शनिवार, 3 जून 2017

प्रसव का दर्द झेला माँ ने , नेग ले गयी दाई और हिजड़े ले गए बधाई।

प्रसव का दर्द झेला माँ ने , नेग ले गयी दाई और हिजड़े ले गए बधाई। 
 यदि वैदिक मान्यताओं में विश्वास रखने वाले सनातन धर्मी है तो इस लेख को पढियेगा जरूर , वर्ना जानकारी के आभाव में कदम कदम पर आप जलील होते रहेंगे और गायें कटती रहेंगी। 
मुख्य मुद्दे पर बाद में आएंगे पहले अपने पिछड़ेपन की निशानियों का छोटा सा नमूना देख लीजिये। 

नयी पीढ़ी को छोड़ दें , तो शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे जब चोट लगी होगी तो उसे गर्म दूध के साथ हल्दी न पिलाई गयी हो या चोट पर हल्दी लगा कर पट्टी न बंधी गयी हो। पूजा में अक्सर हल्दी या तो भगवान् को चढ़ाई होगी या उसका तिलक किया होगा। । यह भी कोई नहीं कह सकता कि उसने सर्दियों में कभी चाय में तुलसी की पत्तियां डाल कर चाय नहीं पी होगी या आजकल प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले "तुलसी ड्रॉप्स" का विज्ञापन नहीं देखा होगा । वैसे पहले ज़माने में घर के आँगन में तुसलीचौरा हुआ करता था और उसकी पूजा की जाती थी।
कुछ दिन पहले बड़ी अमावस को आपने महिलाओं को बरगद की पूजा करते देखा होगा , या शनिवार को बहुत से लोगों को पीपल के पेड़ के नीचे दिया जलाते देखा होगा या यह कहते हुए सुना होगा कि पीपल के पेड़ को काटने से पाप लगता है। बृहस्पतिवार को केले की पूजा करते हुए महिला या पुरुष को देख कर उसका मज़ाक भी उड़ाया होगा। 
आंवला एकादशी शायद ही कुछ लोगों को मालूम हो, लेकिन इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा का विधान बताया गया है। 
तुलसी केले नीम पीपल बरगद आंवले की पूजा कोई 1990 के दशक में तो भारतियों को बताई नहीं गयी कुछ हजार साल पहले किस रूप में बताई गयीं थीं मालुम नहीं पर आज जैसी नहीं बचीखुची है , उनको उतना ही मान लीजिये। 

भारतीय बेवकूफों का पिछड़ापन इसमें नहीं है , कि वे हल्दी का इस्तेमाल करते हैं , केले , बरगद, पीपल और आंवले को पूजते हैं। भारतियों का पिछड़ापन इसमें है कि बजाये इसके पीछे का तर्क समझ कर पूर्वजों द्वारा दिए गए इस ज्ञान और थाती को समझ कर सहेजते , बल्कि 1990 के दशक तक अपनी हीनभावना में तब तक डूबे रहे जब तक , विदेशियों ने इस बात के मर्म को समझ कर उपरोक्त इन सब चीज़ों के पेटेंट नहीं करवा लिए। 

कुछ उदाहरण दे रहा हूँ ---
बरगद का पेटेंट ---
तुलसी का एक पेटेंट नहीं करवाया गया है , कई हैं , एक का उद्धरण दे रहा हूँ ---- https://www.google.co.in/search?q=patent+of+basil&oq=patent+of+basil&aqs=chrome.0.69i59j0l2.13000j0j7&sourceid=chrome&ie=UTF-8

नीम के कई पेटेंट में से एक का उदाहरण ---
हल्दी का पेटेंट वैसे भारत ने कानूनी लड़ाई के तहत जीत लिया है , लेकिन वो स्थिति ही क्यों आयी जब किसी और देश ने इसे अपने नाम करवा लिया था ????---
पीपल के पेड़ के भी एक दो नहीं कई पेटेंट विदेशों ने करवा रखे है ,----

बासमती का पेटेंट तो बेशक भारत जीत गया हो , लेकिन ट्रेड मार्क नहीं जीत पाया ---


आंवला जिसके गुण च्यवन ऋषि बताते बताते खत्म हो गए , उसे सुंदरता के लिए अमरीका ने पेटेंट करवावा लिया --

क्या बड़ा किला फतह कर लिया अगर हल्दी और बासमती के पेटेंट कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद वापिस जीत लिए ???? लेकिन सूतियो हजारों सालों से तुम्हारी रही चीज़ को कोई कानूनी रूप से अपना बताने लगा और तब भी अन्य विषयों पर तुम्हारा अपने धर्म और संस्कृति के प्रति स्वाभिमान नहीं जगा। 
पहली रोटी गाय को और गाए को पूजने का विधान भी आज का नहीं ऋग्वेद के समय का है। बेवकूफ थे सनातन धर्म वाले जो नदियों को पूजने की बात करते थे। गणेश जी के धड़ पर हाथी का सिर लगाने पर विद्व्जन बहुत हँसतें है लेकिन जब पहली बार , मनुष्य का दिल , लिवर , किडनी बदली गयी कटा हुआ हाथ जोड़ा गया तो उसे विज्ञान और और पश्चिमी देशों का चमत्कार माना गया। भारतीय जाहिल जानवरों के अंगो के  मनुष्यों में प्रतिरोपण का अभी मज़ाक उड़ाने में व्यस्त हैं और विदेशी वैज्ञानिक इस पर काम भी कर रहे है।  जिस दिन वो सफल हो जायेंगे तो भारत के सूतिये दूर खड़े हो कर हिजड़ों की तरह तालियां बजायेंगे।

http://www.smithsonianmag.com/…/future-animal-to-human-org…/

कल से एक खबर देख कर चित्त खिन्न हो गया , जिसमे दिल्ली के हवाला व्यापारी कश्मीरियों तक पैसा पहुंचा रहे थे। क्या उम्मीद की जाए ऐसे लोगों से गाय बचाने की जिन्हे देश को मारने में कोई दर्द नहीं हो रहा है।

ग्लोबल वार्मिंग पर 2 जून को विश्व के लगभग सभी देश आज चिन्तित नज़र आये। ग्लोबल वार्मिंग के बहुत से कारणों में मीट खाना एक अहम् कारण है। अगर ये बात कोई वैक धर्म से सम्बंधित जज कहता तो पूरी दुनिया में उसका मज़ाक उड़ता ,लेकिन यह बात ऑक्सफ़ोर्ड मार्टिन स्कूल के वैज्ञानिक कह रहे हैं। न यकीन आये तो निम्न लिंक पढ़ लीजिये।  


अब चूँकि गोरी चमड़ी के विदेशी वैज्ञानिक यह कह रहे हैं तो पूरी दुनिया इसे मानेगी। लेकिन जब हमारे शास्त्रों ने प्रकृति जिसमे पेड़ पौधे , जीव जन्तु और सूर्य पृथ्वी और जल शामिल हैं , ने इसकी पूजा करने के तरीके से इन्हे बचाने का सन्देश दिया तो वो आज मूढ़मगजों के हँसी के पात्र बन रहे हैं।  
हमारे पूर्वजों ने आत्मीयता की दृष्टि से धार्मिक जामा पहनाते हुए समझाया कि गौ का संरक्षण होना चाहिए , तो किसी की समझ नहीं आया। अब अमरीकी वैज्ञानिक कह रहे हैं कि रेड मीट खाने से कैंसर के खतरा 60 -70 प्रतिशत बढ़ जाता है यह मैं नहीं कह रहा हूँ , यह कैंसर काउंसिल कह रही है ,तो भी इस ढाई इंच की जुबान के कुछ मिनटों के स्वाद के गुलाम शायद इसे नहीं छोड़ पाएंगे।

बहुत विस्तार में जाते में न जाते वैज्ञानिकों द्वारा गौ उत्पादों #पंचगव्य पर शोधपत्र का सारांश यहाँ लिख रहा हूँ ---दुनिया भर में शोध के पश्चात् गाय का दूध A 2 श्रेणी में रखा गया है। जो कि सिर्फ गायों में ही पाया जाता है , वो भी विशेषकर भारतीय गायें में। 
(A 2 Milk के विषय में अधिक जानकारी के लिए पढ़ें  https://en.wikipedia.org/wiki/A2_milk ) 

इस A 2 मिल्क को पीने मोटापे, गठिया , टाइप 1 डायबटीज़ , और बच्चों में आटिज्म की बिमारी से बचा जा सकता है। आज की तारीख में विश्व के वैज्ञानिक बिमारियों पर दवाइयों के विशेष कर एंटीबायोटिक दवाइयों के बेअसर होने के कारण चिंतित हैं। वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार अगले बीस सालों में एंटीबायोटिक दवाईयां बिकुल असर करना बंद कर देंगी। इसका विकल्प उन्होंने गौमूत्र में ढूंढा और गौमूत्र का 6896907 , तथा 6410059 नंबर का गौमूत्र का पेटेंट इसके औषधीय गुणों के कारण करवा लिया ।  These Patents have been granted for its medicinal properties, particularly as a bioenhancer, and as an antibiotic, antifungal, ant anticancer agent . ( #आइये_हम_भारतीय_गौमूत्र_का_मज़ाक_उड़ा_कर_समय_व्यतीत_करें )

पिछले वर्षों में खेती में रासायनिक खाद का बहुतायत में उपयोग होने से एक तो उनके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं और फसलों की बहुत सी बीमारियाँ भी रसायन प्रतिरोधक क्षमता पैदा कर चुकीं हैं। इन्ही बिमारियों से लड़ने के लिए भारतीय साहीवाल गाये के दूध में से Bacilus Lentimorbus  NBRI 0725 ,B. Subtilis NBRI 1205 , और B.Lentimorbus NBRI 3009 नाम के पदार्थ (Strains) अलग किये गए हैं  which have the capability to control phytopathogenic Fungi and promote plant growth under field conditions, increase tolerance for antibiotic stresses and solubilise Phosphate under abiotic conditions.

