकार 1214 श्लोको वाली मनुस्मृति को उसी प्रकार 2685 श्लोकों वाली मनुस्मृति बन दिया गया जिस प्रकार मूल महाभारत में दस हज़ार श्लोक थे और आज उपलब्ध महाभारत में एक लाख से ऊपर श्लोक हैं।
फिर भी मनुस्मृति को जलाने वाले यह क्यों भूल जाते हैं कि निम्न श्लोक भी मनुस्मृति के ही हैं ---
1) जन्मना जायते शूद्रः कर्मणा जायते द्विजः,
वेदाध्यायी भवेद्विप्रो ब्रह्म जानाति ब्राह्मण
"जन्म से व्यक्ति शूद्र होता है, कर्म-संस्कार से वह द्विज , वेदाध्ययन करने पर वह विप्र कहलाता है और जो ब्रम्ह को जनता है वाही ब्राह्मण है।
2)शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्या द्वैश्यात्तथैव च।---- अर्थात श्रेष्ठ -अश्रेष्ठ कर्मो के अनुसार शूद्र ब्राह्मण और ब्राह्मण शूद्र हो जाता है। जो ब्राह्मण ,क्षत्रिय वैश्य और शूद्र के गुणों वाला हो वह उसी वर्ण का हो जाता है।
3)यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रेता तु न पूज्यन्ते सर्वाः तत्राफलाः क्रियाः । ------अर्थात जिस कुल में नारियों की पूजा अर्थात सत्कार होता है उस कुल में (देवता) दिव्यगुण होते हैं और जिस कुल में स्त्रियों की पूजा नहीं होती वहां जानो उनकी सब क्रिया निष्फल है।
उपरोक्त इतिहास के आधार पर कोई भी कह सकता है कि जिन हिन्दू संस्कारों का बलात्कार मुसलामानों ने शुरू किया था उनका आज के ईसाई ,वामपंथी हिन्दू , नवबौद्ध और मूलनिवासी मिलकर सामूहिक बलात्कार कर रहे है।
खूब जलाओ प्रक्षेपित मनुस्मृति। कविता कृष्णन्  और उसकी माँ की तरह खूब करो फ्री सेक्स। और बरखा दत्त की तरह डंके की चोट पर कहो हाँ मेरे दो मुस्लिम पति हैं कर लो जो करना है। सही कहा है जिसने भी कहा है -------
लज़्ज़त कभी थी , अब तो फितरत सी हो गयी है।
हमको गुनाह करने की , आदत सी हो गयी है।।
http://shivashaurya.blogspot.com/2016/05/blog-post.html

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

इन्हे तो क़ुरान भी समझ नहीं आयी

मोदीजी लाख भाषण रोक लीजिए इनकी अजान के वक़्त पर , पर जो अपनी कुरान नहीं समझ सका आपकी भाषा भी नहीं समझेगा। ये ज़िन्दगी में आपके होंगे नहीं और कहीं ऐसा न हो हिन्दू भी आपके न रहें। वो  क्या कहावत है ????? धोबी का_______________ 
 आपके साथ साथ बहुतसेमुसलामानों और धर्मनिरपेक्षों ने कुरान या तो पढ़ी नहीं, अगर पढ़ी है तो समझी नहीं  इसलिए  निम्न तीनों वक्तव्यों में सामन्जस्य बिठाना उनके लिए कठिन है। 

कुछ दिनों पहले ओवैसी ने बयान दिया कि वो "भारत माता की" कि जय नहीं बोलेगा। 
आज दिनांक 2 अप्रैल 2016 के कुछ अखबारों ने मुखपृष्ठ पर खबर छापी कि " देवबंद के उलेमाओं" ने भी कहा है कि यह नारा "गैर इस्लामिक है" और साथ में छापा कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता "राशिद अल्वी" का बयान कि "मादरे वतन ज़िंदाबाद' कहने में कोई हर्ज़ नहीं है।
इनका बयानों का सम्बन्ध हम आगे समझते हैं, लेकिन उससे उससे पहले एक तथ्य और कुरान की कुछ आयतें समझ लीजिए।  
तथ्य यह कि कुरान का तर्जुमा और व्याख्या दुनिया की 65 भाषाओं में अधिकतर मुसलामानों द्वारा किया गया है। इन सबने अरबी भाषा में लिखी हुई कुरान का अनुवाद भी कर दिया और बहुत जोश खरोश के साथ बहुत तफ्सील में पूरी दुनिया को कुरान पढ़ाने और समझाने की कवायद भी कर दी। लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आया कि इन तथाकथित मुस्लिम अनुवादकों की समझ में या तो कुछ आयतें आयीं नहीं या इन्होने खुद ,खुदा की बात मानने से इन्कार कर दिया। 
नीचे कुछ आयतों का हिंदी अनुवाद ( हिन्दी में उपलब्ध कुरान मजीद, अनुवाद किया है " हज़रात मौलाना अशरफ अली थानवी रह० " ने प्रकाशक "इस्लामिक बुक सर्विस प्रा लि० , ISBN 81-7231-859-6 ) आपके लिए लिख रहा हूँ, ज़रा गौर फरमायें ----
  
सूरा 12:आयत 2 ==== हमने उसको उतारा है कुरआन अरबी ( ज़बान का) ताकि तुम समझो। 
सूरा 13: आयत 37=== और इस तरह हमने उसको इस तौर पर नाज़िल किया कि वह एक खास हुक्म है, अरबी (ज़बान में )।
सूरा 20:आयत 113 === और हमने इसी तरह इसको अरबी कुरआन (करके )नाज़िल किया है , और हमने इसमें तरह तरह से वईद "यानि सजा की धमकी और तंबीह "बयान की है , ताकि वे (सुनने वाले) लोग डर जाएँ, 
सूरा 26:आयत 195 ===साफ़ अरबी जबान में "नाज़िल किया"
सूरा 39:आयत 27 === और हमने लोगों की (हिदायत) के लिए इस कुरआन में हर किस्म के (जरूरी) उम्दा मज़ामीन बयान किये हैं, ताकि वे लोग नसीहत पकड़ें। 
सूरा 39:आयत 28 ===जिसकी कैफियत यह है कि वह अरबी कुरआन है जिसमे ज़रा सा भी टेढ़ नहीं ( और) ताकि वे लोग डरें। 
सूरा 41:आयत 3 === यह एक ऐसी किताब है जिसकी आयतें साफ़ साफ़ बयान की गईं हैं। यानि ऐसा कुरआन है जो अरबी (जबान में) है , ऐसे लोगों के लिए (नफा देने वाला है) जो अकल्मन्द हैं। 
सूरा 41:आयत 44=== और अगर हम इसको अज़मी "यानि अरबी जबान के अलावा किसी और" (जबान का) कुरआन बनाते तो यूँ कहते कि इसकी आयते साफ़ साफ़ क्यों नहीं बयान की गईं ??? यह क्या बात कि अज़मी किताब और अरबी रसूल ???? 
सूरा 42:आयत 7====और हमने इसी तरह आप पर (यह) कुरआन अरबी वह्य के ज़रिये नाज़िल किया है, ताकि आप (सबसे पहले) मक्का में रहने वालों को और जो उनके आस पास हैं उनको डराएं और जमा होने के दिन से डराएं,जिस (के आने) में ज़रा शक नहीं। एक गिरोह जन्नत में ( दाखिल )होगा और एक दोजख में होगा।  
सूरा 43:आयत 3=== कि हमने इसको अरबी जबान का कुरआन बनाया ताकि (ऐ अरब वालो) तुम (आसानी से)समझ लो। 
सूरा 46:आयत 12 ====और इससे पहले मूसा (अलैहिस्लाम ) की किताब जो राह दिखाने वाली और रहमत थी , और यह एक किताब है जो उसको सच्चा करती है, अरबी जबान में , जालिमों के डराने के लिए और नेक लोगों को खुशखबरी देने के लिए। 

पढ़ लीं आपने ऊपर की आयतें ????

अब सवाल यह उठता है कि जब खुदा ने यह आयते खास तौर पर अरब के जाहिलों के लिए "अरबी भाषा में नाज़िल की थीं , तो तुम कैसे मुसलमान हो जो इन आयतों की भाषा बदल रहे हो।  जिस खुदा ने यह दुनिया बनायीं है , 6 दिन में धरती और आसमान बनायें हैं तो दुनिया भर की भाषाएँ भी उसी ने बनायीं होंगी ??? अगर दुनिया भर की भाषाएँ उसने बनायीं तो फिर कुरान को एक खास तबके के लिए ही , एक खास भाषा में क्यों नाज़िल किया ???? या तो खुदा जनता था कि सिर्फ अरबी लोग ही जाहिल हैं और बाकि दुनिया जैसे कि भारत वालों को धर्म का ज्ञान है।  या खुदा को भारत वालों के बारे में मालूम ही नहीं था ??? 
अगर खुदा सर्वव्यापी ,सर्वज्ञानी है तो यकीनन उसे भारत और इसके सनातन धर्म के विषय में मालूम होगा, तो फिर तब के और अब के ये मुल्ले कुरान की इतनी सी बात क्यों नहीं समझ प रहे कि इस्लाम को खुद ने सिर्फ जाहिल अरबों के लिए बनाया था। ऊपर लिखी आयत भी इनकी समझ में नहीं आती जिसमे मूसा का ज़िक्र है जो तौरात लाए थे और यहूदी मज़हब चलाया था जिसे आज ये मुल्ले (इजराइल को) दुनिया के नक़्शे से मिटाना चाहते हैं। मोहम्मद ने माना था कि ईसा मसीह पैगम्बर हुए हैं तो फिर ये मुल्ले दुनिया भर में ईसा को मानने वालों को क्यों काटते घूम रहे हैं ???? खैर कुरआन में मोहम्मद और उसके बताये खुदा को न मानने वाले काफिर हैं और उन्हें जिहाद के द्वारा ख़त्म ही किया जाना चाहिए। 
अब आते हैं ऊपर दिए गए तीन बयानों पर। तलवार की नोक के सामने ओवैसी के पुरखे मुसलमान तो बन गए ,लेकिन उन्होंने कुरान किस भाषा में पढ़ी ???? जिस भी भाषा में पढ़ी उसे इतना समझ आ गया कि खुदा के अलावा किसी की जय जयकार  नहीं करनी है। इसी बात को दोहराया वहाबी इस्लाम को मानने वाले देवबंद के दारुल उलूम ने और कह दिया कि भारतमाता  की जय कहना गैर इस्लामिक है। अब आ जाइए कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता "राशिद  अल्वी " के बयान की भाषा पर " मादरे वतन ज़िंदाबाद " कहा जा सकता है। उम्मीद करता हूँ आप सब समझ ही गए होंगे कि #मादरे_वतन_ज़िंदाबाद अरबी भाषा के शब्द हैं। यह बयान उस पार्टी के नेता का है जिसने लगभग 55 साल भारत पर राज किया है, लेकिन अपनी गुलाम मानसिकता नहीं छोड़ सका। 
गुलाम कैसे ?????

