रविवार, 19 अगस्त 2018

आज भी हम बाँटे जा रहे हैं


1)आज मेरे बहुत से आहत भाई #नोटा_नोटा चिल्ला रहे है
 2) सिर्फ 70 से 80 साल लगे भारतियों को अपनी जड़बुद्धि के कारण अपनी जड़ों और संस्कृति से कटने के लिए।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद ,अंग्रेज़ों ने इस संग्राम का पूरा विश्लेषणात्मक अध्ययन किया और चिन्हित किया उन वर्गों को जिन्होंने इसमें हिस्सा लिया था। जिन सेनाओं ने इनका विरोध किया था उन्हें विघटित कर दिया। जिन्होंने इनका साथ दिया था उन्हें पुरुस्कृत करके अपने साथ मिला लिया। वैसे तो मुसलामानों ने भी विद्रोह में इनके खिलाफ लड़ाई लड़ी थी लेकिन, हिन्दू मुस्लिम भेद इन्हे मालूम था जिसके चलते मुसलामानों को गोद में बिठाने के लिए प्रलोभन दिए गए और पहले से हिन्दू मुस्लिम में पड़ी हुई फूट की खाई को और चौड़ा करना शुरू कर दिया । और एक वर्ण विशेष ( आप खुद समझने की कोशिश करें, मैं किस वर्ण को इंगित कर रहा हूँ) जिसने भारत भर में इनके खिलाफ विद्रोह का तंत्र तैयार किया था उसका ये सीधे तौर पर तो कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे तो उसके खिलाफ इतिहास लिख कर कर दुष्प्रचार शुरू दिया। #आर्यन_इन्वेजन_थ्योरीऔर मंदिरों का चढ़ावा वसूल कर आर्थिक रूप से कमर तोड़ने वाला #रिलीजियस_एंडोमेंट_एक्ट_1863 इसी दिशा में कुछ कदम थे।
माइकल मैकॉलिफ , इंग्लैंड के इसाई परिवार में पैदा हुआ और 1864 में पंजाब सूबे में प्रशासनिक अधिकारी के रूप में भेजा गया जो कि 1893 में पंजाब से ही सेवानिवृत हो गया और सिख धर्म अपना कर वहीँ बस गया। 1903 में प्रकाशित मैकॉलिफ के एक लेख " A Lecture on the Sikh Religion and its Advantages to the State" में 1901 की जनगणना का सन्दर्भ देते हुए , लेखक कहता है कि " पिछली जनगणना के दौरान गाँवों के सिखों ने अपने आपको हिन्दू बतया था, जो दरअसल वे थे भी"।
फिर 1980 के दशक में अचानक ऐसा क्या हो गया कि पंजाब की सड़कों पर हिन्दू मारे जाने लगे , खालिस्तान कमांडो फ़ोर्स , बब्बर खालसा जैसे संगठन खड़े हो गए। मजे की बात की खालिस्तान को चाहने वाले जितने भारत में थे उससे ज्यादा इंग्लैंड कनाडा और पकिस्तान में थे और हैं। आज भी अफगानिस्तान और पकिस्तान के सिखों की किसी को चिंता नहीं है, मगर भारत के उस हिस्से पर खालिस्तान चाहिए जिसके नक़्शे में ननकाना साहिब जैसी महत्वपूर्ण जगहे हैं ही नहीं।
हिन्दुओं को खंड खंड करने का प्रयास तो पहले से ही चल रहा था, उसमे इज़ाफ़ा किया 1911 की जनगणना से। प्रान्तीय अधीक्षकों को आदेश दिए गए कि जिन्होंने अपने आप को सिर्फ हिन्दू घोषित किया है , उनकी जातियाँ और कबीले चिन्हित करके उनमे से प्रत्येक से निम्न सवाल पूछे जाएँ कि क्या वे ---
1) ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का खंडन करते हैं
2) उन्हें ब्राह्मणों या अन्य हिन्दू गुरुओं से मन्त्र दीक्षा नहीं दी जाती है।
3) वे हिन्दू देवी देवताओं को नहीं पूजते है।
4) अच्छे ब्राह्मण उनके पारिवारिक अनुष्ठान नहीं करते।
5)मंदिरों के गर्भगृहों में उनको प्रवेश की अनुमति नहीं है।
6) मृतकों को दफ़न करते हैं।
7) गौमांस का भक्षण करते हैं और गौ को पूजनीय नहीं मानते।
1911 की इसी जनगणना के आधार पर अपने तय पैमानों पर शेड्यूल कास्ट की सूची तैयार की और हिन्दू धर्म से अलग कर दिया। 1931 की जनगणना आते आते हिन्दुओं की जनगणना जातियों के आधार पर की जाने लगी और अनुसूचित जातियां और जनजातियां हिन्दू धर्म से अलग रख कर गिनी जाने लगीं। जातिप्रथा ईसाईयों और मुसलामानों में भी थी लेकिन उन्हें एक समूह में ही रखा गया।
बाकि इतिहास सबको मालूमहै कि कैसे संविधान, वामपंथियों ,मिशनरियों ने ,सत्ता के लालची नेताओ और मंडल कमीशन किसी ने कोई मौका नहीं छोड़ा हिन्दुओं के जेहन में ज़हर भरने का। गौर करें 70_से_80_साल भी नहीं लगे जड़ों से काटने और अपनों से अलग होने में।
रही बात #नोटा की तो सुप्रीम कोर्ट ने जब जब आरक्षण ( जो कि संविधान सभा के अनुसार 10 साल के लिए था) से उपजीत कुंठाओं का निराकरण करने की कोशिश की तब तब संसद ने 76वां , 77वां,81वां, 82 वां, 85 वां ,93वां संशोधन करके ऐसी छुरी से मक्खन लगाया जिससे एक को तो मक्खन लगा मगर दूसरे को ज़ख्म दे दिया।
इस मुद्दे पर मैं बिलकुल किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ। दिल मोदी के साथ है पर दिमाग कह रहा है कि या तो मोदी, विपक्ष और कैम्ब्रिज एनलिटिका के फेंके हुए जाल में फंस गए हैं या मेरे भाई।
आप मुझे मोदी या बीजेपी का गुलाम कह सकते हैं, पर याद रखियेगा आज ये स्थिति हिन्दू महासभा को और जनसंघ को वोट न देने के कारण आयी है। 2019 में मुसलमान अपना हित देखते हुए एकतरफा वोट डालेंगे। क्षेत्रीय दलों के समर्थक जिसमे ममता माया लालू मुलायम और आपको इस दशा में पहुँचाने के लिए ज़िम्मेदार कांग्रेस के समर्थक इन पार्टियों को वोट डालेंगे। आप #नोटा दबाएंगे उससे सिर्फ जीत हार का फासला कम होगा और जीते कोई भी हार आपकी ही होगी।
वैसे बहेलिये और अलग अलग दिशाओं में उड़ने वाले कबूतरों की कहानी तो याद होगी ही।
Facts about census , have been taken from "FALLING OVER BACKWARDS" By Arun Shourie 