गोबर से बने उपलों या गोबर गैस द्वारा ऊष्मता एक ख़ास तापमान से ऊपर नहीं जाती है जिससे खाने के पौष्टिक तत्व अन्य साधनो पर पकाये खाने की तरह नष्ट नहीं होते। 

 रूरल डेवलपमेंट एंड टेक्नोलॉजी ( CRDT) ने IITs , ICAR ,DBT ,ICMR ,CSIR ,AAYUSH , NDRI से से शोध पत्र मांगे , जिसमे से पूरे भारत में से प्रारम्भिक रूप में आये हुए 54 में से 34 को पंचगव्य पर पारम्परिक मान्यताओं को मान्यता देने के लिए चुना गया। 
अगर अभी भी समझ नहीं आया कि गौ को क्यों पूजने के लिए कहा गया है तो 
आइये मिलकर अपनी धार्मिक मान्यताओं की धज्जियाँ उड़ाते हुए , नीम ,आंवले और पीपल के पेड़ काटें , शहर भर के गंदे नाले नदियों में मिलाएं और हर सड़क चौराहे पर गौहत्या की जाए।  बीफ पार्टी का न्योता सबको दिया जाए। गाये की पूजा और पर्यावरण की चिंता हम और आप क्यों करें। कोई अगले 20-25 सालों में जब तक हमने जीना है गायों के ख़त्म होने से कयामत तो आ नहीं जाएगी।  रही बात दूध की तो वो तो यूरिया , पानी, पेंट, डिटर्जेंट ,चीनी कास्टिक सोडा से बन कर आज भी बिकना शुरू हो गया है , 20 साल बाद गाय का मांस पचाने वाले इस प्रकार निर्मित दूध को भी पचाने लगेंगे। 



अभी आपको समझ आया ???? प्रसव का दर्द झेला माँ ने , नेग ले गयी दाई और हिजड़े ले गए का मतलब ???? बधाई प्रसव या कटने का दर्द झेला गाय ने। नेग यानि की काटने का पैसा ले गया कसाई और हिजड़े वो जो खायें और खिलाएँ गाय का मांस।
या यूँ कह लीजिये , ऋषि मुनियों ने मेहनत से ज्ञान अर्जित किया , आज के विदेशी वैज्ञानिक उसी भारतीय ज्ञान पर आधारित सभी शोध अपने नाम लिखवा रहे हैं और दवा कंपनियां कर इन्ही दवाओं पर जमकर पैसा कमा रहीं हैं।
और सबसे मज़ेदार बात बच्चे के बाप होने की दावेदारी पडोसी पेश कर रहा और पेटेंट अपने नाम लिखवा रहा है।

शनिवार, 27 मई 2017

#जो_अण्डे_चुराता_है_एक_दिन_ऊँट_भी_चुराता_है।




पिछले वर्ष जैसे ही रमज़ान का महीना शुरू हुआ , इस संग्रहालय से रमज़ान में सुबह की अज़ान और सेहरी की रस्म अदा होने लगी। यह परम्परा पिछले साल से नहीं 2012 से शुरू हो गयी थी। 2012 से 31 मई को यहाँ इस्लाम के अनुयायी बहुत बड़ी तादाद में इकट्ठे होते हैं और नमाज़ अदा करते हैं। वैसे तो यह लेख मैंने 29 मई के दिन लिखने के लिए सोचा था , लेकिन रमज़ान शुरू हो गए हैं और 29 मई कल है। 29 मई ही क्यों ????? 

नीचे जो आपको पहली तस्वीर नज़र आ रही है , उसमे मरियम की गोद में ईसा मसीह हैं , और वर्तमान के इस संग्रहालय के अन्दर का एक दृश्य है। इसी संग्रहालय के अन्दर से रमज़ान के महीने में अजान होने लगी है , सहरी  होने लगी है और इसी के अन्दर इस्तानबुल और तुर्की के मुसलामानों की ज़िद है कि वो नमाज़ पढ़ेंगे। वैसे इस ज़िद को अमली जामा पहनाने के लिए ,अक्टूबर 2013 में तुर्की की संसद में बिल भी पेश कर दिया गया जिसका मजमून इस प्रकार था कि ----
“This bill has been prepared aiming to open the Hagia Sophia – which is the symbol of the Conquest of Istanbul and which has been resounding with the sounds of the call to prayer for 481 years – as a mosque for prayers.” 
इसका लगभग तर्जुमा कहता है --- कि इस बिल को पेश करने का लक्ष्य #हेगीआ_सोफिआ को खोलने के लिए है ----जो कि इस्तानबुल जीत की एक निशानी है और जो कि 481 वर्षों से नमाज़ की आवाज़ों से गूँज रही है ----एक मस्जिद नमाज़ के लिए। 
अब इस पूरी कहानी का मजमून दो वाक्यों में समझ लीजिये। वर्ष 336 में इस्तानबुल में तत्कालीन शासक कोंस्टांटियस  ने एक चर्च बनवाया था। वक़्त के थपेड़े  खाते  हुए कुछ बार गिरा फिर उठाया गया और 562 के आप पास वर्तमान शक्ल में  तैयार किया गया।  बस  इसके बाहरी हिस्से में नज़र आने वाली मीनारें नहीं थीं।  #29_मई_1453 को उस्मान वंश के तुर्क  सुलतान मोहम्मद ने  कोंस्टनटिनोप्ल  / इस्तानबुल जीत लिया , फिर ईसाईयों के साथ वही किया जो ईरान के पारसियों के साथ 800 साल पहले किया था  और इस चर्च को मस्जिद में तब्दील कर दिया।  इसे मस्जिद की शक्ल देने के लिए चार मीनारें और हल्के फुल्के बदलाव  कर दिए  और होने लगी यहाँ पांच वक़्त की नमाज़ । 1931 में तुर्की के प्रगतिशील प्रधानमन्त्री अत तुर्क  ने  दोनों धर्मो के बीच सौहाद्र स्थापित करने के लिए इसे संग्रहालय में तब्दील कर दिया।  82 सालों के बाद शांतिप्रिय मज़हब के दिमाग में इसे फिर से मस्जिद बनाने का कीड़ा पैदा हो गया  और उन्होंने संसद में  बिल भी पेश कर दिया और जबरदस्ती अजान  नमाज़ और सहरी का रिवाज़ भी शुरू कर दिया। 





इन अरब के लुटेरों ने  पहला अण्डा मक्का के नाम का वहां के कुरैश कबीले का चुराया था ।  फिर यहूदियों के सबसे पवित्र मन्दिर #अल_अक्सा पर कब्ज़ा जमाया। इसके बाद पारसियों के मंदिरों पर कब्ज़ा जमा कर कैसे उन्हें मस्जिदों में तब्दील किया यह मैं अपनी पिछली पोस्ट में लिख ही चुका  हूँ। ये अंडा चोर अब तक मुर्गी  चोर हो चुके थे । 