1) मुसलमान इबादत अरबी भाषा में करता है। किसी और भाषा में इबादत करना शिर्क / गुनाह है और ऐसी इबादत कबूल नहीं होती। 
2) ये लोग क़िबला (मक्का/ अरब , अरबों की ज़मीन ), की तरफ मुंह करके पांच वक़्त की नमाज़ अदा करते है। जबकि खुदा हर तरफ मौजूद  है। 
3) ज़िन्दगी में धार्मिक रूप से अरब ( मक्का ) जाना इनके लिए अनिवार्य है।
4) किसी भी देश के मुसलमान और गैर मुस्लिम का ये अरब की भाषा में (अस्लाम अलैकुम / वालेकुम अस्लाम ) अभिवादन करते हैं। 
5) अपनी दैनिक बातचीत में अरब भाषा में बात बात पर "#इंशाअल्लाह और #अलमधुलिल्लाह कह कर बार बार अपनी मानसिक गुलामी का परिचय देते हैं। 
बात इतनी ही होती तो भी गनीमत थी, 9 सितम्बर 2014 का एक फतवा #Sunnipath नाम की वेब साइट पर डाला गया ( बाद में इस फतवे को इस साइट से हटा दिया गया, वर्तमान में यह साइट भी नहीं खुल रही http://qa.sunnipath.com/issue_view.asp?HD=7&ID=9427&CATE=1 ) जिसमे साफ़ साफ़ लिखा था कि "अरब के लोग गैर अरबी लोगों से ऊंचे होते हैं। इन अरब के लोगों में भी कुरैश, गैरकुरैशों से ऊपर होते हैं। कुरैशों में भी बानी हाशिम कबीले के लोग अन्य कुरैशों के ऊपर होते हैं।  विस्तार से पढ़ने के लिए इस लिंक को पढ़ें। 

तो फिर यह भारत के मुल्ले बेगानी शादी में क्यों दीवाने बने जा रहे है ????? 
वैसे बहुत बड़ा विज्ञानं का जानकार है खुदा जो कहता है -----सूरा 55 आयत 5 ----सूरज और चाँद हिसाब के साथ चलते है।    

शनिवार, 12 मार्च 2016

कन्हैया को चाहिए आज़ादी



जो भी कह गया सही कह गया -------- कुत्तों को घी हजम नहीं होता। 


कन्हैया को चाहिए आज़ादी । किस बन्धन में है। खुले में पेशाब करने पर कोई लड़की न टोके  ???? कन्हैया को आज़ादी चाहिए उस न्यायपालिका से जिसने याकूब मेमन और अफज़ल गुरु को फाँसी की सजा सुनायी। कन्हैया ,उसके साथियों और उसके प्राचार्यों को आज़ादी चाहिए उस कश्मीर की जिसे अन्य राज्यों की तुलना में अनुछेद 370 के तहत बेवज़ह की रियायतें पहले से ही मिली हुईं हैं। कन्हैया को सेना के जवान बलात्कारी नज़र आये लेकिन कन्हैया को कश्मीर में मारे जाते सेना के जवानों के कटे हुए सिर नज़र नहीं आते।  कन्हैया को 1947 से 1990 तक के कश्मीर में हुए बलात्कार नज़र नहीं आये। कन्हैया को 1990 के दशक का कश्मीरी पंडितों का अपने ही देश में रिफूजी बनना नज़र नहीं आया। उसको दांतेवाड़ा में मारे गए 78 CRPF के जवानों की मौत पर JNU में हुआ जश्न नज़र नहीं आया। देश में रोज़ सैकड़ों बलात्कार और आत्महत्याएं होतीं हैं , लेकिन कन्हैया को नज़र आया तो रोहित वेमुला। 

कन्हैया का आदर्श रोहित वेमुला है और रोहित वेमुला को अफ़सोस था कि 258 निर्दोष मुंबईवासियों की बेवज़ह मौत के गुनहगार को रात तीन बजे तक जद्दोजहद करने के बावजूद राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट ने फाँसी क्यों दे दी। लेकिन कन्हैया को निर्भया को दर्दनाक मौत देने वाले को कानून द्वारा दी गयी सिलाई मशीन और धनराशि नज़र नहीं आई। 
क्यों ?????? क्यूंकि दांतेवाड़ा में CRPF के जवानों को माओवादियों ने मार था और कश्मीर में आतंक फैलाने वाले, मुंबई पर हमला करने वाले , संसद पर हमला करने वाले और निर्भया का कातिल ये सब मुसलमान हैं।
ये देशविरोधी वामपंथी विचारधारा नयी नहीं है। कन्हैया तो बस एक गुर्गा है वामपंथी विचारधारा का। वो वामपंथी विचारधारा जो 1920 में भारत पहुंची और 1929 में इन्होने तमाम कारखानों में हड़ताल करवा दी। 1942 में गाँधी जी के भारत छोड़ो आन्दोलन के खिलाफ अंग्रेज़ों से मिल कर आंदोलन की हवा निकाल दी। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस चूँकि अंग्रेज़ों के खिलाफ थे और जापान से सहायता ले रहे थे इसलिए इन वामपंथियों की नज़र में वे देशद्रोही थे और हैं। 1962 में जब चीन ने भारत पर हमला किया और  90,000 sq km ज़मीन खो दी तो ये वामपंथी ही थे जिन्होंने चीन की तरफदारी करते हुए ये कहा था कि हमला तो भारत ने किया है। सिर्फ इतना ही नुक्सान किया होता वामपंथियों ने तो भी शायद आज का भारत बर्दाश्त कर लेता। लेकिन वामपंथी इतिहासकारों ने तो नालंदा विश्वविद्यालय के गुनहगार मीर कासिम के सारे दोष 2 ब्राह्मणों के सिर मढ़ दिए। पूरा का पूरा इतिहास ही रगड़ कर रख दिया "ARYAN INVASION THEORY " गढ़ कर। तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकार फख्र के साथ लिखते हैं कि कैसे महमूद ग़ज़नवी से लेकर औरंगज़ेब धर्मांध थे , उन्होंने लाखों लोगों का कत्लेआम किया , 40000 मंदिर तोड़े, लाखों लोगों का धर्मांतरण किया , लेकिन वामपंथी इतिहासकार पूरा जोर लगा कर शोधपत्र प्रस्तुत करते हैं कि मेहमूद से लेकर औरंगज़ेब तक किसी में धार्मिक असहिष्णुता नहीं थी। इन सब लुटेरों के कृत्य वित्तीय कारणों से प्रेरित थे। गैर मुस्लिमों पर जजिया लगाना वित्तीय कारण हो सकता है, लेकिन लाखों निर्दोष लोगों की हत्या ??? हजारों मंदिरों का तोडना और फिर उनकी मूर्तियों को मस्जिदों की सीढ़ियों में चिनवाना ???? गुरु तेग बहादुर , सम्भा जी , भाई सतीदास , भाई मतिदास, गुरु गोबिंद सिंह के बच्चों को ज़िंदा दिवार में चिनवाना, इन सबके पीछे कौन से वित्तीय कारण थे ??? इसके इतर कोई कुछ लिख देता है तो ये वामपंथी मिल कर उसे झूठा साबित कर देते हैं। 
इनका बस चले तो ये गुरु नानक देव जी को भी गलत साबित कर दें , जिन्होंने गुरु ग्रन्थ साहिब के महला 1:360 में लिखा है "#खुरासान_खसमाना_किया_हिन्दुस्तान_डराइया .........( खुरासान = अफगानिस्तान का हिस्सा , खसमाना =बर्बाद ) यानि की गुरु नानक देव जी भी यह कह रहे हैं कि खुरासान को बर्बाद करने के बाद हिन्दुस्तान को डराया। ऐसे ही महला 1 : 417 में गुरु नानक देव जी कहते हैं कि , नमाज़ के वक्त हिन्दू पूजा नहीं कर सकते थे , वे तिलक नहीं लगा सकते थे और नहा नहीं सकते थे, और जिसने ज़िन्दगी भर राम का नाम नहीं लिया वो खुदा खुदा करके भी नहीं बचता था। पर आज के इतिहासकार लिखते हैं कि अफगानिस्तान में फैला हुआ बौद्ध धर्म "ब्राह्मणों" ने बर्बाद किया। 
वैसे तो अव्यवहारिक वामपंथ का जनक कार्ल मार्क्स था लेकिन जिसभारत और हिन्दू धर्म को बर्बाद करने वाले ( कृपया मेरी कल पोस्ट की गयी, वृंदा करात वाली 32 सेकंड की वीडियो देखें ) वामपंथ के समर्थक ये भारतीय हैं उसका असली जनक लेनिन था और स्टालिन तथा माओ जिसके पोषक थे यदि उनके वामपंथ के विषय में न लिखा तो ये पोस्ट अधूरी रह जाएगी। 
1917 में रूस में लोकतान्त्रिक तरीके से सरकार चुनी गयी और 1918 में लेनिन ने उसे गिरा कर एकल पार्टी की सरकार बना दी। जिन लाखों लोगों ने इसका विरोध किया उन्हें लकड़ी के लट्ठों से बांध कर आग की भट्टी में जलने के जिन्दा डाल दिया , उन्हें आरे से कटवा दिया , दस्ताने बनाने के लिए उनके हाथ काट दिए गए , उन्हें सूली पर चढ़ाया गया, उनसे गहरी गहरी कब्रे खुदवा कर उसी में दबा दिया गया , सड़कों पर उन्हें नंगा करके उनपर तब तक ठण्डा पानी डाला जाता था जबतक वे बर्फ के पुतले नहीं बन जाते थे, लोहे के डिब्बों में छेद करके उसमे चूहा रख कर पेट पर बांध दिया जाता था और फिर डिब्बे को तब तक गर्मी करते थे जबतक चूहा शरीर काट कर बहार नहीं निकल जाता था। आदमियों को जबरदस्ती गिरफ्तार कर लिया जाता था और तब तक नहीं छोड़ा जाता था जब तक उनके घर की महिलायें अपना यौन शोषण नहीं करवा लेतीं थीं। इस तरह लगभग मात्र एक लाख चालीस हज़ार विरोधियों को खत्म किया गया। चर्चों और मस्जिदों से बस 70000 पादरियों और मौलवियों को गुलामी कैम्प में भेज कर अत्यंत निकृष्ट हालात में गुलामी करवाई गयी फिर मई 1922 में लेनिन के एक लाइन के आदेश पर सिर्फ बीस हज़ार गुलामों को मार दिया गया। लेनिन के आदेश पर इन क्रूर हत्याओं के औचित्य को लेनिन का दाँया हाथ कहा जाने वाला ----"Grigory Zinoviev " कहता है कि " अपने विरोधियों पर काबू पाने के लिए हमारे पास अपनी साम्यवादी सेना होनी चाहिए। हमें अपने साथ सोवियत रूस के 10 करोड़ लोगों में से 9 करोड़ लोगों को साथ ले कर चलना है। बाकि के लिए हमें कुछ नहीं कहना है , उन्हें ख़त्म ही कर दिया जाना चाहिए।  इतिहास की किताबों में आप इसे 'Red Terror" के नाम से पढ़ सकते हैं। 
वैसे तो लेनिन 21 जनवरी 1924 को खत्म हुआ लेकिन स्टालिन ने 1922 से ही अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू कर दी थी और फिर जो भी स्टालिन के  खड़ा हुआ उसको किसने मार दिया किसी को पता ही नहीं चला। अपनी पकड़ सिस्टम पर और मजबूत करने के लिए स्टालिन ने 1930 में एक नया कानून बनाया "Terrorists Organisations and Terrorists act " इसके तहत १० दिनों में कार्यवाही हिनी चाहिए थी। कोई वकील नहीं कोई सुनवाई नहीं बस तुरंत "मौत का फरमान " और इस तरह से स्टालिन ने अपने विरोधियों को कानूनी रूप से ख़त्म करना शुरू किया। सोवियत इतिहास कर बताते हैं कि 1937 में स्टालिन ने पोलैण्ड,जर्मनी और कोरिया के 3,50,000 लोगों को गिरफ्तार किया और उनमें से 247,157 को मार दिया। 1937 में उपरोक्त कानून के तहत 353074 लोगों को और 1938 में 328612 रूस के नागरिकों को क़त्ल कर दिया। इनमे कर्मचारी, किसान, अध्यापका ,सिपाही , बच्चे बुज़ुर्ग भिखारी सभी शामिल थे। 1941 से लेकर 1949 तक स्टालिन ने 33 लाख लोगों को साइबेरिया में फेंक दिया जिसमे से लगभग 14 लाख लोग ठण्ड के कारण मर गए। आधिकारिक सोवियत दस्तावेज़ों के अनुसार 1929 से 1953 तक एक करोड़ चालीस लाख लोगों को स्टालिन ने Gulag camps ( विद्रोहियों और विरोधियों के लिए बनाये गए गुलामी के कैंप) में भेजा था और 70 से 80 लाख लोगों को को या तो देश निकला दे दिया था या देश के सुदूर और कठिन इलाकों में फेंक दिया था। 
अब एक नज़र चीन के वामपंथ पर भी डाल ली जाये। 1920 -21 में ही ये मनहूस वामपंथ छें पहुँच गया था। संक्षेप में इतिहास बताता है कि रेड आर्मी से "माओ"की  पीपल्स लिब्रेशन आर्मी बनने तक चीन की सत्ता हासिल करने के लिए वामपंथियों ने तमाम लड़ाईयां लड़ीं और चीन के विरुद्ध जापान की सहायता की।  1948 में माओ के आदेश पर पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने पांच महीने तक Changchun शहर की घेराबंदी की और 160000 नागरिकों को भूखा मार दिया। 10 दिसम्बर 1949 को माओ ने चीन पर कब्ज़ा कर लिया। 1950 में चीन में वामपंथी विचारधारा को अमली जामा पहनाने के लिए "भूमि सुधार " (Land Reform) कार्यक्रम की शुरुआत हुई , जिसके तहत मो ने खुद माना कि 1950 से 1952 के बीच उसका विरोध करने वाले लगभग सात लाख लोग मारे गए जबकि अमरीकी सूत्रों का कहना है कि आठ से दस लाख लोग मारे गए थे। वैसे सरकारी नीति के तहत हर गाँव से एक ज़मींदार को शरेआम क़त्ल करना था , लेकिन कई बार एक से ज्यादा क़त्ल भी हो जाते थे इसलिए मारे जाने वालों की संख्या 20 से 50 लाख के बीच हो सकती है। इसके इलावा चालीस से साठ लाख लोगों को "Reform Through labour" कैम्प्स में भेजा गया जहाँ लगभग पन्द्रह लाख लोगों की मौत हो गयी। 
1953 में माओ ने "Hundred Flower campaign " चलायी।  इस कार्यक्रम के तहत चीन में सरकार कैसे चलायी जाये इस विषय पर माओ ने लोगों के विचार जानने की इच्छा जाहिर की। बहुत से लोगों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिलते ही वामपंथी सरकार , इसकी नीतियों और इसके नेतृत्व को नकरना शुरू कर दिया। कुछ महीनो बाद माओ ने यह कार्यक्रम बंद कर दिया और जिसने भी अपनी राय दी थी उसे मौत की नींद सुला दिया।  इस तरह सिर्फ पांच लाख लोग काल कलवित हो गए। 1958 में माओ ने "Great Leap Forward " नाम का किसानों के लिएपंच वर्षीय कार्यक्रम चलाया , जिसमे उपज नियंत्रित रखी जानी थी। इतेफाक से इस कार्यक्रम का साथ प्राकृत आपदाओं ने दिया और दसियों लाख लोग अकाल की भेंट चढ़ गए। 1962 में यह कार्यक्रम भी रद्द कर दिया गया। 1958 से 1962 के बीच मो की गलत वामपंथी नीतियों के कारन  मरे यह एक विवाद का विषय रहा है लेकिन , 1953, 1964,और 1982 की जनगणना के आधार पर अमरीका के जनसंखियिकी विशेषज्ञ " Dr. Judith Banister " का मानना है कि कम से कम 1.50 करोड़ लोग इस दरम्यान दुर्भिक्ष का शिकार हुए। 
इसके बाद चीन के इतिहास में आया बीजिंग का तिएनमैन स्क्वायर। 1976 में एक प्रोफेसर फांग लीज़ही को ,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता , मानवाधिकार, लोकतंत्र  और सत्ता के विकेंद्रीकरण के कीड़े ने काट लिया। इसने और इसकी पत्नी ने विद्यार्थियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकार पर खूब जोशीले भाषण सुनाये। बहुत कैसेट चले इसके भाषणों के और अप्रैल 1989 में लाखों विद्यार्थियों और चीन के नागरिकों  ने तिएनमैन स्क्वायरघेर लिया।  उन्हें चाहिए थी आज़ादी। आज़ादी वामपंथ से। उन्हें चाहिए थी डेमोक्रेसी।  उन्हें चाहिए थी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। जिसे 3-4 और 5 जून को चीन की सरकार ने पूरे शहर को सेना से घेर कर जब उनके उनके पिछवाड़े में डाली तो कहते हैं 3000 लोगों / विद्यार्थियों  के हलक से जान निकल गयी। 
क्यों कन्हैया कुमार, ऐसी ही रूस और चीन वाली अभिव्यक्ति की आज़ादी और मानवाधिकार चाहिए हैं न। जो भी कह गया सही कह गया -------- कुत्तों को घी हजम नहीं होता।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