शनिवार, 11 अगस्त 2018

#रूस_के_जासूस_का_भारत_को_तोड़ने_वाले_भारतियों_का_पर्दाफाश

#रूस_के_जासूस_का_भारत_को_तोड़ने_वाले_भारतियों_का_पर्दाफाश 

दूध तो आप सभी मित्रों ने ज़िन्दगी में कभी उबाला होगा और यह भी अनुभव किया होगा कि आप खड़े खड़े दूध के उबलने का इंतज़ार कर रहे हैं और फिर आपका ध्यान जरा सा चूका कि दूध अचानक से उबल कर बर्तन से बाहर। फिर करते रहिये साफ़ सफाई और सुनते रहिये दुनियाभर की बातें।
आज जो कांवरियों पर, गौरक्षकों पर, दलितों के मुद्दों पर , अल्संख्यकों के मुद्दों पर, जेएनयू में अचानक से उबाल नज़र आ रहा है वो एक दिन, एक महीने, एक साल या एक दशक की कहानी नहीं है। उसकी पतीली गैस पर आज़ादी मिलने के दिन से ही चढ़ा दी गयी थी।
यूरी बेज़मैनोव रूस का एक जासूस था जिसे इन्दिरा गाँधी की सरकार के दौरान केजीबी के एजेंट के रूप में भारत भेजा गए था। इंदिरा गाँधी तक को इस बात की भनक नहीं थी कि दुभाषिये के रूप में ये जासूस है। एक अमेरिकन टीवी को अपने इंटरवयू में बेज़मैनोव बताता है कि उसकी टीम को भारत में "#यूज़फुल_इंडियन_इडियट्स का ब्रैनवॉश करके वामपंथी आइडियोलॉजी वाला गैंग तैयार करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी थी।
उन्हें रसूखदार व्यक्तियों, भारतीय मीडिया से जुड़े व्यक्तियों, फिल्मकारों , शिक्षा जगत से जुड़े बुद्धिजीवियों, अहंकारी और सनकी व्यक्तियों जिनके कोई आदर्श और नीतियाँ न हों ऐसे लोगों को भर्ती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था।
उदाहरण के लिए , सुमित्रा नन्दन पंत जिन्होंने " Rhapsody To Lenin" लिखी थी , इस कारण उन्हें रशिया आमंत्रित किया गया , जिसका पूरा खर्च रूस की सरकार ने वहन किया था। #लिंक में सुमित्रा नंदन पंत जिस सभा में खड़े हो कर कुछ कह रहे हैं हैं उनकी मेज पर शराब की बोतलें नज़र आ रहीं है। इन शराब की बोतलों की तरफ इशारा करते हुए बेज़मैनोव कहता है कि मेहमानों की जागरूकता और जिज्ञासा को मारने का यह एक तरीका था। केजीबी के कार्यों में एक मुख्य कार्य मेहमानों को हमेशा नशे में धुत्त रखना होता था। जैसे ही कोई मेहमान मास्को एयरपोर्ट पर उतरता था उसे मेहमानों के लिए बनाये गए विशिष्ट कक्ष में ले जाया जाता था और दोस्ती के नाम पर एक जाम होता था। एक गिलास वोदका फिर दूसरा गिलास वोदका और कुछ ही समय में मेहमान को दुनिया गुलाबी नज़र आने लगती थी। और 10-15 दिन जब तक मेहमान रशिया में रहता था तब तक उन्हें इसी हालत में रखा जाता था।
आगे यूरी बेज़मैनोव बताता है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेस्सरों ,वामपंथी और वामपंथ की तरफ झुकाव रखने वाली पार्टियों , लेखकों, कवियों, भारतीय मीडिया , समाचार पत्रों, नक्सलवादियों और माओवादियों को आज़ादी के बाद से ही रूस वामपंथी आइडियोलॉजी को भारत में फ़ैलाने के लिए फंडिंग करता चला आ रहा है।
अपने अभियान के पहले चरण में उन्होंने जेएनयू और डीयू के प्रोफेसरों से दोस्ती की। दुसरे चरण में ये इन प्रोफेसरों को इंडो सोवियत फ्रेंडशिप सोसाइटी की बैठक में बुलाते थे। इन मीटिंग्स का पूरा खर्च सोवियत सरकार वहन करती थी। इन प्रोफेसरों को यकीं दिलाया जाता था कि वे बहुत गंभीर और विलक्षण किस्म के बुद्धिजीवी हैं। जबकि असल भावना इसके बिलकुल विपरीत होती थी। उन्हें बुलाया इसलिए जाता था क्योंकिवे " यूज़फुल इडियट्स" होते थे और वे सोवियत संघ द्वारा पढ़ाई गयी पट्टी को बहुत एकाग्र चित से कंठस्थ करके भारत आते थे और फिर अपने द्वारा पढ़ाये जाने वाले हर विद्यार्थी को वामपंथ की वही पट्टी दशकों तक पढ़ाते थे। (जरा सोचिये --जेएनयू की निवेदिता मेनन क्या इसी श्रेणी में तो नहीं आतीं ???)
बेज़मैनोव के अनुसार भारत के वामपंथ, लेफ्टविंग मीडिया छदमबुद्धिजीवियों, लेखकों और पत्रकारों को इस समय पाकिस्तान की आई इस आई (ISI) पोषित और संचालित कर रही है। जो लोग सोवियत और आईएसआई की विचारधारा को आगे बढ़ाते हैं उन्हें मीडिया के शोर और फ़र्ज़ी जनमत के आधार पर महत्वपूर्ण पदों पर बिठा दिया जाता है। और जो इनकी विचारधारा का समर्थन नहीं करते उनकी या तो हत्या कर दी जाती है या चरित्र हनन करके उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा जाता।
किसी दिन बेज़मैनोव की आत्मा को भारत के के खिलाफ इन षड्यंत्रों ने जगा दिया और वे इनसे दरकिनार होने के लिए भूमिगत हो गए। भारत सरकार ने उनकी गुमशुदगी के विज्ञापन छपवाए जिससे जब वे मिल जाएँ तो उन्हें रूस सरकार के सुपुर्द कर दिया जाए। लेकिन बेज़मैनोव को मालूम था की यदि वे पकडे गए तो रूस की सरकार उन्हें मरवा देगी इसलिए वे चुप कर कनाडा चले गए जहाँ उन्होंने कुछ टीवी इंटरव्यू दिए जिनमे से एक का अंश यह है।
बेज़मैनोव का मानना था कि यदि भारत में स्थिति सुधारनी है तो आज इसी वक़्त से शिक्षा प्रणाली और व्यवस्था बदलनी होगी तब कहीं अगले 20-25 सालों में बदलाव आना शुरू होगा।
परन्तु जैसा कि उन्हें अंदेशा था रूस की सरकार ने उन्हें ज्यादा मुंह खोलने का मौका नहीं दिया और हत्या करवा दी।
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अब आपको समझ आया कि रात में हुई घटना में सुबह पीड़ित की जाति कैसे छप जाती है ?? अब आपको पता चला कि जुनैद , पहलु खान , अख़लाक़ , गौरी लंकेश तो महीनो भर सुर्ख़ियों में छाते हैं लेकिन प्रशांत पुजारी को कोई नहीं पूछता। अब आपको पता चला कि कठुआ पर फ़िल्मी अदाकाराओं के पेट में दर्द क्यों होता है मंदसौर और बाड़मेर पर क्यों नहीं होता ??? अब आपको पता चला कि रोहिंगिया मुसलमानों पर सुप्रीम कोर्ट को दर्द क्यों होता है लेकिन पकिस्तान से आये हुए प्रताड़ित हिन्दू शरणार्थियों को जबरदस्ती वापिस भेजने पर किसी की आह नहीं निकलती ??? अब आपको मालूम पड़ा कि सेना पर पत्थर फेंकने वालों के खिलाफ पेलेट गईं चलाने की मनाही क्यों होती है और उन पर से केस क्यों वापिस हो जाते है और कांवरियों पर अटोर्नी जनरल और सुप्रीम कोर्ट क्यों एक साथ चिल्ला पड़ते है ??? अब आपको पता चला कि बँगाल में और केरल में हिन्दुओं की हत्यायों पर चर्चा क्यों नहीं होती और अलवर का आदतन गौतस्कर रक्बर खान क्यों पूरा सिस्टम हिला देता है ???? अब आपको पता चला कि ईसाई चर्चों और मदरसों में बलात्कारों की ख़बरें कैसे छुप जातीं हैं और सिर्फ हिन्दुओं की ख़बरें कैसे हफ़्तों तक चलायी जातीं हैं ???
इसके लिए मीडिया और देशद्रोही ताकतें जितनी जिम्मेदार हैं उतने ही है हमारे बीच में फैले हुए useful idiots भी जिम्मेदार हैं जो अपनी वृहदमानस्किता दिखाने के फेर में इन षड्यंत्रकारियों के साथ खड़े हो कर उनका मनोबल बढ़ाते हैं या कुछ ऐसे भी हैं जैसे आज एक मित्र की कांवरियों पर ( दो भाई अपने माँ बाप को काँवर में ले जा रहे हैं)वाली पोस्ट पर एक तूचिये यदुवंशी की टिपण्णी देखी कि " जिनके पास कोई काम नहीं होता वो काँवर ले कर जाते है। "
करते रहिये साफ़ सफाई और सुनते रहिये दुनियाभर की बातें। अभी बहुत लड़ाई बाकि है।