1528  में इन्ही के मज़हबी भाई ने  हजारों  मील दूर राम मंदिर तोड़ कर बाबरी मस्जिद बनवा दी थी। सोफ़िआं हेगीआ की तरह यहाँ के मुसलमान भी उस पर पूरा हक़ जता रहे हैं।  दो दिन बाद ये तुर्की के सोफिया हेगीआ पर इक्कठे हो कर नमाज़ पढ़ कर उस पर अपना हक़ जताएंगे और भारत में 30 मई को बाबरी मस्जिद तोड़ने के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है जिसमें राम मंदिर पर ये अपना नाज़ायज़ दावा बरकरार रखे हुए है।  समय, स्थान और  दलीलें अलग हो सकती हैं , लेकिन मकसद एक ही है  कि जहाँ इनके पाँव पड़ गए वो जगह बस इनकी है। 
वर्ष  710 में मोहम्मद बिन कासिम नाम का मुर्गी चोर भारत में आया था और फिर नालंदा का इतिहास सब जानते हैं।  उसके बाद  28 नवम्बर 1001 को महमूद ग़ज़नवी के पहले आक्रमण से लेकर 1707 में औरंगज़ेब की मौत तक ये बीस हज़ार से  चालीस हज़ार मंदिरों को तोड़ कर ये ऊँट चुराने  वाले शातिर चोर हो गए। काशी विश्वनाथ मन्दिर के साथ ज्ञानवापी मस्जिद, कृष्ण जन्मभूमि से सटी हुई शाही मस्जिद , और सोमनाथ मन्दिर तोड़ कर बनायीं गयी मस्जिद ऊंट चोरी के ही विभिन्न प्रमाण पत्र  है। 

ईरान इराक इजराइल लेबनान तुर्की सायप्रस हंगरी मोरक्को अल्जीरिया नाइजीरिया लीबिया सोमालिया जर्मनी मलेशिया इंडोनेशिया पाकिस्तान अफगानिस्तान बांग्लादेश मिस्र कौन सा ऐसा देश है जहाँ इन्होने अण्डों से लेकर ऊँट तक नहीं चुराए हैं ????? और ऊपर से तुर्रा ये कि इनकी कुरान में लिखा है कि दूसरों के धर्मस्थलों में नमाज़ हराम है। 

https://en.wikipedia.org/wiki/Conversion_of_non-Islamic_places_of_worship_into_mosques

11 जनवरी 630 में मक्का के मन्दिर को  मस्जिद बनाने से लेकर 2001 में अफगानिस्तान के  बामियान में 50 मीटर ऊँची बुद्ध की मूर्ती तोड़ना इन अंडा चोरों के ऊंट चोरी में स्नातक होने की गवाही देता है। 
 इतने सब के बावजूद कुछ जड़बुद्धि सेक्युलर, रामजन्मभूमि की जगह भी अस्पताल , पार्क,स्कूल बनाने का सुझाव दे रहे थे। वैसे बच गए भारत वाले वर्ना ऊँट चोरों के दबाव में #रामजन्मभूमि का हाल भी #सोफिया_हेगीआ माफिक ही होता। अभी भी कुछ कह नहीं सकते क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के जज और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के हिन्दू वकील अभी अभी सेक्युलरता की बूटी पीकर सारे कायदे कानून हिन्दुओं के ऊपर ही अम्ल में लाते है अन्य मज़हबों की आस्था में खलल डालना वे संविधान के खिलाफ समझते हैं ।

शनिवार, 20 मई 2017

लोमड़ी सपने में भी मुर्गियाँ गिनती है



हम उन्हें बता रहे हैं कि ये बैल हैं, लेकिन वो फिर भी दूध दुहने की बात करते हैं। यह तर्जुमा है अरब की कहावत #नोलोम_तो_येएलो_इहीबूह का। क्या करें उन जाहिलों का जो वामपंथियों द्वारा मनगढंत इतिहास पढ़ कर हर बार हिन्दुओं को लड़वाने की साज़िश करते हुए जाहिलों को बैल दुहने के लिए उकसा रहे है। 

दो दिन पहले मैंने इसी फेस बुक पर एक सवाल पुछा था कि ---वो कौन सा मुस्लिम आक्रांता था जिसने हिन्दुओं की लाशों से नदी पाट कर पानी का रंग लाल कर दिया था ???? इस सवाल का जवाब इस पोस्ट के अंत में दूंगा लेकिन , यह सवाल क्यों किया था , उसे समझ लीजिये।

 "Milk the Persians and once their milk dries, suck their blood." ----
 पारसियों का दूध निकाल लो और जब दूध सूख जाये तो उनका खून चूस लो। शायद यही तर्ज़ुमा है इस आदेश का जो दिया था अरब के मुस्लिम खलीफा  ने वर्ष 741 AD में ईरान पर काबिज होने के बाद। ईरान इराक से पारसियों पर अत्याचारों होने की कहानी न यहाँ से शुरू होती है और न यहाँ पर ख़त्म होती है। 
लेख पढ़ने से पहले इतनी सी बात याद रख लीजिये कि वर्ष 610 में इस्लाम के पैदा होने से पहले वर्तमान ईरान और इराक में एक शांतिप्रिय धर्म #पारसी हुआ करता था। --- अब आगे पढ़िए , कि क्या हुआ उस धर्म का। 
वर्ष 636 में अरब के खलीफा उमर ने ईरान के राजा को पत्र भेजा कि वो लोग पारसी धर्म छोड़ कर इस्लाम कबूल कर लें। जिसे ईरान के राजा यज़्दगिर्द ने यह कह कर मन कर दिया कि हमें तुम्हारा मारकाट वाला धर्म स्वीकार नहीं करना है। हम जहाँ भी जाते हैं , वहां धर्म प्यार मोहब्बत और बंधुत्व के बीज बोते हैं।  बस यही बात खलीफा को नागवार गुज़र गयी। ( अधिक जानकारी के लिए और पारसी राजा के बेहतरीन जवाब के लिए निम्न लिंक अवश्य पढ़ें या जिन शांतिप्रिय मज़हब के लोगों को बहस करने की खुजली हो वे पहले निम्न लिंक को अवश्य पढ़ लें )

  मुख्य ईरान पर अरब आक्रमण से पहले खलीफा इब्न अल खत्ताब ने मेसोपोटामिया और ईरान के एक राज्य खवरवरण (आज का इराक) पर कब्ज़ा किया। वर्ष 637 में इस खलीफा के एक सेनापति साद इब्न अबी वक़्क़ास ने खवरवरण की राजधानी स्तेस्फियन को जीता -- और वहां के महलों , और संग्राहलयों को आग लगा दी। इसके बाद #तारीखे_अल_ताबरी के लेखक #अल_ताबरि के अनुसार साद इब्न अबी वक़्क़ास ने खलीफा  से पूछा कि "स्तेस्फियन में किताबों का क्या करना है ?" उमर का जवाब आया "अगर इनमे कुरान से अलग कुछ लिखा है तो यह ईश निंदा है और अगर इनमे कुरान जैसी बातें ही लिखी हैं तो इनकी ज़रुरत नहीं है हमारे लिए कुरान ही पर्याप्त है।" इसके बाद वक़्क़ास ने पुस्तकालयों को आग लगा दी और बचीखुची किताबों को फराह नदी में बहा कर पारसी वैज्ञानिकों और विद्वानों की पीढ़ियों की मेहनत कुछ दिनों में खत्म कर दी ।इसके बाद 40000 पारसियों को पकड़ कर अरब देशों में गुलाम बना कर बेच दिया। ( भारत की नालंदा, तक्षशिला , पाटलीपुत्र और ओदन्तपुर याद आये क्या ???) 
इसके बाद #मुस्लिम इतिहास बताता है कि उल्लाईस की लड़ाई में अरब सेनापति पारसियों के प्रतिरोध से थक कर इतना खीज गया कि युद्ध जीतते ही उसने सारे युद्ध बंदियों का क़त्ल करवा कर नदी में फिंकवा दिया और इस नदी पर बने हुए बाँध को खुलवा दिया। पूरी नदी में लाशें ही लाशें तैर रहीं थीं और पानी का रंग लाल हो गया था , जिसके बाद इस नदी को खून की नदी कहा जाने लगा। इसके बाद अरब लोग ईरान के शहर इस्तखर की तरफ बढ़े और पारसी धर्म को मानने वाले 40000 लोगों को कत्ल कर दिया। (मेरा सवाल तो ज़ेहन में है न , कौन सा वो मुस्लिम आक्रांता था जिसने हिन्दुओं का इतना खून बहाया था कि नदी का पानी लाल हो गया था और उपयोग में लाने लायक नहीं बचा था )