Jawahar lal University

दो दिन पहले  JNU में एक नारा सुना-

"तुम कितने अफज़ल मारोगे घर-घर से अफज़ल निकलेगा"


अब हमारा नारा सुनो -

"घर-घर मे घुस कर मारेंगे, जिस घर से अफज़ल निकलेगा" -----
  
आज अगर वामपंथी भारत में देश के खिलाफ हरकतें कर रहे हैं, तो कोई नयी बात नहीं कर रहे। 1917 में रूस में पैदा हुए वामपंथ ने 1929 में भारत में मेरठ के कारखाने में हड़ताल करवा कर ( जो कि मेरठ कांड के नाम से मशहूर हुआ था ) अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था। आज का मीडिया और कोई वामपंथी यह नहीं बताएगा कि गांधीजी के "भारत छोड़ो " आंदोलन को विफल बनाने के लिए इन्होने अंग्रेज़ों के कितने तलवे चाटे थे( 150 से अधिक कागज़ी दस्तावेज़ उपलब्ध हैं , जिसमें वामपंथियों ने अंग्रेज़ों के साथ प्रतिबद्ध रहने की कसमें खायीं थीं, और भारत के स्वतंत्रता संग्राम को धोखा दिया था )। अंग्रेज़ों और जवाहर लाल नेहरू की रहमत का नतीजा ही था कि आज़ादी के बाद ये वामपंथी महत्वपूर्ण संस्थानों में उच्च पद पाने में सफल रहे। 
जवाहर लाल नेहरू से याद आया कि विषय तो जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी है।   