शनिवार, 27 जनवरी 2018

इस्लाम के नीव है जिहाद

दुनिया भर में जब कोई आतंकी घटना होती है , तो रेत में सिर घुसेड़े शतुरमुर्ग एक सुर में बोलते हैं कि आतंकवाद का मज़हब नहीं होता। आतंकवाद का मज़हब सिर्फ और सिर्फ इस्लाम है और दुनिया को बेवकूफ बनाने वाले मुसलमान किसी को ये नहीं बताते कि इसके बीज कुरान जब डिक्टेट की जानी शुरू की थी उस समय कुरान में बोये गए थे और जिसने कुरान नहीं पढ़ी या आयतों के बताये जाने का इतिहास और सिलसिला नहीं जाना वो हर शख्स अपनी अज्ञानता या मुसलमानों के अतिवादी रवैय्ये से डर कर बोलता है कि " आतंकवाद का कोई मज़हब नहीं होता ".
पोस्ट को संक्षिप्त रखने के लिए पूरा इतिहास नहीं लिख रहा हूँ, लेकिन एक बात दिमाग में बिठा लीजिये कि आज किसी पढ़े लिखे या जाहिल मुसलमान से यदि मोहमद के माका से मदीना जाने की बात करेंगे तो वो आपको बहुत ही दर्दनाक कहानियाँ सुनाएगा कि मक्का के कुरेशों ने मोहम्मद और इस्लाम अपनाने वालों को बहुत प्रदित किया और उन्हें मक्का से निकल दिया।  ये सब झूटी कहानियाँ है। जबकि हकीकत यह है कि वर्ष 610 से लेकर 623 (मदीना जाने का वर्ष) तक मोहम्मद और इसके अनुयायियों ने मक्का में रहने वाले बहुदेव पूजक कुरेशों , यहूदियों, ईसाईयों , हनफ़ियों , पारसियों की  ज़िन्दगी हराम कर दी थी। और जब मक्का में 13 साल में 100-125 से ज्यादा अनुयायी नहीं बना पाया तो मदीना के लोगों को प्रेरित करने के लिए खुद मदीना गया था।   ( कोई ज्यादा बहस करे तो उसे "इब्न इस्हाक़" -तत्कालीन इतिहासकार की "सीरत रसूल " को पढ़ कर अपना मत निर्धारित करने के लिए कहिये। 
कुरान में 164 जगह काफिरों और मुशरिकों (मूर्तिपूजकों ) के खिलाफ आदेश दिया है। शुरूआती दिनों में  इस्लाम के नए नए अनुयायी अपने कुरैश सम्बन्धियों से लड़ना नहीं चाहते थे तो एक आयत 2:190 ( तुम लड़ो अल्लाह की राह में जो तुमसे लड़ने लगें _________) पढ़कर आपको लगेगा कि इसमें गलत क्या है , लेकिन , यदि मक्का के कुरेश असहिष्णु होते तो उस समय मक्का के के काबा में 360 अलग अलग देवताओं और धर्मों को मैंने वालों की मूर्तिया न होतीं और उसी मक्का में कुरैश , यहूदी , ईसाई और हनीफ धर्म को माने वाले मिलजुल क्र न रह रहे होते।
मक्का के लोग धार्मिक असहिष्णु नहीं थे यह बात अगली आयत से साफ़ हो जाती है --- सूरा 2 आयत 191 और उनको क़त्ल कर करो जहाँ उनको पाओ और उनको निकाल कर बाहर करो जहाँ से उन्होंने तुमको निकलने पर मजबूर किया है , #और_शरारत_क़त्ल_से_भी_ज्यादा_सख्त_है। यहाँ मोहमद ने एक बार नहीं बताया कि कुरेशों और उनके धर्म की बेइज़्ज़ती कौन करता था ??? और इन हरकतों के कारण 617-619 तक के सामाजिक बहिष्कार के इलावा कुरेशों ने मोहम्मद के साथ  कौन सी मार काट या प्रताड़ना दी थी ??? फिर 619 से 623 तक  अगर कुरैशों ने न चाहा होता तो ये मक्का में कैसे रहा ??  उपरोक्त आयत में गौर करें कि मोहम्मद और खुदा की निगाह में शरारत क़त्ल से भी बढ़ कर है। 
फिर आयत आती हैं 2:192 , फिर अगर वे लोग बाज आ जाएँ ( और इस्लाम कबूल कर ले) तो अल्लाह बक्श देंगे , 2:193 और उनके साथ इस हद तक लड़ो कि शिर्क न रहे और उनका दीं अल्लाह का हो जाये।  इस तरह शुरुआत में इस्लाम नए अनुयायियों को जो अपने रिश्तेदारों सेज सम्बन्धी कुरेशों से लड़ना नहीं चाहते थे ,अल्लाह ने 164 आयते कह कर जिहाद के लिए उकसाया है। 
खुदा ने वायदा किया था जो इस्लाम कबूल लेगा उसे बेहतरीन ज़िन्दगी देगा , मगर मक्का से आये हुए लोगों को मदीना के यहूदी  पाल रहे थे। खुदा की बात सच करने के लिए और ज़िन्दगी चलने के लिए इन बेरोज़गारों को पैसे की ज़रुरत थी। तो मोहम्मद ने फरवरी 623 में कुरेशों के खिलाफ पहले ग़ज़वे का ऐलान किया और हार गया।  अगले दो महीनो में दो बार और प्रयास किया जिनमे सफल रहा।  आठ महीने शांत बैठने के बाद  जनवरी 624 में मोहम्मद ने अपने 8 गुर्गो को अब्दुल्लाह इब्न जहश के नेतृत्व में एक मक्का के व्यापारिक काफिले को #नखला के पास लूटने के लिए भेजा।  उमरा का महीना था।  एक मुसलमान ने सिर मूँवा कर ऐसा प्रदर्शित किया जैसे तीर्थ यात्री है।  इन्होने काफिले के चार सदस्यों में से 1  को मार दिया , दो को पकड़ लिया और एक भाग गया।  लूट में खूब माल मिला। लेकिन नये मुसलमान इस मारकाट और लूटपाट के खिलाफ थे तो एक और आयत 8:69 उनको सुना दी गयी  --- सो जो कुछ तुमने लिया उसको हलाल पाक (समझकर) खाओ और अल्लाह से डरते रहो , बेशक अल्लाह तआला बड़े बख्शने वाले बड़ी रेहमत वाले हैं।  इसके साथ ही 8: 41 ---और जान लो कि जो चीज़ (काफिरों ) से गनीमत के तौर पर तुम्हे हासिल हो तो (उसका हुक्म यह है कि ) कुल माल का पाँचवाँ हिस्सा अल्लाह और उसके रसूल का है ______________ 