इसके बाद यज़ीद इब्न मोहल्लेब, एक उमय्यैद सेनापति ने ईरान के माज़न्दरान राज्य पर चढ़ाई की। युद्ध जीतने के बाद अरब  आदेश दिया कि जितने भी युद्ध बंदी हैं उन्हें मार कर राजधानी जाने वाली सड़क के दोनों तरफ लटका दो। जब वो माज़न्दरान की राजधानी पहुंचा तो उसने 6000 पारसियों को गुलाम बनाया और 12000 को क़त्ल करवा दिया। इसके बाद #गोरगन शहर में उसने आदेश दिया कि आटा पीसने वाली पनचक्कियां युद्धबंदियों के खून से चलाई जाएँ और तीन दिन तक लगातार पनचक्कियां पारसियों के खून से चलीं। यज़ीद आज भी इस बात के लिए जाना जाता है कि उसने रोटी का आटा युद्धबंदियों के खून से गुंथवाया था और खुद भी वो रोटी खायी थी। 
इसके साथ ही हज़ारों पारसी पुजारियों को मार दिया गया,  धार्मिक साहित्य जला दिया गया। उनके सारे आग के मदिर तोड़ दिए गए और जो नहीं तोड़े गए उनपर मीनारें बना कर उन्हें मस्जिदों में तब्दील कर दिया गया। #इस्तखर और #बुखारा के "चाहर तकि"आग मंदिर के ऊपर मीनारें लगा कर बनाई गयीं मस्जिदें इसी का उदहारण हैं। (अयोध्या,काशी मथुरा याद आया क्या ??? ) इस तरह अरब का ईरान इराक पर एकाधिकार स्थापित हुआ। 

ईरान जीतने के बाद , पारसियों को #धिम्मी / #जिम्मी  का दर्जा दिया गया। इस दर्जे के तहत कोई मुसलमान आत्मरक्षा की आड़ में किसी भी पारसी को परेशान कर सकता था,बेइज़्ज़त कर सकता था, गाली दे सकता था , शारीरिक यंत्रणा दे सकता था, पारसी का जबरदस्ती धर्मान्तरण कर सकता था या जान से मार सकता था। यह सब करने के लिए किसी वजह की ज़रुरत नहीं चाहिए होती थी। धिम्मी को कुरान के मुताबिक जजिया तो देना ही होगा, यह अलिखित क़ानून था। और जजिया देने का एक तरीका भी था , कि धिम्मी जजिया देने चल कर जायेगा और वसूलने वाला उसे गर्दन से पकड़ कर झिंझोड़ कर कहता है ,जजिया दो, और जजिया लेने के बाद उसकी गर्दन पर थप्पड़ मार कर उसे भगा दिया जाता था। मकसद धिम्मियों की हर हाल में बेइज़्ज़ती करना था। ( याद आया , भारत में अलाउद्दीन खिलजी के राज्य में जजिया वसूलने वाला , जजिया देने वाले का मुंह खुलवा कर उसके मुंह में थूक सकता था )
Mary Boyce अपनी किताब  Zoroastrians, Their Religious Beliefs and Practices में लिखती हैं कि जजिया सबसे बढ़िया साधन था , पारसियों को स्वेच्छा से इस्लाम कबूल करने के लिए। धिम्मी लोगों को त्वरित धर्मांतरण के लिए विशेष सुविधाएँ दी जातीं थीं जिससे वे धिम्मी होने के दंश और तत्पश्चात होने वाली बेइज़्ज़ती से निजात प् सकें। एक बार कोई पारसी इस्लाम कबूल कर लेता था तो उसके बच्चों को मदरसों में जाना पड़ता था ,अरबी भाषा और क़ुरान सीखनी पड़ती थी और इस तरह पारसी अपनी पहचान खोते गए। मैरी बॉयस आगे लिखती हैं कि इस्लाम कबूलना जितना आसान था पलट कर अपने धर्म में जाना उतना ही मुश्किल था यदि कोई कोशिश भी करता तो उसे मौत ही मिलती थी। इस तरीके से धर्मपरिवर्तन के पश्चात् अरब ये कहते थे कि पारसियों ने स्वेच्छा से धर्मपरिवर्तन किया है। इस तरह की दबावों और प्रतिबन्धों को जिनके तहत धर्म परिवर्तित किया जाता था उन्हें ,बहुत आसानी से भुला और नज़रअंदाज़ कर दिया जाता था। 
पारसी युद्धबन्दी और गुलाम जो इस्लाम कबूल कर लेते थे उन्हें आज़ाद कर दिया जाता था।  ( ये सब पढ़ने के बाद अलाउद्दीन खिलजी और औरंगज़ेब याद आये क्या ????)

एक वेबसाइट  tenets.zoroastrianism.com जिसका शीर्षक है Zarathustri Pilgrimage Sites In Iran में  Prof. Edward G. Browne in his A Year Amongst The Persians (the year being 1887-88): को उद्घृत करते हुए बहुत ही मार्मिक शब्दों में पारसियो की दयनीय दशा का वर्णन करते हुए कहती है कि --- इनके घरों में खिड़कियां नहीं होती थीं। रौशनी सिर्फ दरवाज़ों की झिरियों से आ सकती थी। खिड़कियों की जगह दीवारों में टूटी हुई बोतलें लगी होती थीं जिनसे सिर्फ बाहर कौन है सिर्फ यह देखा जा सकता। छतें घरों को को पूरा का पूरा ढकती थीं जिससे कोई लूटमार करने वाला , बलात्कारी छत के  घर में न घुस आये। हर तरफ से बंद घर एक दमनकारी अन्धकारपूर्ण भय पैदा करते थे और यह अंधकारपूर्ण स्थिति उस धर्म के अनुयायियों की थी जिन्होंने सिर्फ रोशनी और आग को ही पूजना सीखा था। 

    
 वर्ष 741 तक खलीफाओं के अत्याचार इतने बढ़ गए थे कि सब सन्धियों और करारों के बावजूद ईरान के सारे के सारे आग मंदिर तोड़ दिए गए और खलीफा ने ये ऐलान कर दिया कि -----"Milk the Persians and once their milk dries, suck their blood." --- 

#अछूत_बना_कर_मानमर्दन  ----
Prof. John Hinnells जो विश्वप्रसिद्ध विश्विद्यालयों में प्रोफेसर रहे हैं और जिन्होंने सिर्फ और सिर्फ पारसी इतिहास और धर्म पर शोध किया है , वे लिखते है कि पारसियों को इस्लामी आक्रांता #नाजिस कह कर सम्बोधित करते थे  और उन्हें अशुद्ध था मुसलमानों में अशुद्धता फैलाने वाला समझा जाता था। इसलिए पारसियों को अछूत समझा जाता था और उन्हें मुसलामानों के साथ रहने के अयोग्य समझा जाता था। इस मानसिकता का एक परिणाम यह भी निकला कि पारसियों को ज़बरदस्ती धक्के मार कर शहर से निकल दिया जाता था और मुसलमानों की उपस्थिति में उनपर हर प्रकार के प्रतिबन्ध लगे रहते थे। ये परिस्थियाँ वर्ष 637 से 750 तक की लिखी गयीं है ,( और अगर किसी को अल बरुनी का वर्ष 1030 में भारत के विषय में लिखा हुआ संस्मरण #किताब_तारीखे_अल_हिन्द,  याद हो तो वो साफ़ साफ़ लिख कर गया है कि चार वर्णो और सात शिल्पकार जातियों में छुआछूत जैसी कोई बिमारी नहीं थी।) 
इस तरह एक समय ईरान के बहुसंख्यक पारसी गिनती में कम होने लगे, कम होने के कारण उनकी प्रतिरोध क्षमता कम होती गयी और एक दिन ईरान और इराक से पारसी ख़त्म हो गए। 

आज ईरान की जनसँख्या आठ करोड़ की है यहाँ सिर्फ 25271 पारसी और 8756 यहूदी बचे हैं और इराक की जनसँख्या लगभग तीन करोड़ साठ लाख -- जान कर खुश हो जाइये कि इराक में एक भी यहूदी और पारसी नहीं  बचा है। ( भारत की कश्मीर घाटी की याद तो नहीं आ रही जहाँ 1910 तक दस लाख हिन्दू थे आज  2947 बचे हैं। )

ये बातें वामपंथी इतिहासकार कभी बताएँगे नहीं , छुआछूत और दलितापे का ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़ने वाले कभी जानने की कोशिश करेंगे नहीं और अपने को सेक्युलर समझने वाले बीमार दिमाग के लोग कभी असली मुज़रिमों को कटघरे में खड़ा करने का दम अपने अंदर पैदा कर नहीं पाएंगे। 

छुआछूत, ऊंच नीच,धोखाधड़ी, मारकाट, बलात्कार, बेगुनाहों का लाखों की तादाद कत्लेआम ,तेरा धर्म और मेरा मज़हब ये सब भारत में कब और कहाँ से आये इसके लिए भारत के इतिहास को नहीं दूसरे देशों और मज़हबों के इतिहास को ही जान लिया जाये तो आज के अवार्ड वापसी गैंग वाले एक ईमान वाले के मरने पर जो अवार्ड वापिस करने की होड़ में शामिल हो जाते हैं उनके पास  डूब मरने के लिए चुल्लूभर पानी भी ज्यादा होगा। 

बात शुरू हुई थी की कौन सा वो मुस्लिम आक्रांता था जिसने हिन्दुओं का इतना खून बहाया था कि नदी का पानी लाल हो गया था और उपयोग में लाने लायक नहीं बचा था -----

अपनी किताब #तारिख_ए_यामिनी में  अबू नस्र मुहम्मद इब्न मुहम्मद अल जब्बरुल उत्बी ---थानेसर के निकट महमूद ग़ज़नवी द्वारा किये गए कत्लेआम का ज़िक्र यूँ करता है कि ---- नदी के पानी में खून इतनी अधिक मात्रा में था कि नदी का पानी लाल हो गया था i लोग उसे पी नहीं सकते थे। जो लोग किला छोड़ कर भागे या तो उन्हें काट डाला गया या वो नदी में बह गए। कुछ नहीं तो पचास हज़ार से ज्यादा आदमियों का क़त्ल किया गया था। 
कहाँ ख़त्म हो गए पारसी अपने देश से ??? 
कहाँ खो गए यज़ीदी , अपने देश से ???
क्यों ख़त्म हो  बौद्ध धर्म दुनिया के नक़्शे से ???
क्यों और किससे कूर्द अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहे है ???