14 अक्टूबर 2014 को एशिया के मानवाधिकार आयोग ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की जिसकी हैडलाइन थी --- “INDIA: Raid of Forward Press office is attack on freedom of expression”जिसमे "फॉरवर्ड प्रेस" नाम की दलित पत्रिका के अक्टूबर 2014 के अंक को तथा महिषासुर शहीदी दिवस को JNU में प्रतिबंधित करने के लिए दिल्ली  पुलिस की भर्तस्ना की गयी थी। फॉरवर्ड प्रेस के उस अंक को पुलिस ने 9 अक्टूबर को इसलिए जब्त किया था क्योंकि माह अक्टूबर के उस अंक में फॉरवर्ड प्रेस ने "माँ दुर्गा " का बहुत ही अश्लील चित्र उस अंक में छापा था। पत्रिका के ज़ब्त होते ही JNU प्रशासन ने महिषासुर शहीदी दिवस मनाने की अनुमति को रद्द कर दिया।  बात न तो यहाँ से शुरू होती है और न ही यहीं पर खत्म होती है। 
इसके बाद SFI के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार पिंडिगा अम्बेडकर ने छद्म नाम से कावेरी हॉस्टल का मेस हॉल "Cultural ReInterpretation " पर चर्चा के लिए बुक कर लिया। इस Cultural reinterpretation में चर्चा का विषय था " क्या दुर्गा एक सेक्स वर्कर थी "------- कुछ BA के छात्रों ने होंसला दिखा कर इसका विरोध किया तो , उन्हें , माँ दुर्गा और हिन्दू धर्म को गलियों का सामना करना पड़ा , लेकिन बात बढ़ गयी और पुलिस के हस्तक्षेप के बाद यह कार्यक्रम भी स्थगित हो गया। 2009 में शुरू हुए महिषासुर शहीदी दिवस का इस तरह JNU में अंत हुआ। इससे पीछे चलें तो 2001 से पहले JNU में दुर्गा पूजा का आयोजन नही किया जा सकता था। बाहर की दुर्गा पूजा में सम्मिलित हो कर आये छात्र वामपंथियों और डर से अपने तिलक मिटा देते थे और कलावा उतार का यूनिवर्सिटी में दाखिल होते थे।  2001 की JNU की दुर्गा पूजा में मूर्तियों और हवन कुण्ड तोड़ने के लिए वामपंथी छात्रों की अगुवाई JNU के डीन M H Qureshi ने खुद की थी लेकिन इस प्रतिरोध ने एक छोटे मोटे दंगे का रूप ले लिया और डीन और वामपंथी छात्रों को वहां से भागना पड़ा। 
रमज़ान , ईद और क्रिसमस तो JNU में बहुत शोखी से मनाई जाती है , लेकिन वो कौन सा हिन्दुओं का त्यौहार है जिस पर वहां के वामपंथी विद्यार्थी संगठन अभद्र पोस्टर और पैम्फलेट छाप कर इन त्योहारों का विरोध नहीं करते। अरबी और उर्दू भाषा को तो बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है , लेकिन संस्कृत के विद्यार्थी उपहास का पात्र बनते हैं। दलित,मूलनिवासी, Aryan Invasion Theory , मुग़ल आक्रान्ताओं का महिमामंडन , रामजन्मभूमि पर भगवान राम का मंदिर कभी था ही नहीं , ये सभी मुद्दे JNU के इतिहासकारों के दिए हुए ही हैं। 
और अब , जब अफज़ल गुरु इनका हीरो हो गया, कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा होना चाहिए और पाकिस्तान ज़िंदाबाद हो गया तो मैं यही कहूँगा कि   -------जाति नाम पर बहस करने वाले , धर्म के नाम पर बहस करने वाले या सहिष्णुता को मुद्दा बनाने वाले, अफज़ल गुरु, मकबूल बट और याकूब मेमन की फांसी से आहत उसके खिलाफ आवाज़ उठाने वाले या अपने आप को प्रगतिशील कह कर सिर्फ हिन्दू धर्म में खामियां ढूँढने वाले लोग जब पिट जाते हैं तो अपने मौलिक अधिकारों की दुहाई देने लगते हैं। टीवी एंकर बहुत ज्ञान की बातें करके उनके मौलिक अधिकारों के हनन की घुट्टी पिलाने लगते हैं। अंग्रेजी अखबारों की मानसिकता देखिये, बजाये कि JNU को गलत ठहराने की बजाये , गृहमंत्री और मानव संसाधन मंत्री को ही अपने सम्पादकीय कॉलम में कटघरे में खड़ा कर रहे हैं।  मीडिया वाले यह तो सब बताते हैं कि भारतीय संविधान ने हर नागरिक को 6 मौलिक अधिकार दिए हैं कानून के मूर्धन्य विद्वान बहस के दौरान यह कभी नहीं कहते कि इन सब अधिकारों की सीमायें भी हैं। 
और यह भी कोई नही बताता कि इन अधिकारों के साथ साथ संविधान में 10 मौलिक कर्तव्यों के ऊपर पूरा का पूरा एक अध्याय दिया हुआ है। अपने अधिकार मांगना तो रोहित भी जानता है, मायावती भी जानती है और याकूब मेमन के वो वकील भी जानते हैं जिन्होंने रात को ढाई बजे सर्वोच्च न्यायालय की पीठ को फांसी रोकने के लिए जगाया था, लेकिन कभी अपने मौलिक कर्तव्यों की बात भी कर लिया करो। 
किसको दोष दें ??? आज की शिक्षा पद्धति को, जिसमे बच्चों को उनके कर्तव्यों से वाकिफ नहीं कराया जाता ??? या इस शिक्षा पद्धति को तैयार करने वाले वामपंथियों को , जिनके लिए सिर्फ भारत में मस्जिद धर्मनिरपेक्ष और मंदिर साम्प्रदायिक होता है , इमाम धर्मनिरपेक्ष और साधु-संत साम्प्रदायिक होते होते हैं , मुस्लिम लीग और AIMIM (ओवैसी ) धर्मनिरपेक्ष है और आरएसएस साम्प्रदायिक है , वन्दे मातरम साम्प्रदायिक है और अल्लाह हो अकबर धरनिरपेक्ष है , प्रवीण तोगड़िया साम्प्रदायिक है ,आज़म और बुखारी धर्म निरपेक्ष हैं ,जहाँ बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी सांप्रदायिक है और जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी , अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जामिआ मिलिया इस्लामिया धर्मनिरपेक्ष हैं, जहाँ बहुसंख्यकों की भावनाओं की बात करना साम्प्रदायिक हैं और मुस्लिमों और ईसाईयों की बात करना धर्मनिरपेक्षता है। 
इन सब घटनाओं के चलते ,JNU प्रशासन से भारत का एकलुटे हुए करदाता और एक पिटे हुए नागरिक होने की हैसियत से एक सवाल करना चाहता हूँ ---------

तू इधर उधर की न बात कर , ये बता रस्ता किसने रोका। 
मुझे रहजनी का गिला नहीं , तेरी रहबरी का सवाल है। 
                   (रहजनी --लूटना , रहबरी --- मार्गदर्शन )

शनिवार, 30 जनवरी 2016

कैसे बदला गया भारत का इतिहास पढ़िए इसकी एक बानगी --------

सुराख़ तो कश्ती में ख़ुद उसने ही किया था। 
जिससे तुम्हें उम्मीद थी पतवार भी देगा। 

कैसे बदला गया भारत का इतिहास पढ़िए इसकी एक बानगी --------

पश्चिम बंगाल सेकेंडरी बोर्ड का पाठ्य पुस्तकों सम्बन्धी (बंग्ला भाषा में) शासनादेश संख्या Syl /89 /1 तिथि 28 अप्रैल 1989 , जिसे पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त सभी सेकण्डरी स्कूलों के प्रधानाचार्यों को सम्बोधित किया गया था ----- इसकी शुरुआत कुछ इस तरह थी ," बोर्ड द्वारा संस्तुति की गयी कक्षा 9 की इतिहास की पुस्तकों में मध्यकालीन इतिहास में विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा के उपरान्त निम्न संशोधन किये जाने का निर्णय किया गया है।कक्षा 9 की इतिहास की पुस्तकों के लेखकों एवं प्रकाशकों को यह सुझाव दिया जाता है यदि उनके द्वारा प्रकाशित पुस्तकों में ये #अशुद्धियाँ हैं तो भविष्य में छपने वाले संस्करणों में उन्हें संशोधित कर लें तथा वर्तमान संस्करणों में इन अशुद्धियों का शुद्धिपत्र (corrigendum) छापें। शुद्धिपत्र (corrigendum) के साथ इन पुस्तकों की एक प्रति Syllabus Office 74 रफ़ी अहमद किदवई मार्ग , कलकत्ता -16 में प्रस्तुत की जाए। ------हस्ताक्षर ---चट्टोपाध्याय , सेक्रेटरी।  
इस शासनादेश के साथ कुछ पन्ने और थे जिनमे दो कॉलम बने हुए थे। एक कॉलम का शीर्षक था अशुद्धो ( अशुद्धि ) और उसके सामने/ बगल वाले कॉलम का शीर्षक था शुद्धो (शुद्धि)
1) पुस्तक -- "भारत कथा" , ---बर्दवान एजुकेशन सोसाइटी एवं टीचर्स एंटरप्राइज द्वारा लिखी तथा सुखोमोय दास द्वारा प्रकाशित। 
 पृष्ठ 140 --अशुद्धो ---- सिंधुदेश में अरब हिन्दुओं को काफिर नहीं कहते थे और उन्होंने गौवध पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। 
शुद्धो ---- "उन्होंने गौवध पर प्रतिबन्ध लगा दिया था" ---- को हटा दिया जाये। 
पृष्ठ 141 --अशुद्धो --"चौथे, हिन्दू मंदिरों को बलपूर्वक तोडना आक्रामकता की अभिव्यक्ति था। पांचवें, हिन्दू महिलाओं से जबरदस्ती विवाह करके उन्हें मुस्लिम बनाना उलेमाओं की रूढ़िवादिता का प्रचार करने का एक तरीका था। 
शुद्धो -----जबकि ,अशुद्धो कॉलम में "चौथे" शब्द  से वाक्य शुरू था, लेकिन शुद्धो कॉलम में दुसरे से लेकर पांचवें तक सभी बिंदु हटा देने का निर्देश था। 
पृष्ठ 141 --- अशुद्धो --- तार्किक, दार्शनिक और भौतिकवादी मुतज़िल्ला खत्म हो गए। दूसरी तरफ रूढ़िवादियों की सोच कुरान और हदीस पर आधारित थी। 
शुद्धो ------ दूसरी तरफ रूढ़िवादियों की सोच कुरान और हदीस पर आधारित थी। -----हटा दिया जाये। 

2)पुस्तक ---भरतवषर इतिहाश --- लेखक -- डा नरेन्द्रनाथ भट्टाचार्य , प्रकाशक चक्रवर्ती एंड संस। 
अ) पृष्ठ 89 ----अशुद्धो --- "सुलतान महमूद ने कत्लेआम,लूटपाट ,विध्वंस और धर्मांतरण के लिए ताकत का इस्तेमाल किया। 
शुद्धो --- महमूद ने लूटपाट की और विध्वंस किया। ( कत्लेआम और जबरन धर्मान्तरण का ज़िक्र गायब कर दिया गया )
पृष्ठ 89 ---- अशुद्धो --- उसने सोमनाथ मंदिर से दो करोड़ दिरहम के बराबर कीमत का सामन लूटा और शिवलिंग को गज़नी की मस्जिद की सीढ़ी में चिनवा दिया। 
शुद्धो ----" शिवलिंग को मस्जिद की सीढ़ी में चिनवा दिया" ---- को हटा दिया जाये। 
पृष्ठ 112 -----मध्यकाल में हिन्दू मुस्लिम सम्बन्ध बहुत संवेदनशील एवं गंभीर मुद्दा थे। इस्लाम में विश्वास न रखने वालों को या तो इस्लाम कबूल करना पड़ता था या मौत को। 
शुद्धो ---- पृष्ठ 112 एवं 113 को सम्पूर्ण हटा दिया जाये। 
पृष्ठ 113 -- मुस्लिम कानून के अनुसार काफिरों को मौत या इस्लाम में से एक को चुनना होता था। सिर्फ हनफ़ी काफिरों को जज़िया की एवज़ में ज़िन्दगी देते थे। 
शुद्धो ---- निम्न पंक्तियों को ऐसे लिखें " अलाउद्दीन ख़िलजी को जज़िया डी कर हिन्दू एक आम ज़िन्दगी जी सकते थे। " बाकि के सभी वाक्य हटा दिए जाएँ। 
3 )पुस्तक --- भारुतेर इतिहाश -- लेखक --शोभांकर चट्टोपाध्याय ,प्रकाशक --- नर्मदा पब्लिशर्स। 
पृष्ठ---181 --अशुद्धो -- हिन्दू महिलाओं को मुसलमान न देखें इसलिए उन्हें घर के अंदर रहने के लिए कहा जाता था। 
शुद्धो ---- इसे हटा दिया जाये। 
4) पुस्तक ---इतिहाषेर कहानी ,लेखक--- नलिनी भूषण दासगुप्ता ,प्रकाशक ---- बी बी कुमार 
पृष्ठ 132 ---- अशुद्धो --राजस्थानी इतिहास के मशहूर इतिहासकार "Todd " के अनुसार अल्लाउद्दीन का चित्तौड़  आक्रमण राणा रतन सिंह की बेहद खूबसूरत पत्नी पद्मिनी को हथियाना था। 
शुद्धो ---- इसे हटा दिया जाये। 
पृष्ठ 154 --- जैसा कि इस्लाम का आदेश था , काफिरों के पास तीन विकल्प थे , इस्लाम में धर्मांतरण कर लो , जज़िया दो या मौत कबूल कर लो। इस्लामिक स्टेट में काफिरों को इन तीन में से एक विकल्प चुनना होता था। 
शुद्धो ---- इसे हटा दिया जाये। 
पृष्ठ 161 --- पहले के सुलतान इस्लाम का शासन फैलाने के लिए जबरन हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन करने के लिए बहुत उत्सुक रहते थे। 
शुद्धो ---- इसे हटा दिया जाये। 
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इन पुस्तकों, अशुद्धियों और शुद्धियोँ की फेहरिस्त बहुत लम्बी है , लेकिन फिर भी दो और बहुत अहम #अशुद्धियाँ जो किताबों से हटायीं गयीं उन्हें यहाँ पर लिखना अहम समझता हूँ। 
पुस्तक ----भारुतेर इतिहाश,लेखक ---पी मैती ,प्रकाशक श्रीधर प्रकाशिनी। 
पृष्ठ 139 ---अशुद्धो ---उस समय कुलीन वर्ग की श्रेष्ठता दर्शाने के लिए पर्दा प्रथा थी , इसलिए उच्च वर्ग की हिन्दू महिलाओं ने इसे उच्च वर्ग की मुस्लिम महिलाओं से इस प्रथा को अंगीकृत किया। एक अन्य मत के अनुसार पर्दा प्रथा हिन्दू महिलाओं को मुसलमानों से बचाने के किये शुरू की गयी। संभवतः इन दोनों कारणों से पर्दा प्रथा का प्रचलन शुरू हुआ। 
शुद्धो ---- इसे हटा दिया जाये। 
पुस्तक ---स्वदेशो शोभ्यता , लेखक --- डा. पी के बसु ,तथा एस बी घटक , प्रकाशक ---अभिनव प्रकाशन 
पृष्ठ 145 ---इसके अतिरिक्त क्योंकि इस्लाम ने भारत में अपने को स्थापिति करने के लिए बहुत ही चरम अमानवीय तरीके अख्तियार किये थे इसलिए ये इस्लामिक और भारतीय संस्कृति के करीब आने में एक बहुत बड़ी बाधा बने। 
शुद्धो ---इसे हटा दिया जाये।    
  