फिर जो मज़ा खुदा की हिदायत और अनुमति से लूटपाट , मारकाट करके जीने में आने लगा उसका सिलसिला आज तक न थमा।
मगर अफ़सोस  इस्लाम के इस चरित्र को दुनियाभर के काफिरों को या तो  आज तक यह समझ में ही नहीं आया या वो भी कुरैश ही बने रहना चाहते हैं जो समय रहते चेते नहीं और एक ही रात में मोहम्मद के आदेश #असलिम_तसलाम ( अगर सुरक्षित रहना चाहते हो तो इस्लाम कबूल कर लो) पर मुसलमान हो गए। 

( जिन्हे उपरोक्त पोस्ट पर संशय हो वे, इस्लाम को छोड़े हुए मुसलमानो Ali Sina , और M .A Khan को अवश्य पढ़ें)


हाँ कौन बेवकूफ कह रहा था इस्लाम शांति का मज़हब है ??? अबे ऐसा कहने वालो अपने आप तो मरोगे अपने बच्चों को भी मरवाओगे और अपनी औरतों को माले गनीमत में बँटवाओगे।  

शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

चर्चों का षड्यंत्र


सोते रहियेगा - - 1956 में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा नियुक्त #नियोगी_कमीशन की ईसाई मिशनरियों के षड्यंत्रों का पर्दाफाश करती "रिपोर्ट आफ क्रिस्चियन मिशनरी एक्टीविटीज़ इन्क्वायरी कमेटी मध्यप्रदेश 1956" (1950-54) जो कि मध्यप्रदेश सरकार ने छपवायी थी, बाजार में आने के कुछ दिनों बाद ही बाजार से ईसाईयों ने खरीद कर गायब कर दी। यहां तक कि पुस्तकालयों से भी इशू करवा कर कभी वापिस नहीं कीं। ( सत्यता जानने के लिए रिपोर्ट की मूल रचना कहीं ढूंढ कर दिखा दें। सनद रहे कुछ हिन्दुओं द्वारा बाद में प्रकाशित इसके सारांश की बात नहीं कर रहा हूं)। नागपुर हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश डाॅ एम भवानी शंकर नियोगी जो कि इस कमेटी के अध्यक्ष थे उन्होंने मिशनरियों को नंगा करके रख दिया था अपनी इस रिपोर्ट में।
13 जनवरी 1989 को इंडियन ऐक्सप्रेस ने खुफिया विभाग की एक गोपनीय रिपोर्ट प्रकाशित की कि कुछ संगठनों को अलग #झारखंड राज्य बनाने के लिए विदेशों से भरपूर पैसा मिल रहा है। किसी सदन या मंच पर इसकी चर्चा नहीं हुई हां सिर्फ ईसाई मिशनरी ने इस खबर पर विरोध दर्ज किया। सिर्फ इन्होंने ही क्यों??? इतिहास बताता है कि 15 नवम्बर 2000 को झारखंड अलग राज्य बना दिया गया।
तेलंगाना, जो अलग राज्य बना उसके मुख्यमंत्री का अल्पसंख्यक प्रेम आपको इस प्रकरण में ज्यादा सोचने का कष्ट नहीं देगा। न ही बोडोलैंड और गोरालैंड नाम के अलग राज्यों की मांग और नकसलियों को फंडिंग कहां से हो रही है इसमें ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत है।
आजादी के समय नार्थ ईस्ट राज्यों में ईसाईयों की जनसंख्या 1.23%थी जो 2001 में 39.8% हो गई।नार्थ ईस्ट के कुछ राज्यों में इनकी जनसंख्या में 1951 से 1971 के बीच 250 से 300% बढोतरी दर्ज की गई है।
1955 में पहली बार फिर 1960 में दूसरी बार लोकसभा में धर्मांतरण विरोधी बिल पेश किया गया था जिसे नेहरू ने पास नहीं होने दिया था।
द्वितीय विश्व युद्ध के समय भारत में 50000 चर्च थे। 1977 में 369681 चर्च थे और आज की स्थिति जानने के लिए जब गूगल बाबा की सेवा ली तो इन्हीं की एक साईट #500K_Churchके अनुसार भारत में पांच लाख चर्च बनाने हैं।
चिकित्सा के क्षेत्र में इनके बढ़ते वर्चस्व और शिक्षा के क्षेत्र में एकाधिकार स्थापित करने के दिशा में बढ़ते इनके कदमों पर आंकड़े आने वाले दिनों में पेश करूंगा लेकिन उस संदर्भ में आज यह जान लीजिये कि 21 नवम्बर 1995 में "नेशनल कोआरडिनेशन कमेटी फार शेड्यूल कास्ट क्रिस्चियन" तथा कैथोलिक बिशप कांफ्रेंस आफ इंडिया (CBCI) ने दलितों को दिये जाने वाले फायदे #ईसाई_दलितों को भी दिए जाने की मांग को लेकर भारत भर में 10000 स्कूल और 240 कालेज बंद रखे।
इन दोनों संगठनों ने यही बंद दुबारा अक्टूबर 1997 में दोहराया जब बिहार के दुमका में एक पादरी को एक आदिवासी लड़के की #_$#& मारने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।
जिनको गलतफहमी है कि "भगवा आतंकवाद" और "फेनेटिकल हिन्दू कम्युनलिस्ट" (असहिष्षणु हिन्दू) राहुल गांधी या वर्तमान की देन हैं तो वे भी अपनी गलतफहमी दूर कर लें। ये दोनों शब्द नेहरू और तत्कालीन कांग्रेस ने 1955 में ही ईसाई मिशनरी के उकसावे पर ईजाद किये थे। राहुल और वर्तमान कांग्रेस तो वक्त वक्त पर उसे धो पोंछ कर और चमका कर दुनिया के सामने रख दुनिया में चल रहे हिन्दुओं के खिलाफ ग्लोबल टेररिज्म में अपनी हिस्सेदारी अदा कर रही है।

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

हिन्दुओं के खिलाफ वैश्विक षड्यंत्र



माँ दुर्गा को अपशब्द कहे जाते है , महिषासुर मंडन किया जाता है , मूलनिवासी शब्द की परिकल्पना की जाती है , गाय का माँस खाना प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया जाता है। आपको क्या लगता है कि एक सदी में ही सीधे सादे हिन्दुओं के जैविक गुणों में इतना परिवर्तन हो गया कि वे अपने बाप दादाओं की आस्था को ताक पर रख देंगे। हिन्दुओं के धर्म का बलात्कार हो रहा है और कविता कृष्णन ,गौरी लंकेश जैसे धर्मनिरपेक्ष उसे सम्भोग समझ कर अपनी इज़्ज़त लुटवाने में मस्त हैं। फेसबुक पर मेरे कुछ मित्रों को मैकाले ने जो धर्मनिरपेक्षता का चश्मा पहना रखा है उसे मैं एक आध टिप्पणी से नहीं उतार सकता। बहुत मन करता है कि उनसे कहूँ कि इस समय  दुश्मन गौरी , ग़ज़नवी , औरंगज़ेब, रोबर्ट क्लाइव ,या जनरल डायर सामने से नज़र आने वाले नहीं हैं , वैश्विक शक्तियां वामपंथियों , ईसाईयों और इस्लाम के के साथ मिल कर बहुत महीन तरीके से आपको हलाल कर रहीं हैं लेकिन प्रमाण होते हुए भी ये लोग देखना क्यों नहीं चाहते ???
ऐसा नहीं है कि आपने कभी नहीं सुना होगा कि मिशनरी / कान्वेंट स्कूलों में राखी जैसा त्यौहार भी नहीं मनाने देते तो फिर इस बात का प्रतिरोध क्यों किया जा रहा है कि हिन्दू बाहुल्य स्कूलों में क्रिसमस मनाने के लिए बाध्य न किया जाये ???  
क्या कभी सोचा कि क़त्ल तो रोज़ ही होते हैं फिर अख़लाक़, पहलु , जुनैद, अफ़ज़ारूल की हत्या ऐन चुनाव से पहले क्यों होती है और यह राष्ट्रीय मुद्दा बनकर सिर्फ चुनावों तक ही क्यों ज़िंदा रहता है ???? क़त्ल और बलात्कार तो रोज़ होते हैं फिर ख़बरों की सुर्खियां यह ही क्यों बनते हैं ???
मान लिया कश्मीर के समय इंटरनेट और सोशल मीडिया नहीं था, मगर 2011 में हुए आसाम के दंगे, उसके बाद पश्चिम बंगाल में ऐन त्यौहार के दिनों में दंगे, केरल के हिन्दुओं की हत्याएं , कैराना से हिन्दुओं का पलायन ये सब राष्ट्रीय मुद्दा क्यों नहीं बनते, बोडो ईसाईयों ने पिछले दस सालों में बीस हज़ार से ज्यादा हिन्दुओं को मार दिया , कहीं किसी ने  मोमबत्ती जलाई ???
सुकमा में 70 CRPF के जवानों के मरने पर जश्न और अफ़ज़ल / याकूब मेमन के मरने पर मातम कौन मनाता है  ??? देशद्रोहियों को नायक कौन बनता है ???