आज का मुस्लिम देश सीरिया कभी ईसाई  हुआ करता था ,
मलेशिया,इंडोनेशिया,अफगानिस्तान बौद्ध हुआ करता था 
पकिस्तान कभी हिन्दू हुआ करता था। 


क्या अभी भी तय नहीं कर पाए कि भारतीय संस्कृति में कमीनगी की मिलावट किसने की है ????







मंगलवार, 16 मई 2017

ये मामले भी मज़हबी हैं


समझ नहीं आ रहा कि हिन्दुओं के कंधो पर बैठी इस न्याय की प्रतिदिन मोटाती देवी का तराज़ू हिन्दुओं के लिए छोटा और डण्डा हिन्दुओं के लिए बड़ा क्यों होता जा रहा है ????
सुप्रीम कोर्ट जी , माना न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी बंधी होती है , पर आप तो अपनी अक्ल पर से तो पर्दा उठा लो ।
क्या कहा था 11 मई को तलाक के मुद्दे पर इन अक्ल के ठेकेदारों ने ???? कि #अगर_यह_इनके_मज़हब_का_मामला_है_तो_कोर्ट_इसमें_दखलंदाज़ी_नहीं_करेगी। अगर कोर्ट इनके धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का मन बना चुकी है तो हिन्दुओं,सिखों ईसाईयों, बौद्धों और अन्य धर्म वालों को तैयार रहना चाहिए (पोस्ट छोटी रखने के उद्देश्य से ,उदाहरण के लिए चुनिन्दा आयतें लिख रहा हूँ, बाकि आप लोग कमेंट बॉक्स में आयतें लिख कर पाठकों का ज्ञान वर्धन कर सकते ) ----
1) #मरने_के_लिए -----सूरा 9 आयत 5 ,सूरा 8 आयत 12 ,सूरा 33 आयत 61
2) #ये_हमेशा_जिहाद_के_लिए_तैयार_है --सूरा 9 आयत 111, सूरा 66 आयत 9
 3 #जजिया_देने_के_लिए ----सूरा 9 आयत 29
4) #औरतों_केअपहरण_और _बलात्कार_के_लिए --- सूरा 4 आयत 24
#दास_दासी_प्रथा_के लिए ---सूरा 8 आयत 25
6) #काफिर_इनके_लिए _जान_दे_दें_पर_ये_आपको_कभी_दोस्त_नहीं_मानेंगे ---सूरा 4 आयत 89 /सूरा 5 आयत 51
7) #ये_लड़ते_ही_रहेंगे -----सूरा 9 आयत 123 , सूरा 32 आयत 22
8)#अगर_इनका_बाप_या_भाई_कुफ्र_करदे_तो_उससे_भी दोस्ती_नहीं -------सूरा 9 आयत 123
ऐसा नहीं है कुरान या खुदा ने काफिरों को सिर्फ लूटने या मारने के लिए ही लिखा है। काफिर जान बचा सकते हैं बशर्ते वो इस्लाम कबूल कर लें।
फिर अगर वे लोग (अपने कुफ्र से) बाज़ आ जाएँ (#और_इस्लाम_कबूल_कर_लें) तो अल्लाह तआला बक्श देंगे और मेहबानी फर्मा देंगे। सूरा 2 आयत 192
तो हे सुप्रीम कोर्ट के महानुभावो आज तीन तलाक इनका मज़हबी मामला है, और कल अगर इसी आधार पर कि ये आयते हमारी कुरान में लिखी हैं, उद्घृत करके यह कह दिया कि मार काट बलात्कार वसूली भी इनके मज़हबी मामले हैं तो क्या कहोगे ????? देख रहे हो न दुनिया जहान में सुन्नी शिया वहाबी सलफ़ी अहमदिया सीरिया, इराक तुर्की अफगानिस्तान, पकिस्तान नाइजीरिया में जब मुसलमान एक दूसरे को मारते हुए ही नज़र आ रहे है तो ये लोग काफिरों का क्या करेंगे ?????
प्रिय सुप्रीम कोर्ट के मठाधीशों वैसे तो इतने दिनों में आप कई भाषाओँ में कुरान पढ़ सकते थे , फिर भी अगर नहीं पढ़ी है तो निम्न लिंक को ज़रूर पढ़िए जिनमे उपरोक्त आयतों को हदीस का समर्थन प्राप्त है। यानि कि ये मामले भी पूर्णतः मज़हबी हैं।
https://www.thereligionofpeace.com/pages/quran/slavery.aspx
शनि शिगनापुर, दही हांड़ी, जल्लिकट्टू हो सकता है आपको धार्मिक नज़र न आते हों, इनका शास्त्रों में ज़िक्र न मिलता हो ,पर रामजन्मभूमि और गऊ माता का ज़िक्र तो धार्मिक पुस्तकों में है।
अजीब प्रजातन्त्र है जहाँ बहुसंख्यकों द्वारा चुनी हुई सरकारें तो बहुसंख्यक हितों को ताक पर रख नीतियां बना रही हैं वहीँ सुप्रीम कोर्ट जिसे संविधान प्रद्दत समानता के मौलिक अधिकार की रक्षा करनी चाहिए वो भी आँखों पर पट्टी बंधे बैठी है।
वैसे ये हाथ में डंडा/ तलवार क्या सिर्फ हिन्दुओं के लिए ही है ?????
जिस दिन मुसलामानों की तरह हिन्दुओं ने बात बात पर मारकाट मचानी शुरू की उस दिन आप माननीय नहीं ढक्कन सिंह हो कर रह जाओगे। मजबूर मत करिये कि वो दिन आ जाये जब हिन्दुओ ने जो लिहाज़ में मुंह बंद कर रखा है , वो खुल जाए और वो भी कह दें कि हम नहीं मानते इस पक्षपात करने वाले संविधान को , यह संविधान हमारे धर्म शास्त्रों से बढ़कर नहीं है।