( Excerpts from --- Eminent Historians, Their Technology,Their Line , Their Fraud By Arun Shourie. Publisher Rupa & Co.)

23 अगस्त 2015 को एक मित्र @Gaurav Paradkar ने एक  सवाल पुछा था कि स्कूलों में वही सब कुछ हिन्दू ,मुस्लिम और ईसाई बच्चों को पढ़ाया जाता है, तो फिर मुस्लिम और ईसाई अपने धर्म के प्रति कट्टर और हिन्दू बच्चे सेक्युलर क्यों हो जाते हैं ????? या 
मैंने अपनी पिछली पोस्टों में बहुत संक्षेप में वर्तमान और मुगलकाल के इतिहासकारों के द्वारा लिखे गए इतिहास की तुलना करके यह बताने की कोशिश की है  कि कैसे वामपंथी इतिहासकार वैदिक धर्म और संस्कृति को विद्रूप कर रहे हैं और इस्लाम और ईसाईयत कैसे शांतिप्रिय और मानवता से लबरेज़ मज़हब हैं।  मोहम्मद और ईसा मसीह के उतरने से पहले तो सब लोग जाहिल और जंगली थे खासतौर पर उस भारतवर्ष के जो कि तथाकथित जाहिलता के चलते सोने की चिड़िया कहलाता था। 
वामपंथी इतिहासकारों ने तो भारतीय इतिहास की जो भी माँ और बहिन @#$%, वो अपनी जगह है लेकिन बहुत कम लोगों ने गौर किया होगा कि जो इतिहास 50 और 60 के दशक में पढ़ाया जाता था , बच्चों को वो इतिहास आज नहीं पढ़ाया जाता। CBSE बोर्ड के दंसवी के छात्रों को जज़िया और पद्मिनी का जौहर नहीं पढ़ाया जाता। ICSE की सातवीं कक्षा में Social Science का पहला अध्याय क्रिश्चियनिटी है। खुद पढ़ कर देख लीजिये , यही पढ़ाया जाता है कि यह बहुत ही शांतिप्रिय और भाईचारे का मज़हब। दूसरा अध्याय पढ़ाया जाता है--- शांति का मज़हब इस्लाम और पैगम्बर मोहम्मद तो बिलकुल शांति की प्रतिमूर्ति थे। तीसरा अध्याय है भारतीय संस्कृति,और पढ़ाया जाता है कि कुप्रथाओं से भरी हुई बहुत ही बुरी थी भारतीय संस्कृति, जाति प्रथा , बालविवाह, कन्या हत्या , सतीप्रथा ,पर्दाप्रथा कौन सी बुराई वैदिक संस्कृति में नहीं पढ़ाई जाती बच्चों को।
CBSE बोर्ड की कक्षा 10 की सोशल साइंस की वर्तमान पुस्तक में  अध्याय है Nationalism In India , भारत की आज़ादी की लड़ाई पढाई गयी है इसमें। भगत सिंह , चंद्रशेखर आज़ाद , खुदीराम बोस सरीखों का नाम आप लोग पता नहीं कैसे याद करते है, पृष्ठ संख्या 53 से 69  तक मुझे तो यह नाम कहीं नहीं दिखे।  और जिनके सिर पर आज़ादी की लड़ाई का सेहरा बांधा गया है इन 16 पन्नों में वो नाम हैं ---- महात्मा गांधी , मोहम्मद अली , शौकत अली ( खिलाफत मूवमेंट वाले ),बाबा रामचन्द्र, अल्लुरी सीता राम राजू , सी आर दास, मोतीलाल नेहरू ,जवाहरलाल नेहरू ,सुभाषचन्द्र बोस,अब्दुल गफ्फार खान ,पुरुषोत्तमदास , जी डी बिरला , जिन्ना, अम्बेडकर और एम आर जयकर। 
अगर इन 10वीं  बच्चों को फेल करना है तो इनसे बहुतै साधारण सा सवाल कर लीजिये ----लाल, बाल और पाल कौन थे ??????? बाकि राजगुरु,सुखदेव, ऊधम सिंह , मदन लाल ढींगरा ,बाघा जतीन, और सावरकर तो इतिहास के किन पन्नों में खो गए 10 साल बाद हमें और आपको भी याद नहीं रहेगा।  

1972 से शुरू हुआ बच्चों को मनगढंत भारतीय इतिहास पढने की परंपरा  , 1972 में इन
सेकुलरवादियों ने भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का गठन कर इतिहास पुनर्लेखन की 
घोषणा की, ( इस विषय पर मैं अपनी पिछली पोस्ट में संक्षेप में लिख चूका हूँ ) सुविख्यात 
इतिहासकार यदुनाथ सरकार, रमेश चंद्र मजूमदार तथा श्री जीएस सरदेसाई जैसे सुप्रतिष्ठित इतिहासकारों के लिखे ग्रंथों को नकार कर नये सिरे से इतिहास लेखन का कार्य शुरू कराया गया।घोषणा की गई कि इतिहास और पाठ्यपुस्तकों से वे अंश हटा दिये जाएंगे जो राष्ट्रीय एकता में बाधा डालने वाले और मुसलमानों की भावना को ठेस पहुँचाने वाले लगते हैं।
डा. नूरूल हसन ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भाषण करते हुए कहा- महमूद गजनवी औरंगजेब आदि मुस्लिम शासकों द्वारा हिन्दुओं के नरसंहार एवं मंदिरों को तोड़ने के प्रसंग राष्ट्रीय एकता में बाधक है अत: उन्हें नही पढ़ाया जाना चाहिए।
वामपंथियों ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महान सेनानी स्वातंत्रवीर सावरकर पर अंग्रेजों से क्षमा मांगकर अण्डमान के काला पानी जेल से रिहा होने जैसे निराधार आरोप लगाये और उन्हें वीर की जगह कायर बताने की धृष्टता की।
इतिहास लेखकों के ऊपर कोई सेंसर बोर्ड नहीं है, ये जो चाहे लिख सकते हैं, और हम तथा हमारे बच्चे इनके लिखे हुए विकृत और असत्य लेखों को दिमाग की बत्ती बंद करके पढते रहते हैं, जब हम इनको पढते रहते हैं, तब हमारा सरोकार सिर्फ इतना रहता है कि बस इसका रट्टा मारो और परीक्षा के दौरान कॉपी पर छाप दो जिससे अच्छे नम्बर आ जाएँ, लेकिन हम ये भूल जाते हैं, हम जो पढते हैं, उसकी छवियाँ और दृश्य साथ साथ दिमाग में घर बनाते रहते हैं, जिसका नतीजा ये होता है कि अगर इन्होंने राम और महाभारत को काल्पनिक लिख दिया तो हम भी उसे काल्पनिक मानकर अपनी ही संस्कृति और परम्पराओं से घृणास्पद दूरी बना लेते हैं। 
कहाँ तक लिखें और क्या क्या लिखें बस पोस्ट के अंत में वामपंथी इतिहासकारों , वामपंथी सरकारों और वामपंथी मीडिया से यही कहूँगा ------------

बेहतर यही है इसपे न मरहम लगाईये। 
इस दास्ताने दर्द का कुछ तो निशां रहे।। 

मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

25 दिसंबर ही क्यों ????