बहुत हो हल्ला किया था कुछ खास वर्ग  लोगों और NGOs ने जब 25 NGO का राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के कारण और 11319 NGOs  का लाइसेंस उनकी संशयात्मक गतिविधियों के कारण  2015-16 में निरस्त किया गया। कितना पैसा आता है विदेशों से ???
गृह मंत्रालय के हवाले से 2002-03 में 5046 करोड़ रूपए, 2005-06 में 7500 करोड़ , 2011-12 में 10334 करोड़ , 2012-13 में 9423 करोड़, 2013 -14  में 13092 करोड़ 2014-15 में 14525 करोड़ , 2015-16  में 17208 करोड़। गौर करें जब से मोदी आये है तबसे भारत के ऊपर विदेशों से चंदा देने वालों की कृपा में इज़ाफ़ा होता जा रहा है। क्यों ???? जवाब आप खुद ढूंढिए। 

 
 द हिन्दू में प्रकाशित एक और  रिपोर्ट के अनुसार इस पैसे का 80% पैसा --दिल्ली, तमिलनाडु , केरल महाराष्ट्र , आंध्र प्रदेश, नार्थ ईस्ट स्टेट्स , कर्नाटक और पश्चिम बंगाल के राज्यों को जाता है। जबकि इस 80 %  का 33 % लगभग 4500 करोड़ केवल दिल्ली और तमिलनाडु में बैठी NGO को आता है।क्यों ??? भाई क्या गरीब यू पी और बिहार में नहीं रहते ??? फिर उपरोक्त राज्यों पर इतनी इनायत क्यों ??? यहाँ भी जवाब आप खुद सोचिये। 

वर्तमान पोप ने 1997 में एक वेटिकन दस्तावेज़ प्रस्तुत किया था ___#डोमिनस_जीसस जिसमे हिन्दू और बौद्ध धर्म की भरसक आलोचना की थी। इसी श्रृंखला में अमरीका में ईसाई मत के प्रचारक पैट रॉबर्टसन ने एक करोड़ हिन्दुओं को अगले कुछ वर्षों में बंधनों से मुक्त करवाने की घोषणा की थी। 
फरवरी 2004 के #तहलका अखबार के एक अंक में वी के शशिकुमार ने एक लेख लिखा था -- "Bush's Conversion Agenda for India " जिसमे #प्रोजेक्ट_जोशुआ (I) और (II)के विषय में बताया गया था।  इस प्रोजेक्ट के अनुसार भारत में धर्मप्रचारकों को 152786 पोस्ट ऑफिस चिन्हित करने थे।  इस प्रोजेक्ट के ऊपर चर्चा के लिए सितम्बर 2005 में Dallas और Texas में सम्मलेन हुआ कि भारत में 2020 तक 10 करोड़ ईसाई बनाने हैं। 

चूँकि चूतियों की आँखों पर धर्मनिरपेक्षता का चश्मा चढ़ा हुआ है इस लिए इन्हे न तो तमिलनाडु में पिछले 20  वर्षों में बने हुए 17500 चर्चों , 9700 मस्जिदों  और 370 मंदिरों के बनने की संख्या में कोई असमानता नज़र आती है न इन्हे धर्म  आधार पर तमाम राज्यों की जनसँख्या में होते  बदलाव  नज़र आ हैं न इन्हे तमाम मीडिया चैनलों , पोर्टलों और अखबारों के हिन्दू विरोधी प्रचार और मानसिकता का पता चलता है। आंकड़े बता रहे हैं कि 70 के दशक में अरुणाचल प्रदेश में 1710 ईसाई थे आज 12 लाख से ऊपर हैं। 780 चर्च हैं। त्रिपुरा में आज़ादी के समय ईसाई थे ही नहीं आज सवा लाख से ऊपर हैं और ये सवा लाख भी 1990 के बाद हुई 100% बढ़ौतरी के बाद हुए हैं। एक मित्र ने दो दिन पहले ही पश्चिमी चम्पारन के नरकटियागंज से सन्देश भेजा कि इनके घर के पास एक चर्च है जिसमे 100-150 लोगों का हर महीने धर्म परिवर्तन कर रहे हैं। इन मित्र के अनुसार 10 साल पहले यहाँ 50 ईसाई भी नहीं थे आज हजारों की संख्या में है। इस साल जब बिहार में बाद आयी तो मिशनरियों ने यहाँ खूब सामन बांटा लेकिन पता पूछ पूछ कर। आज उन्हीं पतों पर जाकर धर्मान्तरण कर रहे है। तमिलनाडु में 2004 आयी सुनामी के बाद ऐसे ही मदद बांटी, मदद के नाम पर बाइबिल भी बांटी  और नागापट्टिनम जिले का एक पूरा का पूरा गाँव धर्मांतरित कर दिया। 2014 की नेपाल की भूकंप त्रासदी में दुनिया जहान खाने पीने का सामन और कपडे भेज रही थी , मगर ईसाईयों ने पूरा का पूरा हवाईजहाज भर के बाइबल भेजी थी। दैविक आपदाओं से घिरे हुए लोगों की खरीदना कोई इनसे सीखे।  केरल के आंकड़ों में ईसाईयों की जनसँख्या तो 14% से 18.8% ही पहुंची है लेकिन जमीन और कृषि सम्बन्धी गतिविधियों में इनकी हिस्सेदारी 40%  और अन्य व्यवसायों में 31.5% के ऊपर है। हिन्दुओं की निष्क्रियता और निक्कमेपन की वजह मान सकते हैं कृषि और रोज़गारों में हिस्सेदारी घटने का लेकिन केरल में ईसाईयों के गॉड और भगवान् की कार्यशैली का फर्क समझिये। 
केरल में तटीय किनारों पर चर्चों में #मिरेकल_बॉक्सेस (चमत्कार डिब्बे) लगे हुए हैं।  इन डिब्बों में गरीब तबका अपनी जरूरत या इच्छाएं जैसे नाव खरीदने/ मकान खरीदने /लड़की की शादी के लिए पैसे चाहिए तो इसके अंदर लिख कर डाल  देते हैं।  और लीजिये कुछ दिनों में उनकी इच्छा पूरी हो जाती है। मगर हिन्दुओं के भगवान् ये सब नहीं कर पाते इसीलिए गॉड से मदद के अभिभूत  व्यक्ति पूरे परिवार के साथ ईसाई बन जाता है और अपने आस पड़ोस के लोगों को भी ईसाई बनने के लिए प्रेरित करता है। 