बुधवार, 8 मार्च 2017

और अखिलेश का रथ रुक गया।

और अखिलेश का रथ रुक गया। 
कल चुनाव संपन्न हो गए, और आज से जमीन पर किये गए सर्वेक्षणों और अनन्य वैज्ञानिक विधियों से उनकी व्याख्या की जाएगी। सबके अपने अपने आंकलन होंगे। सांखियिकी के आधार पर विभिन्न दलों की सीटें भी बताई जाएँगी। कौन जीतेगा कौन हारेगा यह  बताया जायेगा। अनेकों विधियों में मुझे प्रकृति के इशारे पढने और समझने में कुछ ज्यादा ही रूचि है।  लोग इसे अंधविश्वास  सकते हैं, लेकिन 11 मार्च के बाद यह तय हो जायेगा कि वाकई प्रकृति  करती है या नहीं। 
1988 में पाओलो कोएल्हो ने पुर्तगाली भाषा में एक नॉवल लिखा था "अलकेमिस्ट" । कालान्तर में इसे दुनिया की 69 भाषाओँ अनुवादित किया गया।  इस पर फिल्मे भी बनीं। इस पुस्तक की विषयवस्तु थी , कि यदि आप किसी चीज़ को शिद्दत से चाहें तो पूरी प्रकृति आपको उससे मिलवाने के लिए आतुर हो उठती है।और इसी पटकथा से एक सन्देश और निकलता है कि जब आप कोई काम करते है तो प्रकृति आपको इशारों में उसके अंजाम के बारे में सचेत करती रहती है।
मुझे पूरा यकीन है कि ज़िन्दगी की व्यस्तताओं के चलते अखिलेश यादव जी ने यह नॉवल नहीं पढ़ा होगा। पढ़ा भी होगा तो उसे अंधविश्वास से ज्यादा कुछ नहीं माना होगा।  सबको मालूम था कि चुनाव कुछ ही महीनों में होने वाले हैं सब राजनीतिक दलों ने अपनी अपनी कवायद शुरू कर दी। अखिलेश यादव ने यह कवायद चार साल पहले ही स्टीव जार्दिङ्ग्स , हारवर्ड के प्रख्यात प्रोफेसर को अपनी और अपनी सरकार के छवि निर्माता के रूप में अनुबंधित किया था। स्टीव जार्डिनगस ने 2011 का स्पेन के मारियानो राजोय की  बागडोर संभाल कर उन्हें प्रधानमंत्री बनाया लेकिन वो ये क्रिश 2015 में नहीं दोहरा पाए। 2016 में अमरीकी चुनाव में राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन और  उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार अल गोर की चुनावी बागडोर संभाली, और इन तीनों में से कोई चुनाव नहीं जीता है। इसी कड़ी में स्टीव परदे के  पीछे से अखिलेश की चुनावी बागडोर संभाल  रहे हैं और नतीजे दो दिन  सामने होंगे। 
सबसे अहम् इशारा प्रकृति ने 3 नवम्बर को किया।  अखिलेश ने विश्वप्रसिद्ध कर निर्माता मर्सिडीज़ बेंज से अपनी चुनावी रथ यात्रा के लिए करोड़ों रुपये खर्च करके बस बनवाई। मुलायम सिंह जी ने उसे झंडी दिखा कर रवाना किया। रथ आधे घंटे और डेढ़ किलोमीटर चले के बाद ख़राब हो गया।  बहुत ठीक करने की कोशिश की गयी लेकिन रथ ठीक नहीं हुआ यहाँ तक की बड़े बड़े इंजीनियर उसे ठीक नहीं कर पाए। यहाँ तक की क्रेन भी उसे अपनी जगह से हिला नहीं सकी। यह पहला इशारा था प्रकृति का अखिलेश यादव के लिए। 
रथ का रुकना अपनी जगह था ,लेकिन न जाने क्या सोच कर अखिलेश ने राहुल गाँधी को अपना हमसफ़र बना लिया. जनवरी 2013 में कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने। उसके बाद से भारत में जिन भी चुनावों में उन्होंने कांग्रेस की बागडोर अपने हाथों में संभाली, उसमे कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई। यह प्रकृति का दूसरा इशारा था , जिसे अखिलेश ने समझने से इनकार कर दिया। 
चुनावी दौर चल रहा था, अखिलेश मैदान मैं पूरी तरह से उतरे हुए थे अब प्रकृति उन्हें इशारा करती भी और वो समझते भी तो भी कोई लाभ नहीं था। इसी दौरान प्रकृति ने फिर इशारा किया और अल्लाहाबाद में जिस मंच से राहुल और अखिलेश ने भाषण देना था वो मंच टूट गया।  अखिलेश और राहुल बस उस सभा को रद्द ही कर सकते थे और उन्होंने किया। यह तीसरा इशारा था प्रकृति का। 
इन सबसे ऊपर अखिलेश अपने भाषणों  बार बार मोदी जी को गंगा मैय्या की सौगंध खाने के लिए कह रहे थी, कि गंगा मैय्या की कसम खा कर यह कहें की वाराणसी में 24 घंटे बिजली आती है। और प्रकृति का इससे बड़ा इशारा क्या हो सकता था कि अखिलेश जब खुद बाबा विश्वनाथ के दर्शन करने पहुंचे तो बिजली चली गयी। 

ये अखिलेश को प्रकृति के इशारे थे या अंधविश्वास यह तो 11 मार्च को ही पता चलेगा।   

सोमवार, 6 मार्च 2017

जब अपना ही सोना खोटा हो तो ..............

बर्थडे तो सबको मालूम होता है ,लेकिन फाउन्डेशन डे किसी इसलिए मालूम नहीं है क्योंकि उस पर कभी सोचा ही नहीं और फाउंडेशन क्यों डाली गयी इस पर भी कभी दिमाग नहीं लगाया जाता ------------------------------------ ज्यादा दिमाग पर जोर मत डालिये। आप लोगों को गुड़गोबर नज़र आ रही ,कन्हैया कुमार नज़र आ रहा है , आप लोगों को उमर खालिद नज़र आ रहा है, आप लोगों को हार्दिक पटेल नज़र आ रहा है , रोहित वेमुला याद होगा , अख़लाक़ की मौत के बाद असहिष्णुता की जो सुनामी चलायी गयी थी वो भी याद होगी और अगर मैं इस तरह पीछे चलता जाऊँ तो 2002 का गोधरा और 1990 का कश्मीरी पंडितों के पलायन की तारीख याद होगी। 1988 में कुंडकोलम न्युक्लीअर प्लान्ट बनाना शुरू हुआ 24 साल तक बनता रहा , लेकिन जब उसके शुरू होने के दिन आये तो विरोध करने के लिए एक उदय कुमार जी जाग गए। होने लगा धरना प्रदर्शन। ऐसे ही 60 के दशक से एक बाँध बन रहा था , जिसके बनने से गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के चालीस लाख से ज्यादा लोगों को पीने,और सिंचाई के लिए पानी मिलना है , इन राज्यों को बिजली मिलनी है। लेकिन मेधा पाटकर नाम के प्राणी को बाढ़ और सूखे की मार झेलने वाले लाखों लोगों से ज्यादा चिंता उन सैंकड़ों लोगों की थी जिनकी ज़मीन पर #सरदार_सरोवर_बाँध बन रहा था। इनका साथ दिया अरुंधति रॉय ,आमिर खान जैसे लोगों ने। आपको याद हैं न ये वही लोग हैं जिन्होंने अफ़ज़ल गुरु और याकूब मेमन की फांसी की सजा माफ़ करने के लिए राष्ट्रपति को पत्र लिखा था। यूँ ही याददाश्त को पीछे लेकर जाएँ तो मैं आपको वर्ष 1812 तक ले जा सकता हूँ जब सी आई ए ने #Adoniram_judson नाम के एक धर्मगुरु को प्रायोजित करके हिंदुओं का धर्म परिवर्तित करने के लिए भारत में भेजा था।
ये सब मैंने बर्थडे याद दिलाये हैं। क्या आपको मालूम है कि 1988 से लेकर 2011 तक, 24 साल कुंडकोलम बनता रहा और कोई विरोध नहीं हुआ ??? जैसे ही उस न्युक्लीअर प्लांट की शुरुआत होनी थी , मुम्बई स्थित अमरीकी वाणिज्यदूतावास से एक मेल (Wikileaks cable 06MUMBAI1803_a) सी आई ए को गई और शुरू हो गया विरोध।
1975 में अमरीकी सीनेट ने सी आई ए तथा गिरिजाघरों के सम्बन्धो को जानने के लिए सीनेटर फ्रैंक चर्च की अध्यक्षता में एक समिति गठित की जिसका भारत के परिपेक्ष्य में एक अंश कहता है ---- सी आई ए धार्मिक लोगों को तनख्वाह,बोनस और खर्चे देती रही है। उनके द्वारा चलाये गए प्रोजेक्ट्स की फंडिंग करती रही है। अधिकतर व्यक्तियों को गुप्त गतिविधियां चलाने के लिए पैसा दिया जाता था। 60 के दशक में सैकड़ों लोग गुप्त गतिविधियाँ चलाते थे मूलतः वामपंथ से प्रतिस्पर्धा करने के लिए . . . . . . . . . . . . . . हाल में अमरीका के लिए सबसे घातक एक पादरी के सी आई ए से सम्बन्ध हैं जो कि विद्यार्थियों और धार्मिक मामलों में विचारों की विभिन्नता के लिए जासूसी करता है। 70 के दशक में अमरीका सरकार इस पादरी को एक लाख रूपये सालाना तनख्वाह के इलावा अक्सर उपहार दिया करती थी।
इस पादरी के रूप में जासूस का नाम तो नहीं मालूम , पर भारत में सामाजिक और धार्मिक मामलों के जानकारों के लिए #जॉन_दयाल ,#कांचा_इल्लैया और #सुनील_सरदार के नाम से अनजान नहीं होंगे। ये तीनों भारतीय हैं ,लेकिन दुनिया का ऐसा कोई मंच नहीं है जहाँ से ये भारत और हिन्दुओं को बदनाम करने का मौका छोड़ते हों। अगर सिर्फ बदनाम करने की बात होती तो शायद इन्हें नज़रअंदाज़ किया जा सकता था, लेकिन भारत में रह कर धर्मान्तरण करवाना और जेनयू जैसे शिक्षण संस्थानों में सेमिनारों में हिंदुओं और हिंदुओं के आराध्यों के अपशब्द कहना इनका पेशा है। बस इनका प्रतिरोध नहीं होना चाहिए। गलत या सही किसी अल्पसंख्यक के साथ कोई घटना हो जाये उसके लिए हिंदुओं को ज़िम्मेदार ठहराना इनका मूलकर्तव्य है। किसी भी मुद्दे पर मीडिया के साथ मिल कर इतना हो हल्ला मचाते हैं कि सरकार मजबूरी में हिंदुओं पर कार्यवाही करने के लिए बाध्य हो जाये। ये चाहें तो कितना भी धर्म परिवर्तन करवा लें बस हिन्दू संगठन #घर_वापसी न करवाएं।
 सी आई ए का एक मुखौटा है " समर इंस्टिट्यूट ऑफ़ लिंग्विस्टिक्स " जिसे USAID से पैसा मिलता है। महाराष्ट्र के इसकी एक शाखा " इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ क्रॉस कल्चरल कम्युनिकेशन" के नाम से है। 70 के दशक में #एलएसडी एक मनोविकृतकारी ड्रग का परीक्षण भारत में इसी संस्थान ने किया था। चूँकि ये लोग भारतियों की धार्मिक भावनाओं को नहीं हिला पा रहे थे तो #ओशो_आश्रम ,#इस्कॉन, और #आनंदमार्ग में घुसपैठ करके उनके अनुयायियों पर इस ड्रग का इस्तेमाल करके उन्हें आपस में लड़वा कर उन्हें बदनाम करवाने में सीआईए का ही हाथ था।
60 के दशक में थे एक अतिउत्साही ईसाई मत के प्रवर्तक #लेस्टर_डोनिगर जिन्हें अमरीकी सरकार से धर्मान्तरण के लिए भरपूर पैसा मिलता था। इनकी हैं एक बिटिया जिसका नाम है #वेंडी_डोनिगर। याद आया आपको यह नाम ??? जिन्होंने , "द हिन्दू : एन आल्टरनेटिव हिस्ट्री"लिखी थी । यह वही किताब है जिसने देवी देवताओं की जानवरों से तुलना करके हिंदुओं का मज़ाक उड़ाया था। यह बात दीगर है की इस पुस्तक को दीनानाथ बत्रा जी ने अदालत के द्वारा प्रतिबंधित करवा दिया था। लेकिन अफ़सोस बहुत से हिंदुओं ने इस प्रतिबन्ध का विरोध किया , अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रश्न चिन्ह लगाया था । लेकिन तथ्य जो बहुतों को नहीं मालूम वो यह है कि इसी #वेंडी_डोनिगर को अमरीकी सरकार ने विद्यार्थी के छद्म रूप में 1963-64 में $6000 का वज़ीफ़ा दे कर भारत की जासूसी करने के लिए भेज था।
कौन हैं वो लोग जो अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोज़ स्यापा डालते है ???
ज़रा सा दिमाग पर ज़ोर डालिये, एम एफ हुसैन ने हिंदुओं के साथ वही किया था जो चार्ली हेब्दो ने मुसलामानों के साथ किया था। हुसैन देश छोड़ कर भाग गया जब हिन्दू संगठनों ने अदालत का सहारा लिया। चार्ली हेब्दो ने देश नहीं छोड़ा। हुसैन स्वाभाविक मौत मर गया , चार्ली हेब्दो को मुसलमानों ने मार डाला इसके बाद हुसैन की मौत पर भारत के बुद्धिजीवी बोलते हैं --- RIP Maqbool Fida hussain , victim of Lunatic & apathy of some Indians .Alvida Hussain Saab.
और चार्ली हेब्दो पर यही हिन्दू बुद्धिजीवी बोलते हैं ---Condemn the murders in Paris. But verbal violence begot violence there .
इस तरह की बातें करने की मानसिकता यूँ ही पैदा नहीं हो जाती। ---1935 में आर के नारायण द्वारा लिखित " Swami and Friends " में नारायण लिखते हैं कि स्कूल के बच्चों में ईसाईयत के भाव भरने के लिए अध्यापक बच्चों को कहते है ____" ओ दयनीय बेवकूफों ! क्या हमारे जीसस तुम्हारे कृष्ण की तरह नाचती हुई लड़कियों के साथ इधर उधर आवारा गर्दी करते थे ???? क्या हमारे जीसस तुम्हारे दुरात्मा कृष्ण की तरह मख्खन चुराते घूमते थे ??? क्या हमारे जीसस तुम्हारे कृष्ण की तरह अपने आस पास वालों पर काला जादू करते थे ????
ये बात 1935 की है। 1967 में अमरीका से पैसा और सम्मान मिलने के बाद रोमिला थापर सरीखों ने भारतीय इतिहास के साथ कैसा बलात्कार किया यह जानने के लिए अरुण शौरी द्वारा लिखित “Eminent Historians: Their Technology, Their Life, Their Fraud” , पढ़िए। आपको समझ आ जायेगा कि वर्तमान इतिहासकारों ने भारत की गरिमा को मिटटी में मिलाने के लिए विदेशियों के पैसे के दम पर तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा लिखित इतिहास को ही झुठला दिया है, जिन्होंने इस्लाम के दमनकारी चक्र को बहुत गौरान्वित हो कर वर्णित किया था।