खुशियाँ मानाने के कोई भी बहाने हो सकते हैं। अपने प्रिय का या अपने अराध्य का जन्म दिन तो फिर एक खास वजह बनता है सबके साथ खुशियां मनाने का। और अगर जन्मदिन की तारिख न मालूम हो तो फिर तो 365 दिनों में से कोई भी दिन तय करके जन्मदिन मना लिया जाये,कोई हर्ज़ थोड़े ही है। 
यही हो रहा है विश्व भर में ,जब 25 दिसंबर को ईसा मसीह का जन्म दिन मनाया जाता है। पोप बेनेडिक्ट ने नवम्बर 2012 में अपनी पुस्तक ---  "Jesus Of Nazreth: The Infancy Narratives" के तीसरे संस्करण में यह माना कि ईसा मसीह 25 दिसंबर को पैदा नहीं हुए थे।  ऐसा नहीं है कि यह बात पहली बार कही गयी या कोई नया खुलासा था  इससे पहले भी बहुत लोग ईसाई धर्म के प्रवर्तक की जन्मतारीख पर प्रश्न चिन्ह लगा चुके है। सबके अपने अपने मत है। जैसे कि जो बाइबिल को आधार मान कर 25 दिसम्बर को गलत ठहराते हैं , उनके हिसाब से बाइबिल के अध्याय लूकस 1:13 में जिब्राइल ने एक बहुत बूढे पुजारी ज़केरियस को पूजा के बाद आशीर्वाद दिया कि तुम्हारी पत्नी एलिज़ाबेथ को एक पुत्र प्राप्त होगा। इतिहासकारों के अनुसार ज़केरियस  की पूजा करने की तिथियाँ जून 13-19 थीं। ( उस समय पूजा करने के लिए ,मन्दिर में पुजारियों की महीनों में पाली लगा करती थी) (The Companion Bible -1974, Appendix 179, p. 200)। इतिहासकारों के अनुसार एलिज़ाबेथ ने यदि जून के अन्त तक गर्भाधान किया तो उनके पुत्र का जन्म मार्च में हुआ। इसी के आगे बाइबिल कहती है कि जब एलिज़ाबेथ 6 महीने की गर्भवती थी तब जिब्राइल ने मरियम को भी आशीर्वाद दिया कि उस कुवाँरी को पुत्र पैदा होगा (लूकस 1:26) । इस हिसाब से ईसा का जन्म सितम्बर में होना चाहिए। 
बाइबिल में ही दो अन्य विरोधाभासी तथ्य कहे गए हैं ---
1) ईसा के जन्म के समय गड़रिये रात में खेतों में खुले में भेड़ों पर निगरानी कर रहे थे (लूकस 2:8
2)और उस समय राजा कैसर अगस्तस ने समस्त जगत की जनगणना की राजाज्ञा निकली थी (लूकस 2:1) --- 
ये दोनों घटनाएँ ,बेथलहम की भौगोलिक परिस्थितियों के हिसाब से दिसंबर में सम्भव नहीं हैं क्योंकि वहां पर दिसम्बर माह में बहुत अधिक ठण्ड पड़ती है, इसलिए ऐसे में न तो गड़रिये रात में खुले आसमान के नीचे रह सकते थे और न ही ऐसे मौसम में जनगणना ही संभव थी।  
बाइबिल के अतिरिक्त पहली और दूसरी शताब्दी के ईसाई लेखकों इरेनॉएस (c. 130–200) या तेरतुल्लियन  (c. 160–225) ने भी जन्मतिथि का कोई उल्लेख नहीं किया। बल्कि अलेक्सेंडरिआ के ओरिजन  (c. 165–264) ने तो रोम के लोगों का जन्म दिन मनाने पर मूर्तिपूजक कह कर मज़ाक तक उड़ाया था। इतिहासकारों का मानना है कि यहाँ तक ईसा मसीह का जन्मदिन नहीं मनाया जाता था।  लगभग वर्ष 200 C.E में  Clement of Alexandria के अनुसार बहुत से ईसाई समूहों ने जन्म तिथियाँ  निर्धारित कीं लेकिन 25 दिसम्बर किसी ने भी निर्धारित नहीं की थी। 
Clement के अनुसार बहुत से लोगों जन्मवर्ष के साथ जन्मतिथि का निर्धारण किया। उसके अनुसार राजा ऑगस्टस के 28 वें वर्ष के 25 वें दिन मिस्र के Pachon महीने में ( वर्तमान में प्रचलित केलिन्डर के अनुसार 20 मई ) को ईसा का जन्म हुआ था। अन्य कुछ का मत है मिस्र के Phamenoth महीने के 25 वें दिन (यानि कि 21 मार्च), कुछ अन्य का मानना है कि Pharmuthi के 19 वें दिन (यानि कि 15 अप्रैल ) कुछ और कहते हैं कि उनका जन्म Pharmuthi महीने के  24वें  या 25 वें दिन हुआ था (यानि कि 20 या 21 अप्रैल )  … 
चौथी शताब्दी आते आते 25 दिसंबर और 6 जनवरी दो मान्य तिथियाँ रह गयीं। रोम के पश्चिम के देश 25 दिसम्बर को जन्म दिन मानते थे और रोम के पूर्व के देश 6 जनवरी को जन्मदिन मानते थे। आधुनिक आर्मेनियन चर्च अभी भी 6 जनवरी को जन्मदिन मनाता है। 
एक मत यह भी है कि शीतकालीन अयनांत (Winter Solstice -- 21 दिसम्बर -- जब सूर्य दक्षिण अयनांश के चरमोत्कर्ष पर होता है और यह वर्ष का सबसे छोटा दिन होता है ) के अगले दिन संसार में प्रकाश फ़ैलाने के लिए ईसा ने जन्म लिया।  लेकिन गणना करने वालों से यहाँ भी चूक हुई और उन्होंने 21 दिसंबर की जगह 25 दिसम्बर को शीतकालीन अयनांत (Winter Solstice) की गणना कर डाली। 
कहते हैं कि Constantine ने 336 AD में पहली बार, फिर Liberius ने 354 AD में 25 दिसम्बर को ईसा का जन्मदिन घोषित किया था। 
25 दिसंबर ही क्यों ????

दरअसल ईसाई धर्म के रोम में फैलने से पहले रोम के लोग दिसंबर के अंत में Saturnalia त्यौहार (सूर्य का जन्मदिवस ) मनाया करते थे , तथा रोम के आस पास के लोग इस समय छुट्टियां मनाते थे।  इन सबके ऊपर ईस्वी 274 में रोम के राजा ने 25 दिसम्बर को "अविजित सूर्य"(Sol Invictus)  के जन्मदिवस में एक भोज का कार्यक्रम शुरू किया। तर्क ऐसा जाता है कि मूर्तिपूजकों की इसी तारिख से ईसा का जन्म दिवस मनाया जाना लगा। इस मत के अनुसार ईसाईयों ने बुतपरस्तों के बीच ईसाइयत को फ़ैलाने के लिए जानबूझ कर इन तिथियों को चुना था। यदि क्रिसमस मूर्तिपूजकों की छुट्टियों  में घुलमिल जाती है तो ज्यादा मूर्तीपूजक इन्ही छुट्टियों में ईसा को भी पूजने लगेंगे।  
सही है तोला भर श्रद्धा ,मन भर तर्कों पर भारी होती है। 
दिन और तारिख कोई भी हो, आप भी खुशियाँ  मनाईये लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि मैं पश्चिमी देशों के उन शोधकर्त्ताओं का क्या करूँ जो यह कह रहे हैं कि ईसा मसीह नाम के पैगम्बर कभी हुए ही नहीं।  

शनिवार, 5 दिसंबर 2015

एक बाबरी मस्जिद ही नहीं तोड़ी थी।

#वो तस्वीरें जो सऊदी अरब कभी दुनिया को दिखाना नहीं चाहेगा और वो प्रमाण कि मक्का  मे इस्लाम की सबसे प्राचीन और पवित्र अवशेष नष्ट दिए गए है।  
http://www.independent.co.uk/news/world/middle-east/the-photos-saudi-arabia-doesnt-want-seen--and-proof-islams-most-holy-relics-are-being-demolished-in-mecca-8536968.html   
 लेकिन भारत एक ऐसा देश है जहाँ के एक गुमनाम गांव कादलपुर में गैर कानूनी मस्जिद तोड़ने पर एक IAS ( दुर्गा शक्ति नागपाल ) को 40 मिनट में निलंबित किया जा सकता है,सोचने वाली बात है कि  उस देश में वर्तमान मुसलमानों की परदादियों के बलात्कारी के द्वारा बनवायी गयी मस्जिद को तोड़ने की हिम्मत कैसे की गयी। 
6 दिसम्बर को बाबरी मस्जिद तोड़ कर हिन्दुओं ने भीम राव आंबेडकर को उनके निर्वाण दिवस पर अनजाने में जो शानदार श्रद्धांजलि दी, अम्बेडकरजी के अनुयायी इतिहास में उसकी दूसरी नज़ीर पेश नहीं कर पाएंगे। लेकिन "जय भीम" के  साथ "जय मीम" के नारे को बुलन्द करने वाले नवबौद्धों और आंबेडकर जी के अनुयायियों ने अम्बेडकर जी का नाम मिट्टी में मिला दिया।     