  इन सारी गतिविधियों के लिए भारत भर में 4000 से ज्यादा मिशनरी संस्थाएं , लाखों लोगों को इस रोज़गार लगाकर  पूरी मेहनत से यीशु भेड़ों को बटोरने मेंलगे हुए हैं। झुण्ड में से भेड़ें कम हो रहीं हैं सिर्फ यही कष्ट होता तो भी बर्दाश्त कर लिया जाता। लेकिन जो मुसलमान और ईसाई दुनिया भर में आपस में लड़ रहे हैं वो भारत में वामपंथियों के साथ मिल कर हर स्तर पर चाहें शारीरिक हो या बौद्धिक, चाहें धार्मिक हो या राष्ट्रीय, हिन्दुओं और भारत को नुक्सान पहुंचाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। नुक्सान पहुंचाने के लिए ये किसी भी छोटी से छोटी घटना जिसमे किसी नूं का ब्लातकार हो या चर्च के शीशे टूटना --पूरी  संसद हिला देते हैं और पूरे विश्व में हिन्दुओं  खिलाफ भरपूर दुष्प्रचार करते हैं। अंत में निकलता क्या है की ये घटनाएं शांतिप्रिय मज़हब के लोगों की दें थी लेकिन तब तक ये विश्वभर में हर स्तर पर हिन्दुओं को बदनाम कर चुके होते हैं। अलग राज्यों की मांग, हड़ताल, बंद, जेल भरो , रेल रोको, बांध न बनाओ, न्यूक्लिअर प्लांट न लगाओ, कोई फैक्ट्री न लगाओ  जैसी मुहिम इसी पैसे के दम पर चलतीं हैं। 
ज़ाकिर नायक का चंदा जग जाहिर हो गया है , लेकिन कभी सोचा हज के लिए सब्सिडी मांगने वाली कौम की मस्जिदें ीतिनि आलीशान किस पैसे से बन रहीं है ?? कभी सोचा जिन्हे ईसाईयों में हम मिशनरी कहते है इस्लाम में उसी काम को करने वालों को तब्लीगी बोलते हैं इन तब्लीगी गतिविधियों में संलिप्त ;आँखों लोगों का खर्च कहाँ से चलता है ???? 
हिन्दुओं के ऊपर तो रिलीजियस एंडोमेंट एक्ट भी थोप रखा है जिससे मंदिरों में चढ़ने वाला चढ़ावा भी सरकारें ले लेती है। चर्चों मस्जिदों और मजारों से क्या लिया जाता है ??? 
120 करोड़ लोगों के देश में आज 74% हिन्दू बचे हैं जो आज़ादी के समय 83 % होते थे। मुसलमान 8 % से बढ़कर 20 % हो गए। कोई बात नहीं। इन 120 करोड़ लोगों में सिर्फ 3.5% लोग इनकम टैक्स भरते है। अगर सिर्फ जनसँख्या को आधार मानलें तो भी सिर्फ 70 लाख मुसलमान ही टैक्स देते हैं और इन्हे हक़ भी चाहिए पूरे। क्यों न चाहे जब देश का पूर्व प्रधानमंत्री ही यह कहता है कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ मुसलामानों का है। मंदिरों का चंदा लुटवाने और सब तरीके के टैक्स देने के बाद , कश्मीर से केरल तक में मार खाने के बाद -------

कभी सोचियेगा क्या हिन्दू और हिन्दू धर्म इतना निकृष्ट हैं कि , हिन्दू नाम रखे हुए  साहित्यकारों , इतिहासकारों, नेताओं और नामचीन हस्तियों का क्या फायदा होता जब वे इन्हे असहिष्णु कहते हैं या तमाम तरीके की खामियां निकलते हैं ??? कभी सोचा कि कांचा इल्लैया,सुनील सरदार ,जॉन दयाल, ज़ाकिर नायक जैसे सैंकड़ों भारत में बैठे हुए आस्तीन के सांप हैं  जिन्हे विदेशो से यही सब करने के लिए पैसा आता है। पैसा आने का रास्ता साफ़ करतीं हैं कांग्रेस , वामपंथी और द्रमुक जैसी पार्टियां और इनके वो गुर्गे जो ऊँचे पदों पर बैठे हैं। 
ये जाल कितना फैला हुआ है इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि जब मोदी सरकार ने इन विदेशी फंडिंग पर प्रतिबन्ध लगे तो दर्द इन सिर्फ NGOs  ईसाई मिशनरी  और ग्रीनपीस जैसी संस्थाओं को ही नहीं हुआ यूनाइटेड नेशन्स तक के पेट में मरोड़ उठ गयी थी। क्यों ???? समझ पा रहे हैं न आप, भारत के खिलाफ कौन कौन काम कर रहा है ???? 
क्यों न हो हिन्दू असहिष्णु ???
कुछ भी लिख पढ़ ले हम मगर कल बहुत से लोग यही कहेंगे " मेरी क्रिसमस" यह कहना का दम ही नहीं है "तेरी क्रिसमस"