आज के बच्चों की मानसिकता कैसे गुरमेहर या कन्हैय्या जैसी हो जाती है , उसे समझने के लिए कक्षा 1 से कक्षा 10 तक की किसी भी बोर्ड की पुस्तकें उठा कर देख लीजिये आपको समझ आ जायेगा की क्यों आज शान्ति की अपील करने वाली गुरमेहर चलती गाड़ी में दारु की बोतल के उत्तेजक डांस कर सकती है।
1917 में रूस में पैदा हुए वामपंथ ने 1928 में ही भारत की जड़ें खोदनी शुरू कर दीं थीं। 1962 में जब चीन ने भारत पर अतिक्रमण किया तो भारतीय वामपंथी चीन के साथ खड़े थे।मैं उसी चीन की बात कर रहा हूँ जो भाषाओँ के आधार पर भारत को 28 टुकड़ों में तोडना चाहता है। भारतीय इतिहास को बदरूप करने वाले और NCERT का पाठ्यक्रम तय करने वाले सारे तथाकथित बुद्धिजीवी वामपंथी है। ISI का ज़िक्र करके पोस्ट बड़ी करने से कोई फायदा नहीं।
 आपको क्या लगता है कि रॉकफेलर स्कालरशिप , मैगासेसे अवार्ड , फोर्ड फाउंडेशन, ग्रीनपीस आर्गेनाईजेशन बहुत चिंतित हैं भारत के प्रति जो हजारों करोड़ प्रतिवर्ष भारत को दे रहीं थीं ??? या KGB (रूस की ख़ुफ़िया एजेंसी) बेवकूफ थी जो 1970 से कांग्रेस को पैसा दे रही थी ??? या ज़ाकिर नाइक का पीस फाउंडेशन कैसे 3000 करोड़ की हो गयी ??? कैसे 1990 के बाद अपने को दलित कहने वालों को हिंदुओं से अलग करने की बाढ़ आ गयी ??? कैसे जब कोई व्यक्ति आपसी रंजिश में मारा जाता है तब भी मीडिया चिल्ला चिल्ला कर बताता है कि मरने वाला दलित था ???
वैसे तो पिछले सालों में इन ईसाईयों और कसाईयों ने भारतीय समाज का ताना बाना छिन्न -भिन्न कर दिया है , फिर भी ईश्वर को या मोदी जी को धन्यवाद कीजिये कि 13000 NGO की विदेशी फंडिंग पर बैन लगा दिया। फिर सब पूछते हैं कि मोदी ने हिंदुओं के लिए क्या किया ????
हिलता हुआ पेड़ और झड़ते हुए पत्ते सबको नज़र आ रहा हैं लेकिन उनकी नींव में मठ्ठा कौन डाल रहा है, कोई जानना नहीं चाहता है। ज़रा जानने की कोशिश कीजिये कि इस पूरे प्रकरण की फाउन्डेशन कौन डाल रहा है। फिर मुंह से यही निकलता है कि जब अपना ही सोना खोटा हो तो सुनार को दोष कैसे दें।