 जिन "भीम राव अम्बेडकर" के नाम पर ओवैसी, नवबौद्धों और सनातन धर्म के एक विशेष वर्ग को अपने साथ जोड़ने का प्रयास कर रहा है, और जो "जय भीम" कहने वाले  ओवैसी की कमर के नीचे की मूंछों में लटक रहे हैं, मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ , न उन्होंने कभी भारत का इतिहास पढ़ा और न कभी भीम राव आंबेडकर के मुसलमानों द्वारा मंदिर तोड़ने वाले वक्तव्यों को, न अम्बेडकर जी इस्लाम और मुसलामानों के विषय में यथार्थ व्यक्त करते बयानों को।  
आज बहुत से लोग एक बाबरी मस्जिद के टूटने पर शौर्य दिवस मना रहे हैं, कुछ कुंठित मानसिकता के विदेशी टुकड़ों पर पलने वाले नवबौद्ध एक नया शगूफा छोड़ रहे हैं कि बाबा साहिब के निर्वाण दिवस को लोग शौर्य दिवस के रूप में मना कर बाबा साहिब का अपमान कर रहे है और बहुत से लोग वोट की खातिर या अपनी  वृहद मानसिकता दिखाने के लिए शर्म से सिर झुकाये बैठे हैं , कि एक मज़हबी लुटेरे द्वारा मंदिर के ऊपर बनायीं गयी एक मस्जिद तोड़ दी गयी। चुल्लू भर पानी में डूब मारना चाहिए बाद वाली दोनों श्रेणियों के लोगों को।  इतिहास के पन्ने पलटिये, मुस्लिम आक्रान्ताओं ने बीस हज़ार से ज्यादा मंदिर तोड़ कर उनके ऊपर मस्जिदें बनायीं थीं। उन ख़ास खास मस्जिदों का ज़िक्र आगे करूँगा , जो आज भी वजूद में हैं और जिनकी नींव में मंदिरों की शिलाएं और मूर्तियां दबीं है , लेकिन पहले उन नवबौद्धों को जो ओवैसी को अपना दोस्त मान बैठे हैं, भीम राव आंबेडकर जी के वक्तव्य से वाकिफ करवा दिया जाये कि इन लुटेरों द्वारा मंदिरों के तोड़ने पर  "The decline and fall of Buddhism," Dr. Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches, Vol. III, Government of Maharashtr­a. 1987, p. 229-38 में भीमराव अम्बेडकर कहते है ------
" इसमें कोई शक नहीं कि भारत में बौद्ध धर्म का पतन मुस्लिम आक्रमणकारियों के कारण हुआ। इस्लाम "बुत" का दुश्मन बन कर आया।  बुत शब्द जैसा की सब जानते हैं, अरबी भाषा में मूर्ती को कहते हैं"। जैसा कि शब्द की उत्पत्ति से जाहिर है कि मुस्लिमों के दिमाग में मूर्तिपूजा बौद्धधर्म के साथ जोड़ कर देखी गयी। मूर्तियों को तोड़ने का लक्ष्य, बौद्धधर्म को नष्ट करने का लक्ष्य हो गया। मुस्लिमों ने बौद्ध धर्म का सिर्फ भारत में ही नाश नहीं किया पर जहाँ जहाँ वे गए उन्होंने बौद्ध धर्म मिटा दिया। इस्लाम के आने से पहले , बौद्ध धर्म बैक्ट्रिया, पार्थिया ,अफगानिस्तान,गांधार , चीन तुर्किस्तान और सम्पूर्ण एशिया का धर्म हुआ करता था। मुस्लिम आक्रमणकारियों ने नालन्दा, विक्रमशिला , जगदाला ओदन्तपुरी जैसे अनेकों विश्वविद्यालयों को नष्ट कर दिया। बौद्ध विहार जो कि पूरे देश में हर जगह थे को , इन मुस्लिम आक्रमणकारियों ने मिट्टी में मिला दिया। हजारों की संख्या में बौद्ध भिक्षु नेपाल, तिब्बत और देश के बाहर भाग गए। बहुत बड़ी संख्या में बौद्ध भिक्षु मुस्लिम सेनापतियों द्वारा मरे गए। बौद्ध पुरोहिताई मुस्लिम आक्रमणकारियों की तलवार की धार से कैसे नष्ट की गयी , इसका ज़िक्र तो खुद मुस्लिम इतिहासकार करते हैं। " बौद्ध भिक्षुओं के मुसलामानों द्वारा 1197 AD  में बिहार पर आक्रमण के दौरान कत्लेआम पर एकत्रित प्रमाणों का सारांश निकलते हुए विन्सेंट स्मिथ कहता है कि ......... बहुत बड़ी मात्रा में लूटपाट करने के बाद मुंडे हुए सिर वाले ब्रह्मणों यानि की बौद्ध भिक्षुओं का कत्लेआम इतना सम्पूर्ण था कि जब विजेता ने विहारों के पुस्तकालयों में मौजूद क़िताबों को समझना चाहा तो एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला जो उन्हें पढ़ सकता था।   ....... ..... कुल्हाड़ी बिलकुल जड़ पर मारी गयी थी। बौद्ध भिक्षु मारने के फेर में इस्लाम ने बौद्ध धर्म ही ख़त्म कर दिया। भारत में बुद्ध धर्म पर आई हुई यह सबसे बड़ी विपदा थी । ( पृष्ठ 229 -238 )  
अगर इतने से तस्सल्ली नहीं हुई तो -----  Pakistan or The Partition of India’ by B.R. Ambedkar, 3rd edition, 1946: BAWS Vol. 8, 1990, Govt. of Maharashtra publication; previous name of the book: Thoughts on Pakistan ---- का पृष्ठ 301 पढ़िये। "मुस्लिमों के लिए , एक हिन्दू ( और कोई भी गैर मुस्लिम) काफिर है।  एक  काफिर (इस्लाम में विश्वास न रखने वाला ) इज़्ज़त करने लायक नहीं है।  काफिर अकुलीन होते  हैं  और उनकी कोई हैसियत नहीं होती। इसीलिए एक काफिर द्वारा शासित देश मुसलमान के लिए " दार उल हर्ब " ( यानि कि युद्ध का देश) होता है ,जिसे मुसलमानों द्वारा हर हाल में , किसी भी तरह जीत कर "दारुलइस्लाम "( यानि कि सिर्फ मुस्लमानों की ज़मीन ) में तब्दील करना होता है। इसे देखते हुए इसे प्रमाणित करने के लिए किसी और प्रमाण की आवश्यकता नहीं रह जाती कि मुस्लिम किसी हिन्दू सरकार /शासक का आदेश मानेंगे  ( या किसी गैर मुस्लिम का आदेश नहीं मानेंगे )  


इन अरबी हूश लुटेरों ने सिर्फ बौद्ध और जैन मंदिरों को ही नहीं तोडा और लूटा। कुल मिला कर बीस हज़ार से ज्यादा मंदिर तोड़े और उनके ऊपर मस्जिदें बनायीं। किन इतिहासकारों के वक्तव्य पेश करूँ ???? वर्तमान इतिहासकारों के या तत्कालीन इतिहासकारों के ,भारतीय इतिहासकारों के या विदेशी इतिहासकारों के। हिन्दू इतिहासकारों के , ईसाई इतिहासकारों के या मुस्लिम इतिहासकारों के ????  

 Histoire de l' Inde - By Alain Danielou p. 222 or A Brief History of India  में Alain Danielou (1907-1994) में फ़्रांसिसी इतिहासकार लिखता है कि--" 632 AD से जब से मुसलामानों ने भारत में आना शुरू किया, भारत का इतिहास क़त्ल, नरसंहार, लूट और बिगाड़ की एक लम्बी नीरस दास्तान बन कर रह गया। यह एक आम बात है कि अपने धर्म और अपने एकमात्र खुदा के नाम पर असभ्य जंगलियों ने पूरी की पूरी सभ्यताएं और जातियां ख़त्म कर दीं। Danielou आगे लिखता है कि --महमूद गज़नी क्रूरता और निर्दयता का एक शुरूआती उदाहरण है , जिसने मथुरा के 1018 मन्दिर मिट्टी में मिला दिए , कन्नौज शहर ध्वस्त कर दिया, सोमनाथ का वो मंदिर जो सभी हिन्दुओं की श्रद्धा का केंद्र था चकनाचूर कर दिया। उसके क्रमानुयायी भी गज़नी की तरह ही निर्दयी थे जिन्होंने हिन्दुओं के पवित्र शहर बनारस के 103 मंदिर मिट्टी में मिला दिए, उन्होंने अद्भुत मंदिरों को तोड़ दिया और भव्य महलों को उजाड़ दिया।  Danielou अंत में इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि भारत को लेकर इस्लाम की नीति एक सचेत और सुनियोजित विध्वंस की थी , हर उस चीज़ को धवस्त करने की थी जो कि पवित्र थी, सुन्दर थी और परिष्कृत थी। 
 Negationism in India: Concealilng the Record of Islam - By Koenraad Elst में इतिहासकार लिखता है कि भारत के प्रबुद्ध वर्ग का एक हिस्सा, हिन्दुओं के स्मृतिपटल से इस्लाम के शमशीरबाजों द्वारा ढाई गयी ज़ुल्म की दस्तानों को मिटाने की कोशिश कर रहा है। जबकि तत्कालीन इस्लामिक इतिहासकार हिन्दुओं के कत्लेआम, मंदिरों को ध्वस्त करने , हिन्दू महिलाओं के अपहरण और जबरन धर्मांतरण को को बहुत आनंद और गर्व के साथ बताते हैं। वे इसमें कोई शक नहीं छोड़ते कि मूर्तिपूजा का ध्वस्तीकरण मुस्लिम समुदाय को खुदा के द्वारा दी गयी आज्ञा थी।इसके बावजूद बहुत से भारतीय इतिहासकार, पत्रकार और राजनीतिज्ञ इस बात से इंकार करते हैं कि हिन्दू और मुसलामानों में कभी अदावत थी। वे बेशर्मी से इतिहास को दुबारा गढ़ते हैं और इस बात का पुरज़ोर खंडन करते हैं कि भारत में हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच कभी दुश्मनी थी, परन्तु अब भारत का एक बड़ा वर्ग और पश्चिम के लोगों ने उनके इस नकारात्मक इतिहास को पहचानना शुरू कर दिया है। ऐसे लोगों को ग़लतफहमी या मतिभ्रम से निकलना कोई सहज या रोचक कार्य नहीं है ,विशेषतौर पर तब जब इन्हे जानबूझकर पैदा किया गया है।   

What the invaders really did - By Rizwan Salim ( न्यूयॉर्क में पत्रकार )- hindustantimes.com - December 28, 1997)  में कहते हैं कि मैंने हिन्दू मंदिरों के पत्थर और स्तम्भ मस्जिदों में लगे हुए देखे हैं, जिनमें जामा मस्जिद और अहमद शाह मस्जिद अहमदाबाद में हैं, जूनागढ़ (गुजरात ) के उपरकोट किले की मस्जिद, और विदिशा (भोपाल के निकट), ढ़ाई दिन का झोंपड़ा जो की अजमेर की मशहूर दरगाह के बिलकुल नज़दीक है और वर्तमान में विवादित भोजशाला मस्जिद "धार" में (इंदौर के निकट)।यह महज़ "राजनीतिक कारणों " से नहीं है कि हिन्दू टूटी हुई अयोध्या में टूटी हुई बाबरी मस्जिद, वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा में ईदगाह पर भव्य मंदिर बनाना चाहते हैं। धर्म एवं राजनीति से प्रेरित हिन्दुओं के  राम मन्दिर , काशीविश्वनाथ मंदिर और कृष्ण मन्दिर ये मात्र तीन प्रयास एक हज़ार सालों से विदेशी लुटेरों से अपनी संस्कृति और धर्म वापिस पाने का संघर्ष है। 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद टूटने की घटना हिन्दुओं के सहस्राब्दी,भारत में धर्म केंद्रित संस्कृति और देश वापिस पाने के संघर्ष का मात्र एक प्रसंग है। इस बीच हिन्दुस्तान भर में सैंकड़ों मंदिर अपने मूलरूप और प्राचीन गरिमा को पाने के लिए  हिन्दू स्वाभिमान के जागने का इंतज़ार कर रहे हैं। "
मसीरी आलमगीरी -- राजशाही के सरकारी दस्तावेज़ में अनेकों मंदिर तोड़े जाने के आदेश और उनके क्रियान्वहं की सोचना दर्ज़ है। इसकी 2 सितम्बर 1669 की एक प्रविष्टि हमें बताती है ---" दरबार में खबर आयी कि राजा के आदेशों का पालन करते हुए उसके अधिकारीयों ने बनारस में विश्वनाथ का मंदिर तोड़ दिया है। 

India: A Concise History - By Francis Watson p. 96 में इतिहासकार लिखता है कि " उनके दिमाग में हिन्दुस्तान के मूर्तिपूजकों के खिलाफ कूट कूट कर ज़हर भरा हुआ था।  मुसलामानों ने बहुत बड़ी संख्या में प्राचीन हिन्दू मंदिरों को ध्वस्त कर दिया। यह एक ऐतिहासिक सत्य है जिसे तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों एवं अन्य लेखों ने लिपिबद्ध किया है। परन्तु बड़ी संख्या ---- सैंकड़ों नहीं कई हज़ार ---प्राचीन मन्दिर तोड़ कर पत्थरों के छोटे छोटे टुकड़ों में तब्दील कर दिए गए। भारत के प्राचीन नगरों बनारस और मथुरा,उज्जैन और माहेश्वर ,ज्वालामुखी और द्वारका में एक भी प्राचीन मंदिर अपने पुराने स्वरुप में साबुत नहीं बचा। 