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

इस बिमारी कानाम है #मैकॉलिस्म

यह पोस्ट उन हिन्दुओं के लिए है जिन्हे अख़लाक़, जुनैद, पहलू और गौरी लंकेश की मौत पर प्रीमैच्योर डिलीवरी होगयी थी। जिन्हे अफ़ज़ारूल की हत्या और हिन्दू बाहुल्य स्कूलों में क्रिसमस के विरोध पर परेशानी और बेचैनी होने लगी थी  और भविष्य में बहुत बार होगी। उस बिमारी का नाम क्या है यह मैं पोस्ट के अंत में बताऊंगा ,लेकिन पहले इस बिमारी के 5 लक्षणऔर कारण गौर से और विस्तार से पढ़ लीजिये। 
1 ) इनका शुरुआती लक्षण है कि ये इस बात से इंकार करते हैं कि हिन्दू समाज और संस्कृति को किसी प्रकार का संकट है, आप इनके सामने कितने भी अकाट्य तर्क प्रस्तुत कर दीजिये अफगानिस्तान दिखा दीजिये , पकिस्तान दिखा दीजिये , कश्मीर दिखा दीजिये , केरल या बंगाल दिखा दीजिये पर तथ्यों को मानने की जगह ये आपको डर फैलाने वाला,साम्प्रदायिक,फासिस्ट और तरह तरह के नामों से सम्बोधित करने लगेंगे। ये हर शख्स को इन नामों से सम्बोधित करंगे जो हिन्दुओं के आत्मरक्षा के पक्ष में  बोलेगा। और इन सबके ऊपर तुर्रा ये कि दूसरे धर्मो की आक्रमकता को ये हिन्दुओं द्वारा किये जा रहे अत्याचारों का प्रतिउत्तर बताते हैं। 
2) दूसरे धर्मो के अतातायियों की आक्रमकता को ये बहुत ही दयनीय तरीके से वंचित और पददलित अल्पसंख्यक द्वारा हालातों के कारण  के रूप में पेश करते हैं ( गरीबी , भटके हुए नौजवान, बेरोज़गारी) जिन्हे हिन्दू समानता का हक़ नहीं देते जो संविधान ने उन्हें दे रखा है। 
3) इसके बाद वे पाखंड का आवरण ओढ़ कर सारी नैतिक ज़िम्मेदारी हिन्दुओं के सर पर डाल देते है , कि हिन्दू जिन्होंने इन्हे विशेषाधिकारों से वंचित किया है उनके उत्थान के लिए कुछ नहीं करते। हिन्दुओं का क्या खो जायेगा यदि हिन्दू अपने इन छोटे भाइयों के प्रति ज़रा सा उदार रवैय्या अख्तियार कर लेंगे। बेशक छोटे भाइयों से गलतियां हो जातीं है तो उनको माफ़ करने से हिन्दुओं का क्या चला जायेगा।
4) इतने में भी अगर हिन्दू न माना तो ये उग्र भाषण देना शुरू कर देते हैं कि हिन्दुओं के लिए यदि वाकई कोई डरने वाली बात है तो वो बाहरी आक्रमणों ( अन्य सम्प्रदायों) से नहीं बल्कि उनसे है जिन्हे हिन्दू की  व्यवस्था ने सदियों से प्रताड़ित किया था जिनके ऊपर सदियों से अत्याचार किये थे।  इन कारणों से हिन्दुओं का वंचित वर्ग दूसरे धर्मों और सम्प्रदायों की तरफ आकर्षित जहाँ उन्हें सम्मान और समानता मिलती है। यहाँ पर भी आप यदि सदियों से हुए अत्याचारों को , और इस्लाम और ईसाईयत में तथाकथित तमाम समानताओं को अकाट्य तर्कों से ख़ारिज कर दें तो वे अगले ब्रह्मास्त्र का  इस्तेमाल करते है। 
5) इनका ब्रह्मास्त्र यह है कि ये एकदम से आध्यात्म का चोला ओढ़ लेते हैं और फिर भाषण  शुरू होता है हिन्दुओं के  चिरकालीन संस्कारों और धार्मिक सहिष्णुता के परम्परा की दुहाई का। ( गौर करें यहाँ पर जितना उन्होंने इससे पहले हिन्दुओं को आततायी और अमानवीय करार दिया था , वो सब कुछ भूल जाते हैं) आपसे पूछा जाता है कि बुद्ध और गाँधी के देश के लोग कैसे इस्लाम और ईसाइयत के स्तर पर उतर सकते हैं ??? हिन्दू , हिन्दू नहीं रह जायेंगे यदि वे भी अन्य धर्मो के स्तर पर उतर जायेंगे। वो कभी ईसाईयों और इस्लाम के मानने वालों को यही या ऐसी कोई हिदायत देने दम नहीं रखते क्योंकि उन्हें मालूम है कि उन्हें नसीहत देने का मतलब वैसे ही गलियां खाना है जैसे हिन्दुओं को या ईसाईयों / इस्लाम का विरोध करने वालों को दी जाती हैं। ऐसा करके वो अपनी धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील छवि को बट्टा नहीं लगाना चाहते जिसका आवरण वे हिन्दुओं को अपशब्दों से नवाज़ कर ओढ़े घूम रहे हैं। 

किन लोगों में पाए जाते हैं उपरोक्त लक्षण ---- जो लोग मिशनरी / अंग्रेजी स्कूलों से पढ़ कर निकले हैं और अच्छे प्रतिष्ठानों में ठीक ठाक तनख्वाह पा रहे हैं या अपने व्यवसायों में लिप्त, अपने देश और धर्म से बिलकुल निर्लिप्त भारतीय इतिहास और संस्कारों से बिलकुल अनभिज्ञ हैं। इन्हें इससे कोई मतलब नहीं है कि गौमूत्र के अमरीका ने चार पेटेंट करवा लिए हैं लेकिन इनके लिए गौमांस पर प्रतिबन्ध इनकी खाने की स्वतन्त्रता और निजता पर हमला है। 
 इस बिमारी कानाम है #मैकॉलिस्म और यह सिर्फ #भारत_के_हिन्दुओं_में_ही_पायी_जाती_है।


 भारत में कांग्रेस और ईसाईयों का गठजोड़ समझने के लिए यदि मन करे तो नीचे वाला लिंक भी खोल कर पढ़ें। 



क्रमशः --- भारत में आपकी नाक के नीचे क्या हो रहा है ?????

शनिवार, 18 नवंबर 2017

पद्मावती का इतिहास


डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया में नेहरू ने खिलजी को महान बताया है और उसकी प्रशंसा की है कि उसने हिन्दू रानियों से शादी की थी।  हाँ नेहरू ने यह नहीं बताया कि खिलजी ने हिन्दू रानियों से शादियां कैसे उनके पतियों का क़त्ल करके कीं थीं। 