शनिवार, 26 नवंबर 2016

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षतिः।

अशरफ (सैय्यद मीर),अजलफ (शेख, पठान ), अरजाल (जुलाहा , हज्जाम), अजलाम और पसमांदा (भंगी, मेहतर ,चमार)  ---- मुस्लिम समाज में ये वर्ण बने अपनी पैदाइश , धर्मान्तरण और अपनी दिनचर्या के आधार पर। अपने हक़ों के लिए पसमांदा, अरजाल अजलाफ और अजलाम सभी लड़ रहे हैं लेकिन अपने धर्म और धर्मशास्त्रों की धज्जियाँ उड़ा कर या उन्हें जला कर नहीं। अपने धर्म और धर्म शास्त्रों का अपमान कैसे करना है , यह कोई सीखे तो उन हिंदुओं से जो विदेशी चंदे पर पल रहे है। धर्म का अपमान करना एक मानसिकता हो सकती है लेकिन धर्म का अपमान सहने वाले हिंदुओं को क्या कहा जाये जो मूकदर्शक बने हुए हैं। महर्षि मनु ने उनके लिए भी मेरे संज्ञान में दो कथन कहे हैं ----- 
यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च ।हन्यते  प्रक्षेमानानां  हतास्तत्र सभासदः ।। अध्याय 8 श्लोक 14
अर्थात जिस सभा में अधर्म से धर्म, असत्य से सत्य, सब सभासदों के देखते हुए मारा जाता है, उस सभा में सब मृतक के समान हैं।

आज महर्षि मनु और मनुस्मृति पर स्त्रीविरोधी और दलित विरोधी होने का आक्षेप लगाने वालों ने न तो कभी मनुस्मृति पढ़ी और न ही अम्बेडकर को पढ़ा जिन्होंने मनु का घोर विरोध किया था। 
गौर करें अम्बेडकर ने भी चतुर्वर्ण के विषय में "Annihilation Of Castes "  --- में लिखा है कि chaturvarn is based on worth. और दूसरे उन्होंने भी मनुस्मृति के श्लोकों का अपने हिसाब से व्याख्या  जैसे --- यह कैसे हो सकता है कि ब्राह्मण ही पढ़ेगा और पढ़ायेगा , क्षत्रिय ही शस्त्र धारण करेगा और वैश्य ही व्यापर करेगा।  यदि उन्होंने इसे मनुस्मृति के अंग्रेज़ी अनुवाद न पढ़ कर संस्कृत के श्लोकों की व्याख्या इस प्रआर की होती कि जो पढ़ेगा और पढ़ायेगा वो ब्राह्मण है , जो शस्त्र धारण करेगा और प्रजा की रक्षा करेगा वो क्षत्रिय है और जो व्यापार करेगा वो वैश्य है तो शायद उन्हें मनु से इतनी नफरत न होती और आज समाज में इतनी वैमनस्यता भी नहीं फैलती। अम्बेडकर ने प्रक्षेपित श्लोकों का तो संज्ञान लिया कि जो शूद्र वेद पढ़ेगा या सुनेगा उसकी जिह्वा काट दी जाएगी और कान में पिघला  हुआ सीसा डाला जायेगा लेकिन उन्होंने एक बार भी मनु द्वारा रचित निम्न श्लोकों का संज्ञा बिलकुल नहीं लिया कि एक ही व्यक्ति दो विरोधाभासी बातें कैसे लिख सकता है ????
( पोस्ट को छोटा रखने के उद्देश्य से सिर्फ श्लोकों की संख्या के साथ  श्लोकों  का भावार्थ ही लिख रहा हूँ )
अध्याय 4 श्लोक 35 -----कम अंगों वालों या अपंगों, या विद्याविहीन ,आयु में बड़े   और रूप और धन से रहित और अपने से निम्न वर्ण वर्ण वालों पर कभी आक्षेप /व्यंग्य न करें। 
अध्याय 4 श्लोक 51 --- पुत्र और शिष्य से भिन्न अन्य किसी व्यक्ति पर दण्ड न उठायें और क्रोधित हो कर भी न मारें , न वध करें। पुत्र और शिष्य को भी केवल शिक्षा देने के लिए ताड़ना करें। 
अध्याय 4 श्लोक 24 ----सिखाये हुए सुन्दर लक्षणों से युक्त सुन्दर रंगरूप से शीघ्रगामी पशुओं से चाबुक की मार से बहुत पीड़ा न देता हुआ सवारी करे। 
अध्याय 3 श्लोक 44 --- चूल्हा चक्की झाड़ू ओखली पानी का घड़ा , गृहस्थों के लिए ये पांच हिंसा के स्थान हैं, इनका प्रयोग करते समय गृहस्थ जाने अनजाने हिंसा जनित पापों में बंध जाता है। 
 --- और भी बहुत से श्लोक हैं जो किसी भी प्रकार की हिंसा और प्रताड़ना को पाप की श्रेणी में रखते हैं, तो मनुस्मृति का अंध विरोध करने वाले कभी दिमाग लगाकर यह क्यों नहीं सोच पाते कि जो व्यक्ति जानवर को कोड़ा तक मारने को हिंसा की श्रेणी में रखता है वो किसी की जुबान काटने या कान में सीसा डालने जैसी हिंसा की विरोधीभासी बातें कैसे लिख सकता है ????
मनु की वर्णव्यवस्था में ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शुद्र कैसे बनते थे ?????

अध्याय 2 , श्लोक 12 -13 ---मनु के अनुसार जो पाने बच्चों को ब्राह्मण बनाना चाहे वो उनका उपनयन पांचवें वर्ष तक क्षत्रिय छठे वर्ष और वैश्य का आठवें वर्ष में करवा दें। यदि इन वर्षों में उपनयन न करवा पाएं उनमे ब्राह्मणों का उपनयन सोलहवें वर्ष ,क्षत्रिय वर्ण के इच्छुक बाईस वर्ष और वैश्य वर्ण के इच्छुक चौबीस वर्ष तक करवा लें। जिनका उपनयन इस आयु सीमा में नहीं हो पाता था वे शूद्रों की श्रेणी में आ जाते थे। यह उपनयन भी बच्चो के aptitude पर निर्भर करता था। 
ऐसा भी नहीं था कि यदि कोई एक वर्ण में चला गया तो उसका वही वर्ण रहता था---
अघ्याय 2 श्लोक 62 -- जो मनुष्य नित्य प्रातः और सांय सन्ध्योपासना नहीं करता उसको शुद्र के समान समझकर द्विजकुल से से अलग करके शूद्रकुल में रख देना चाहिए। 
जो शरीर से बलिष्ठ होता था परन्तु जिसकी पढ़ने लिखने में रूचि नहीं होती थी और जो पढ़लिख नहीं पाता था वो शुद्र बन कर दूसरों की सेवा करके अपना जीवनयापन करता था। जब सेवा करता था तो कोई संशय नहीं कि अन्यवरणो के संपर्क में भी आता ही होगा ,तो यह कहना अनुचित है कि शूद्रों को अछूत समझ जाता था। शूद्रों को क्या सम्मान दिया जाता था उसके लिए एक दो श्लोक लिख रहा हूँ। 
अध्याय 3 श्लोक 80 -- विद्वान् अतिथियों द्वारा भोजन क्र लेने पर और अपने सेवकों आदि के खा लेने पर शेष बचे हुए भोजन को पति पत्नी खायें। 
अध्याय --3 श्लोक, 66 67 एवं  81 -- दिव्यगुण सम्पन्न विद्वानों ,विद्या के प्रत्यक्षकर्ता ऋषियों को , माता पिता आदि पालक व्यक्तियों को , गृहस्थ द्वारा भरण पोषण की अपेक्षा रखने वाले असहाय, अनाथ कुष्ठ रोगी, सेवक आदि को भजन दान द्वारा सत्कृत करके उसके बाद इनसे शेष बचे भोजन को खाने वाला हो अर्थात उस शेष भोजन को खाया करे। 
बात जहाँ से शुरू हुई थी वहीँ पर ख़त्म करता हूँ फ़ेसबुकिया कागज़ी शेरोन के लिए मनु महाराज ने एक बात और कही थी  ----
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षतिः। 
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोवधीत। ---अध्याय 8 श्लोक 15 
भावार्थ ----- जो पुरुष धर्म का नाश करता है , उसी का नाश धर्म कर देता है। और जो धर्म की रक्षा करता है उसकी धर्म भी रक्षा करता है। मारा हुआ धर्म हमको कभी न मार डाले, इसलिए धर्म का हनन या त्याग कभी नहीं करना चाहिए।
पूर्वज पढ़े नहीं और खुद कुछ पढ़ना नहीं चाहते और दोष देते हैं #मनु को कि उन्होंने शूद्र बना दिया। जो प्रमाणपत्र लेकर खुद को शूद्र कहते हैं उन्हें सुझाव है कि पढ़ें लिखें अपनी मानसिकता सुधारें और अपना वर्ण बदलें ( जिसकी आज के समय में कोई अहमियत नहीं बची है। ) बाकि मूक दर्शकों से निवेदन है कि यदि ज़मीन पर कच नहीं कर सकते तो आभासी दुनिया में ही इस पोस्ट को शेयर करके भ्रांतियों को दूर करें एवं अपने जीवित होने का प्रमाण दें।
जिसके दिल में भी 6 दिसंबर 2016  को जयपुर में मनुस्मृति जलने के अरमान हैं, वो पूरा दम लगा कर कोशिश कर ले ,----------