मौलाना अब्दुल हय , जो कि लखनऊ के दारुल नदवा उलूम नदवातुल -उलमा के 1923 तक प्राचार्य रहे की पुस्तक " हिन्दुस्तान इस्लामी अहद में"  के अध्याय " हिन्दुस्तान की मस्जिदें " में लिखते हैं ----
1)मेरे शोध के अनुसार दिल्ली की  "कुव्वत अल इस्लाम मस्जिद" मस्जिद क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने हिजरी 587 में पृथवीराज चौहान द्वारा बनवाए गए हिन्दू मंदिर को तोड़ कर मंदिर के कुछ हिस्से को बहार छोड़ कर बनवायी। हिजरी 592 में वो जब गज़नी से वापिस आया तो शहाब्बुद्दीन गोरी के आदेश से ऐसे लाल पत्थरों से जिनका अनुकरण नहीं किया जा सकता से वृहद मस्जिद बनवायी और मंदिर के बचे हुए हिस्से को भी इसी में शामिल कर लिया  ..........( अन्य इतिहासकारों के अनुसार और यहाँ पर पुरातत्व विभाग का शिलालेख कहता है इसे बनाने के लिए 27 हिन्दू और जैन मंदिर तोड़े गए थे)*   .
2) जौनपुर की मस्जिद ------ यह मस्जिद तराशे हुए पत्थरों से इब्राहिम शर्क़ी ने बनवायी। मूलरूप से यह एक हिन्दू मंदिर को तोड़ कर गयी। यह अटाला मस्जिद के नाम से जानी जाती है। 
3) कन्नौज की मस्जिद ---- यह एक सार्वजानिक सत्य है कि यह मस्जिद एक प्रतिष्ठित हिन्दू मस्जिद को तोड़ कर बनायीं गयी। जैसा कि "गरबत निगार " में लिखा है इसे  इब्राहिम शक़ी ने हिजरी 809 में बनवाया था। 
4) इटावा की जामी मस्जिद ---- यह मस्जिद इटावा में जमुना के किनारे पर है। यहाँ पर हिन्दू  करता था जिसे तोड़ कर मस्जिद बनायीं गयी। 
5)अयोध्या में बाबरी मस्जिद -----यह मस्जिद अयोध्या में बाबर ने उस  बनवायी जिसे हिन्दू लोग रामचन्द्रजी का जन्मस्थान कहते हैं    ..... ........ सीता का यहाँ एक मंदिर था जिसमे वो रहती थी और अपने पति के लिए खाना बनाती थीं। बिलकुल इसी जगह पर बाबर ने हिजरी 963 में मस्जिद बनवायी। 
6) बनारस की मस्जिद ---बनारस की मस्जिद आलमगीर औरंगज़ेब ने बिशेश्वर मंदिर के स्थान पर बनवाया। वो मंदिर बहुत बड़ा था और  बहुत पवित्र माना जाता था। बिलकुल इसी जगह पर और उसी मंदिर के पत्थरों से उसने आलीशान मस्जिद बनवायी। प्राचीन पत्थरों को मस्जिद की दीवारों के निमार्ण में पुनः इस्तेमाल कर लिया गया। यह हिन्दुस्तान की मशहूर मस्जिदों में से एक है। 
7) मथुरा की मस्जिद ---आलमगीर औरंगज़ेब ने मथुरा में एक मस्जिद बनवायी। यह मस्जिद गोविन्द देव के मंदिर के  बनायीं जो की एक बहुत मजबूत खूबसूरत और उत्कृष्ट मंदिर था।  

मुस्लिम इतिहासकार " महमूद बिन इब्राहिम शार्की "(1440---1457) "तबकत ऐ अकबरी" में लिखता है, " कुछ समय पश्चात वो जिहाद के मकसद से ओडिसा गया, वहां उसने आसपास के क्षेत्रों पर हमला करके उन्हें उजाड़ दिया। मंदिरों को तोड़ने के बाद उन्हें मिट्टी में मिला दिया। 
मुस्लिम इतिहासकार "अब्दुल्लाह" अपनी "तारीख ए दाऊदी" में सिकंदर लोधी के विषय में लिखता है कि " वो एक अतिउत्साही मुसलमान था और उसने काफिरों पूजास्थलों के नामो निशाँ तक मिटा दिए थे। उसने मथुरा के सारे पूजास्थलों को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया था। 
25 मई 1679 --- खान ए जहाँ ,(औरंगज़ेब के विषय में) जोधपुर के मंदिरों को ध्वस्त करने बाद गाड़ियों में मूर्तियां भर कर लौटे और उन्होंने आदेश दिया कि इन मूर्तियों को जामा मस्जिद की सीढ़ियों में चुनवा दिया जाये जिससे वे पैरों के तले रौंदी जाएँ। 
"सुलतान अहमद शाही वली बहमनी " ( 1422 -1435) --- "....... वो ( अहमद शाह ) जहाँ भी जाता था आदमियों औरतों और बच्चों के बेरहमी से मौत के घाट उतार देता था। …" 
"……जब वो 20000 क़त्ल कर लेता था , तो 3 दिनों इसका जश्न मनाने के लिए रुक जाता था.……… "
1 जनवरी 1705, औरंगज़ेब ने महमूद खलील और खिदमत राय को बुलाया और " पंढरपुर " के मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश दिया , और साथ में कसाई ले जाकर मन्दिर में गौवध करने का आदेश दिया।

 रही बात बाबरी मस्ज़िद की जिसे मीर बाकी नाम के संत ने उस समय के सेक्युलर हिंदुओं की कायदे से पूजा करके, बहुत मान मनौव्वल के बाद मंदिर तोड़ कर 1527 में बनाया। 1940 से पहले के सरकारी एवं मुस्लिम दस्तावेजों में इसका नाम था " मस्ज़िद ए जन्मस्थान"। 1992 में मस्ज़िद टूटी, इस देश और पूरी दुनिया की धर्मनिरपेक्ष शक्तियों को बहुत कष्ट हुआ ( पिछले 15 दिनों में पकिस्तान में 2 मंदिर तोड़े गए, सब अखबारों में छपा पर शायद दुनिया पढ़ नहीं पायी )। लेकिन इन धर्मनिरपेक्षों के मुंह की जुबां तब कहाँ चली गयी जब खुद "सऊदी अरब" सरकार ने          " मक्का" में "मस्ज़िद अल हरम" जिसमे पैगम्बर ने पहली नमाज़ अदा की थी को गिरा दिया। तब क्यों नहीं बोले ये लोग जब वहाँ कि सरकार ने ही "मस्ज़िद अल नबावी " जहाँ पैगम्बर दफन है को गिरा दिया। क्या इन लोगों को पता नहीं चला की उस स्तम्भ( OTTOMAN and ABBASID columns) को भी गिरा दिया गया है जिसे उस जगह को चिन्हित करने के लिए लगाया गया था जहाँ से पैगम्बर ने अपनी स्वर्गयात्रा शुरू की थी। वो स्तम्भ भी गिरा दिया गया है जिस पर पैगम्बर के साथियों और उस समय के अनुयायियों के नाम लिखे हुए थे। मौलिद का घर ( house of Mawlid ) तोड़ कर शाही इमाम का घर बनाया जा रहा है। अबु बकर का घर तोड़ कर होटल हिलटन बन चुका है। अफगानिस्तान में एक हाइवे बनाने के लिए उस मस्ज़िद को तोड़ दिया गया जहाँ कभी पैगम्बर ने नमाज़ पढ़ी थी। और तो और श्रीनगर में "मुस्लिम" आतंकवादियों ने अपनी जान बचने के लिए उस प्राचीन मस्ज़िद ( दरगाह हज़रतबल)  को सुपुर्द ए खाक कर दिया जिसमे पैगम्बर का प्रतीक चिन्ह उनका "बाल" रखा हुआ था। यह कोई किस्से नहीं है, नीचे लिंक दे रही हूँ जिसमे फ़ोटो के साथ प्रमाण है और यह किसी सेक्युलर हिन्दू कि नहीं इंग्लैंड के प्रमुख समाचार पत्र " द इंडिपेंडेंट "की रिपोर्ट है।  
http://www.independent.co.uk/news/world/middle-east/the-photos-saudi-arabia-doesnt-want-seen--and-proof-islams-most-holy-relics-are-being-demolished-in-mecca-8536968.html  

 देशी इतिहासकार मानते है , विदेशी इतिहासकार मानते है। ईसाई इतिहासकार मानते है और मुसलमान इतिहासकार मानते है। तत्कालीन इतिहासकार मानते है  वर्तमान के इतिहासकार मानते हैं। तत्कालीन राजशाही के दस्तावेज़ मानते हैं और वर्तमान के पुरातत्व विभाग के सर्वेक्षण मानते हैं ----

http://ayodhyafacts.org/2014/12/01/was-there-a-ram-mandir/
बस वो नहीं मानते जिनके बाप दादों ने 400 साल पहले तलवार की धार के सामने इस्लाम को मान लिया था। अम्बेडकर जी सही कह गए हैं, किसी न यह किसी काफिर के साथ रह सकते हैं किसी काफिर की सत्ता बर्दाश्त कर सकते हैं। 


 भारत में इन मुस्लिम लुटेरों और आक्रान्ताओं के ऊपर सैंकड़ों किताबें लिखी जा चुकीं है, दसियों किताबें पढ़ने के बाद मेरा दिल Ayodhya and After - By Koenraad Elst के इस एक पैराग्राफ को पढ़ कर टूट गया  --------- "#ईसाई_इतिहास_में_किये_गए_अपने_कृत्यों_को_मान_रहे_हैं। यहाँ तक की बेल्जियम में कैथोलिक वर्ग की धार्मिक संगत में हमने इतिहास में चर्च द्वारा किये गए वीभत्स कृत्यों पर ध्यान दिया है। लैटिन अमेरिका में कोलंबस के आगमन की 500 वीं वर्षगाँठ पर चर्च के अंदर और बाहर वहाँ की सभ्यता और संस्कृति के चर्च द्वारा समूल विनाश पर चर्चा की। जर्मनी तक ने मान लिया कि उसने यहूदियों पर बहुत अत्याचार किये थे। परन्तु भारत में अविश्वसनीय स्थिति है। न सिर्फ मुस्लिम इतिहासकार बल्कि सार्वजानिक हस्तियां मुस्लिम इतिहास के सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। निष्पक्ष धर्मनिरपेक्ष  इतिहासकार भी इस्लाम द्वारा व्यवस्थित ढंग से किये गए अत्याचारों को या तो छुपाने में लगे हैं या नकारने में लगे हैं। यहाँ तक की #बहुत_से_हिन्दू_उन_अत्याचारों_को_नकार_रहे_हैं_जो_उन्हीं_के_समाज_पर_किये_गए।