शांतिप्रिय मज़हब के अनुयायी और धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़े हुए हम विज्ञान और कॉमर्स के छात्रों को एक वाक्य में उड़ा कर चले जाते हैं कि रानी पद्मावती तो महज़ जायसी की कल्पना थीं उनका कहीं किसी इतिहास में कोई ज़िक्र नहीं है।
मेरे जैसे करोड़ों फेसबुक चलाने वाले जिनके ज्ञान का स्रोत फेसबुक या व्हाट्सएप है , बिना किसी प्रतिवाद के हाँ में हाँ मिला कर सन्नाटा खींच लेते हैं। 
इतिहास तो कुरान में बताये गए 6 दिन में दुनिया बनने का भी नहीं है। आदम और हव्वा ने सेब खाया था उसका भी नहीं है और चाँद के दो टुकड़े किये गए थे उसका भी नहीं। लेकिन रानी पद्मावती का इतिहास है , आपको पढ़ाया नहीं गया या आपने पढ़ा नहीं तो इसका मतलब यह नहीं है जलालुद्दीन अलाउद्दीन का चाचा और ससुर नहीं था। 
हो सकता है कि आपने इतिहास के पन्नो में यह ज़रूर पढ़ा हो अलाउद्दीन ने बेहद प्यार करने वाले अपने चाचा और ससुर को धोखे से मरवा कर अपने को 19 जुलाई 1296 को  सुलतान घोषित कर दिया था।
अपनी किताब #तारिख_ए_फ़िरोज़शाही में ज़िआउद्दीन बरनी ( 1285 -1357) अलाउद्दीन के बारे में लिखता है कि -----उसने अपने जीवन में दो उद्देश्य बनाये थे ;यथा ---वह एक नए धर्म को प्रचलित करना चाहता था तथा सिकंदर महान के समान विश्व विजय करना चाहता था। 
अपने प्रथम उद्देश्य में वह कहा करता था -----" ईश्वर ने अपने प्रवर्तक को चार मित्र प्रदान किये थे , जिनकी सहायता के आधार पर वह एक नए धर्म को चलाने में तथा उसका विस्तार करने में सफल हुआ था। ईश्वर ने मुझे भी चार मित्र उलूग खां , नुसरत खां,ज़फर खां और अलप खां प्रदान किये हैं। यदि मैं चाहूँ तो मैं भी उनके द्वारा एक नया धर्म चला सकता हूँ और अपनी तलवार द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को उस धर्म को मानने के लिए मजबूर कर सकता हूँ।"
दूसरे उद्देश्य के विषय में वह कहा करता था ---"मेरे पास अतुल धन-संपत्ति है एक सुसंगठित सेना है , जिसके द्वारा मैं विश्वविजय कर सकता हूँ। मैं अपनी अनुपस्थि में भारत साम्राज्य के लिए अपना प्रतिनिधि छोड़कर विश्व-विजय के लिए प्रस्थान करूँगा। 
इतिहासकारों के अनुसार  वर्ष 1300 में खिलजी ने उलूग खां और नुसरत खान को रणथम्बोर पर आक्रमण करने का आदेश दिया।  अनेक इतिहासकारों और अमीर खुसरो की #तारीखे_अलाइ या #ख़ज़ैन_उल_फुतुह के अनुसार भीषण युद्ध में नुसरत खान मारा गया और उलूग खान ने भाग कर #झाई के दुर्ग में जान बचाई। इसके बाद अलाउद्दीन भारी सेना को लेकर खुद रणथम्बौर पहुंचा और एक वर्ष तक निरन्तर युद्ध चले के पश्चात् जीत की कोई उम्मीद न देख कर उसने राजा हम्मीर देव के साथ छल कपट कर के दुर्ग के फाटक खुलवा लिए।  युद्ध करने लायक पुरुषों ने युद्द किया नारियों ने जौहर कर लिया। राजा हम्मीर देव लड़ते हुए मारे गए और किले को जीत कर उस का नाम दारुल इस्लाम रख दिया गया। 
वर्ष 1303 चित्तौड़ का युद्ध ----चित्तौड़ मेवाड़ की राजधानी था और चित्तौड़ का दुर्ग सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था।  यहाँ का राजा रत्न सिंह था।  अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर आक्रमण क्यों किया , यह प्रश्न इतिहास का एक विवादस्पद विषय है। 
रानी पद्मिनी की कथा -- कुछ इतिहासकार कहते हैं कि रानी पद्मिनी लंका के राजा गन्धर्व सेन की अत्यंत सुन्दर पुत्री थीं। राजा रतनसिंघ ने अपने हीरामन नमक तोते से उसकी प्रशंसा सुनी और उससे विवाह करके ले आये। एक दिन राघव चेतन नाम का साधु शाही महल में भिक्षा मांगने गया और वहीँ उसने रानी के आलोकिक सौंदर्य को देखा। उसी साधु से अलाउद्दीन को रानी पद्मिनी के अप्रितम सौंदर्य का ज्ञान प्राप्त हुआ और उसके दिल में उन्हें प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न हो गयी। अपनी कुचेष्टा के चलते उसने धोखे से राणा रत्न सिंह को बंदी बना लिया। सुलतान ने रानी को यह सन्देश भेजा कि यदि वे सुलतान की मलिका बनना स्वीकार कर लेंगी तो राजा रत्न सिंह को रिहा कर दिया जायेगा। रानी ने सुलतान के प्रस्ताव को स्वीकार करके एक चाल चली। उन्होंने पहले राजा से मिलने की अनुमति मांगी।  खिलजी तैयार हो गया।  800 सैनिकों को पालकियों में छिपा  कर यूँ जाहिर किया गया जैसे रानी मिलने आयीं हैं। अलाउद्दीन बहुत आतुरता से रानी के मिलने का इंतज़ार क्र रहा था, किन्तु पालकियों में छुपे राजपूतों ने अलाउद्दीन के करीब पहुंचते ही अचानक हमला बोल दिय और रजा रत्न सिंह को छुड़ा लाये। इसके बाद क्रोधित होकर सुलतान ने दुर्ग पर आक्रमण कर दिया। सुलतान के विजयी होने से पहले ही रानी ने अपनी दासियों के साथ जौहर कर लिया। 
इस कहानी की पुष्टि #श्रीनेत्र पाण्डेय, #अमीर_खुसरो और #जायसी, #जेम्स_टॉड करते हैं। परन्तु आधुनिक इतिहासकार इस कहानी का विशवास नहीं करते। 
इसके विपरीत #डॉ_आशीर्वादी_लाल_श्रीवास्तव का मत है कि --"आधुनिक इतिहासकारों का यह कथन कि यह जैसी की मनगढंत कहानी थी , गलत है। सत्य तो यह है कि जैसी ने प्रेमकाव्य की रचना की और उसका कथानक आमिर खुसरो के #खजान_उल_फुतुह से लिया है। पद्मावत में वर्णित प्रेम कहानी के विवरण की अनेक घटनाएं कल्पित हैं , किंतु काव्य का मुख्य कथानक सत्य प्रतीत होता है। अलाउद्दीन पद्मिनी कोप्राप्त करने का इच्छुक था , कामुक सुलतान को रानी का प्रतिबिम्ब दिखाया गया था और उसने धोखे से उसके पति को बंदी बना लिया था , ये घटनाएं सम्भवतः ऐतिहासिक सत्य पर आधारित हैं। "
परन्तु यह निर्विवाद है कि अलाउद्दीन को चित्तौर के घेरे में राजपूतों के साथ कड़ा संघर्ष करना पड़ा था और अंत में उसे विजय मिली थी।  रानी ने जौहर कर लिया और सुलतान के बेटे खिज्र खां को चित्तौड़ का शासक नियुक्त किया गया और तत्पश्चात चित्तौड़ का नाम खिज्राबाद रख दिया गया। 
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ऊपर एक पंक्ति में लिखा है कि जायसी की पद्मावत , #खुसरो की #खजान_उल_फुतुह से प्रेरित है । तो #खजान_उल_फुतुह में खुसरो ने क्या लिखा है ????
आमिर खुसरो 1273 में इल्तुतमिश का सिपाही बना उसके बाद , उसके बाद गयासुद्दीन बलबन के भतीजे छज्जू मलिक का , फिर बलबन के बेटे बुर्ग़ा खान का , फिर जलादुद्दीन खिलजी का और फिर अलाउद्दीन खिलजी का।  यह युद्ध में जाता था और अपने मालिकों के युद्ध का चापलूसीयुक्त वर्णन वर्णन प्रतीकों से करता था। बिलकुल वैसे ही जैसे पहले ज़माने के चारण , भाट और राजदरबारी किया करते थे।  जैसे इल्तुतमिश ने एक बार गंदे पानी का हौज़ साफ़ करवाया तो उसको इसने सांकेतिक भाषा में बाइबल और कुरान में वर्णित मूसा द्वारा समुद्र के दो फाड़ कर देने से तुलना की। 
देवगढ़ जीतने के बाद खुसरो प्रतीकात्मक भाषा में कहता है की सुलतान तो ईसा मसीह की तरह क्षमाशील हैं सबको माफ़ कर देते हैं। इसी तरह से चित्तौड़ युद्ध को यह तोराह, बाइबिल, कुरान में वर्णित  राजा सोलोमन के रानी शेबा के ऊपर  आक्रमण से तुलना करता है। जिसमे राजा सोलोमन ने हुदहुद चिड़िया के मुंह से रानी शेबा के विषय में सुन कर उसे अपने यहाँ आने का न्यौता दिया था।यदि वो न आती तो फौज तैयार कर ली थी फिर भी , अनेक गुणों की खान रानी उसका न्योता स्वीकार कर लेती है और राजा सोलोमन से शादी कर के बिलकीस बानो बन जाती है ( कुरान सूरा 27- आयत 20 से 40  तक)।  सोलोमन =खिलजी , हिरामन तोता = हुदहुद चिड़िया , रानी शेबा = पद्मावती। 
सबकुछ वैसा ही ही है, बस यहाँ रानी ने खिलजी को चुनने की जगह जौहर चुन लिया और जायसी को पद्मावत रचने की कथा वस्तु मिल गयी। इसी तथ्य को कुछ इतिहासकार मान रहे हैं और कुछ नकार रहे हैं।  
   
वैसे मेरा मानना है कि बिना आग के धुआं नहीं होता। 


और जो कुछ फसबुकिया सूतिये कमेंट या पोस्ट डाल रहे हैं कि जौहर करने से अच्छा था कि तलवार ले कर लड़ लीं होती उनके लिए दो बाते कहूँगा कि जब आप इतिहास पढ़ेंगे तो पाएंगे कि हिन्दू राजाओं ने एक एक साल तक अनवरत युद्ध किया था और हारे थे तो अधिकाँश में चल कपट से और मुसलमान और मुग़ल सैनिक मृत महिलाओं के शरीर से बलात्कार करने से भी बाज नहीं आते थे तो जौहर ही ऐसा रास्ता बचता था जिससे भारतीय महिलाएं अपना मृत शरीर भी गन्दा होने नहीं देतीं थीं।